फेसबुक पर एक सलमान अहमद साहब ने पंकज पचौरी को लेकर चल रही बहस में अपना एंगल पेला है. उन्होंने ललकारते हुए पूछा है कि कौन कहता है कि मीडिया नियोजन या प्रबंधन पत्रकारिता नहीं है? उन्होंने लिखा है कि बहुत से लोग मास काम की डिग्री लेकर पीआर का काम करने लगते हैं. अगर पंकज पचौरी पीएम का पीआर करने लगे हैं तो इसमें गलत क्या है? सलमान भाई को समझाए कि वे लोग ज्यादा अच्छे थे जिन्होंने मास काम की डिग्री लेने के बावजूद अपनी 'गल्ती' सुधार ली और पीआर की तरफ चल दिए. क्योंकि वे खुलकर पीआर कर रहे हैं, उन्होंने पीआरगिरी की नौकरी पाने के लिए अपनी पत्रकारिता का सौदा नहीं किया.
रही बात उन बड़े नामों के बारे में जिन्होंने भी पीएम के आसपास नौकरियां कीं, लेकिन बवाल नहीं मचा तो दोस्त मेरा कहना है कि उस जमाने के सच्चे पत्रकार भी उन लोगों को कम से कम पत्रकार तो नहीं ही मानते रहे होंगे. राजीव शुक्ला को अब कौन पत्रकार मानता है. सब लोग आफ द रिकार्ड उसे दल्ला ही कहते हैं. नरेंद्र मोहन पत्रकार टाइप की चीज नहीं थे, वे एक समझदार मौकापरस्त बनिया थे, लाभ दिखने पर किसी का भी पांव पकड़ लेते थे. चंदन मित्रा मोस्ट अपारचुनिस्ट परसन माने जाते हैं. कभी कामरेड रहे चंदन आजकल भाजपा में होलटाइमरी कर रहे हैं. हो सकता है कोई दूसरा पत्रकार आपको अरुण शौरी कुलदीप नैयर खुशवंत सिंह के बारे में भी बता दे, मुझे नहीं पता इनके बारे में.
और, जरूरी नहीं कि किसी ने गल्ती की हो तो हर कोई उस गल्ती को दुहराता जाए. मेरा सवाल बस इतना है कि जब देश की जनता वर्तमान कांग्रेस सरकार को मोस्ट करप्ट और जनविरोधी सरकार मानती हो तो कैसे कोई पंकज पचौरी जैसा पत्रकार अपनी थू थू कराने इस सरकार की इमेज मेकिंग काम को संभाल लेता है? क्या उसे उसके अंतरमन ने एक बार भी नहीं धिक्कारा? किसी ने सच कहा है कि ज्यादा बड़ी सेलरी पाने वाले पत्रकारों की आत्माएं मर जाया करती हैं क्योंकि वे उस सेलरी से उपजी सुविधा और मजबूरी से निकल नहीं पाते और हर दिन कुछ न कुछ आत्मा के लेवल पर मरते रहते हैं. एक दिन ऐसा आता है कि वे सौ फीसदी थेथर हो जाते हैं, वे अपनी सेलरी, अपने पद, अपने काम आदि के पक्ष में दिनदहाड़े गाल बजाते हुए तर्क कुतर्क करते दिख जाएंगे. बहस जारी है. फिलहाल सलमान अहमद भाई साहब का लिखा पढ़िए. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया
Salman Ahmed : पंकज पचौरी के प्रधानमंत्री कार्यालय में पीआरओ हो जाने पर हंगामा तो कुछ इस कदर मचाया जा रहा है कि जैसे उन ने कोई बहुत बड़ा अनैतिक कार्य कर दिया हो. कौन कहता है कि मीडिया नियोजन या प्रबंधन भी पत्रकारिता नहीं है? कहाँ लिखा है कि कोई एक बार किसी अखबार या चैनल में नौकरी कर लेने के बाद किसी कंपनी, व्यक्ति या संस्था की छवि निर्माण का काम नहीं कर सकता?
बहुत से लोग मीडिया की नौकरी के लिए भी मुनासिब मानी जाने वाली मॉस कम्युनिकेशन की डिग्री ले कर किसी अखबार या चैनल की बजाय कम्पनियों की सेवा में गए हैं. कम्पनियों से मीडिया में भी आये हैं. इसमें असंगत क्या है? और अगर है तो फिर ये हाय तौबा खुशवंत सिंह, कुलदीप नैयर, अरुण शोरी, चंदन मित्रा, बरजिंदर सिंह ‘हमदर्द’, नरेन्द्र मोहन, एच.के.दुआ और राजीव शुक्ला के बारे में क्यों नहीं मची? ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि कुलदीप नय्यर को सांसद कांग्रेस ने ‘बिटवीन द लाइंस’ से डर कर बनाया होगा या अरुण शोरी को मंत्री भाजपा ने बोफोर्स पे उनके लेखन से खुश हो कर.
पत्रकार से पीआरओ हो जाने में परगमन भी क्या है? ऐसा नहीं है कि पचौरी पीआरओ और चैनल के पत्रकार दोनों रहेंगे. इसमें कन्फ्रंटेशन आफ इंटरेस्ट भी कोई नहीं है. मीडिया नियोजन और प्रबंधन भी एक विधा है. अपने आप में एक पूरी दक्षता और विशेषज्ञता वाला काम. लोग करते ही आ रहे हैं. फिर भी आलोचकों को लगता है कि एक पेशेवर पत्रकार को वो नहीं करना चाहिए तो फिर उन पत्रकारों के लिए आप क्या कहेंगे जो सांसद हैं, पार्टियों के पदाधिकारी हैं, मंत्री तक हैं और फिर भी अखबार या चैनल के मालिक और संपादक हैं. ये तो बहस का विषय हो सकता है कि भैया या तो राजनीति कर लो या पत्रकारिता कर लो. लेकिन जिन पचौरी को पीआरओ रहते अपने चैनल में पत्रकारिता करनी ही नहीं तो फिर उन का गुनाह क्या है? कहीं ये चिल्लपों इस लिए तो नहीं है कि पचौरी कैसे पंहुच गए प्रधानमंत्री कार्यालय और हम क्यों रह गए?
नेताओं, कंपनियों, पार्टियों को मीडिया प्रबंधक हमेशा ही चाहिए . अब मीडिया उन्मुक्त हो जाने की हद तक मुक्त है तो ये अब और भी ज़रूरी और महत्वपूर्ण है. मीडिया को समझाने के लिए मीडिया को समझने वाले लोगों की ज़रूरत इसी लिए रही है. पचौरी शायद पहले ऐसे पत्रकार हैं जो चैनल के कामकाज और ज़रूरतों की समझ के साथ किसी भारतीय प्रधानमंत्री के पीआरओ हुए हैं. वे अपने काम को ठीक से कर सके तो खुश होना चाहिए कि वे टीवी पत्रकारों को विजुअल्स और बाइट्स के साथ वो सब उपलब्ध करा पाएंगे जो चैनलों के लिए वैसे भी बहुत आवश्यक होता है. अपनी नई भूमिका में वे प्रधानमंत्री की और से किसी चैनल पे आ के कुछ बोलें तो उन्हें इसका भी हक़ है. मगर भाई लोगो, बहस ही करनी है तो इस पे करें कि पालिटिशियन, सांसद, पार्टी पदाधिकारी या मंत्री होते हुए भी पत्रकार या मीडिया मालिक होना कितना तर्कसंगत है?





