उत्तर प्रदेश का यह चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी के लिए लालायित है। भाजपा के नेता, कार्यकर्ता और वोटर तो देश के इस जनप्रिय नेता को देखने के लिए बेचैन हैं ही, दूसरी पार्टी के लोगों को भी चुनाव में अटल जी की कमी महसूस हो रही है। आखिर कौन करेगा गरीबों की बात? कौन छोड़ेगा विपक्ष पर तीखे तीर? किसकी आंख और अंगुलियों के इशारे पर बजेंगी तालियां? और कौन बांधेगा चुनावी मजमा? सूबे में इस तरह की चर्चा चारों तरफ है। लखनऊ स्थित भाजपा कार्यालय में चले जाइए, तो आपको वहां सन्नाटे से ज्यादा कुछ नहीं दिखेगा। कुछेक मुरझाए नेतानुमा और मुंह लटकाए कार्यकर्ताओं को देखकर आप कह सकते हैं कि यहां सब कुछ ठीकठाक नहीं है।
एक कार्यकर्ता ने कहा, अरे भाई, इस बार सब गड़बड़ है। पार्टी का कोई भी नेता ऐसा नहीं है, जो चुनावी नैया को पार लगा सके। सब कहते जरूर हैं, लेकिन औकात कुछ नहीं है।’ ऐसा क्यों? सवाल दागा, तो उत्तर मिला ‘अटल जी नहीं हैं’। अटल जी होते, तो आज जो पार्टी की गत देख रहे हैं, वह नहीं होती। देखिए, चुनाव में पार्टी की क्या स्थिति है! अधिकतर नेता लोग हवाई जहाज से दौरा कर रहे हैं, दिल्ली-लखनऊ एक है, लेकिन वोट कहां हैं, पता नहीं। काश! अटल जी होते और उनकी आवाज होती। ’ पार्टी के आॅफिस के भीतर पहुंचा, तो लालजी टण्डन और उनके साथ कुछ और चेहरे दिखे। उनमें कुछ आयातित चेहरे थे। टण्डन साहब कहने लगे ‘सब ठीक है। हमारी स्थिति अच्छी है और हम बेहतर करने जा रहे हैं। बसपा की लूट की हम पोल खोलेंगे। हमने ही उनके मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर हमला किया था, सब चले गए।’
लखनऊ के चारबाग इलाके में नेताओं और अधिकारियों की गहमागहमी के बीच चुनावी मुद्दे गौण हैं। लोगों की भीड़ में कोई चुनाव पर बहस करने को तैयार नहीं है। व्यवसायी सुरेश कहते हैं कि ‘कोई जीते, कोई हारे’ इससे प्रदेश को क्या मिलना है? हम किस पार्टी को वोट देंगे, नहीं बताएंगे, लेकिन इस बार अटल जी के बिना सब कुछ सूना-सूना है। बीमार नहीं होते, तो अटल जी आते और सब कुछ बदल जाता। इस बार भाजपा बुरी तरह फंस गई है। किसी नेता में इतना दम नहीं है, जो पार्टी को आगे बढ़ा सके।’ कांग्रेस दफ्तर की तरह बढ़ा, तो वहां लोगों की भीड़ ज्यादा दिखी। चकाचक बड़ी-बड़ी गाड़ियों की आवाजाही सबसे ज्यादा कांग्रेस दफ्तर में चल रही है। टिकट की आस में लगे कुछ नेताओं से मुलाकात हुई। आप कह सकते हैं कि ऐसे लोगों से मिलन हुआ, जिनके टिकट कट गए थे। मुंह लटकाए कांग्रेस को गरिया रहे थे।
दर्जन भर से ज्यादा लोगों ने बेनी प्रसाद वर्मा को कांग्रेस का शत्रु बताया। उनका कहना था कि देवीपाटन मण्डल की सभी 20 सीटों पर कांग्रेस की हार होगी। ऐसा क्यों? जवाब मिला कि यहां टिकट का वितरण वर्मा ने किया है। जातीय समीकरण को नहीं देखा गया। इसी बीच अटल जी की चर्चा चल पड़ी। बहराइच के कांग्रेसी नेता जगत सिंह उदास हो गए। कहने लगे अटल इस चुनाव में नहीं हैं। भाजपा की जो गत है, वह अटल जी के न होने की वजह से है। हम लोग कांग्रेसी हैं, लेकिन अटल जी को सुनते रहे हैं। देश में बहुत कम नेता हैं, जिसे देखने-सुनने सभी जाति, धर्म, पार्टी के लोग जाते हैं। ये भाजपा वाले अटल जी को प्रचारित कर रहे हैं, उन्हें एक बार लखनऊ तो ले आते। आपको बता दें कि अटल जी लखनऊ आ गए, तो भाजपा की राजनीति बदल जाएगी।’ हजरतगंज के उस सादिक अली को क्या कहेंगे, जो अटल के प्रशंसक हैं। सादिक अली 70 साल से ऊपर के हैं। कहते हैं ‘हमने भाजपा को कभी वोट नहीं दिया, लेकिन हम अटल को देश का नेता मानते हैं। राजनीति अपने ढर्रे पर चलती है, लेकिन अटल का इस चुनाव में नहीं होना खल रहा है। वे स्वस्थ होते, तो जरूर आते।’
प्रदेश की राजनीति में कभी नंबर दो पर रहने वाली भाजपा के लिए यह चुनाव भारी है। उसे अपनी प्रतिष्ठा बचाने में भी परेशानी हो रही है। पिछड़ी जाति और ब्राह्मण की राजनीति करके सत्ता में आने वाली भाजपा अब सत्ता के लिए नहीं, अपनी इज्जत बचाने के लिए तरस रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं और वोटरों में जोश न के बराबर है। उमा भारती, राजनाथ सिंह, कलराज मिश्रा, विनय कटियार, योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं की यहां भरमार है, लेकिन पार्टी क्या जीत पाएगी? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। पार्टी ने पिछड़ी जाति के नेताओं में बाबू सिंह कुशवाहा, उमा भारती और साध्वी निरंजना ज्योति पर दांव खेला है, लेकिन सब कुछ ठंडा दिख रहा है। बसपा के पिछड़ी जाति के नेता सुखदेव राजभर, राम अचल राजभर और धर्म सिंह सैनी के सामने भाजपा के पिछड़ी जाति के नेता टिक नहीं पा रहे हैं। फिर बाबू सिंह कुशवाहा को लेकर राजधानी में जिस तरह की चर्चा चल रही है, वह भाजपा के किले को ध्वस्त करने के लिए काफी है। फिर सपा के राम आसरे कुशवाहा और राजमती निषाद और कांग्रेस के पिछड़ी जाति के मुखौटा सैम पित्रोदा के सामने भाजपा के नेता बौने साबित होते गए हैं।
बसपा के विरोध में सबसे पहले भाजपा ने ही लड़ाई शुरू की थी, बसपा के भ्रष्टाचार पर किताब लिखी गई, 100 घोटालों को जनता तक पहुंचाया गया, लेकिन सब कुछ के बावजूद भाजपा पिछड़ गई। सपा के गुरुसंत सिंह कहते हैं कि अटल भले ही भाजपा की राजनीति करते हैं, लेकिन वे देश के नेता हैं। लखनऊ से बाहर जाकर अटल जी को सुना है। इस बार बीमार अटल जी नहीं आ रहे हैं। भाजपा की बोलती बंद है। कुछ इसी तरह के बयान बसपा के मृत्युंजय, राधेश्याम और विशंभर का भी है। विशंभर कहते हैं कि ‘अटल जी होते, तो लखनऊ का समां कुछ और होता। भाजपा, अटल जी को यहां लाए, तो उसे लाभ होगा, लेकिन अब कुछ होगा नहीं।’
अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीर भाजपा के स्टार प्रचारकों में दर्ज है। ऐसा क्यों है? इसकी सही जानकारी कोई नहीं दे रहा है। लेकिन यदि सचमुच अटल की उपस्थिति लोगों के बीच हो गई, तो भाजपा की डूबती नैया को सहारा मिल सकता है। चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों, कोई जीते, कोई हारे, लेकिन लखनऊ के लोग अटल के लिए ललायित हैं। यही है अटल की ताकत। सवाल उठता है, क्या कोई अटल की जगह ले पाएगा?
वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल की रिपोर्ट.





