कमल/यशवंत भाई, 'फुटेला प्रभाष जोशी पर…' के सन्दर्भ में मुझे ये कहना है कि आप मुझ से किसी भी मुद्दे पे असहमत हों. कोई बात नहीं. आलोचना करें. स्वागत है. अपमान करें. तो लोगों को हम दोनों के बारे में बारे में राय बनाने का मौका मिलेगा. लेकिन मेरा आग्रह है कि अपने तथ्य आप ठीक कर लें. पहली बात तो ये है कि राजीव गाँधी की हत्या या उसकी योजना से सम्बंधित मैंने कभी कहीं कुछ नहीं लिखा. सो उसके कहीं छपने या न छपने का प्रश्न ही नहीं.
सच ये है कि मैंने श्रीमती गाँधी की पन्त नगर में दीक्षांत समारोह के बहाने बुला कर हत्या की साज़िश का पर्दाफाश किया था. और वो स्टोरी छपी भी थी. 'गंगा' के अक्टूबर '84 के अंक में. आदरणीय प्रभाष से मैं पहली बार तब मिला जब इस के कोई तीन साल बाद वे 'जनसत्ता' चंडीगढ़ के लिए मेरा चयन कर रहे थे. ज़ाहिर है सन 84 की वो घटना तीन साल बाद तो खबर नहीं हो सकती थी. न उसके कहीं छपने का प्रश्न या न छाप सकने का कोई मलाल. तो उसके न छाप पाने या प्रभाष जी से मेरे किसी मतभेद का सवाल कहाँ है? और उनकी कोई शिकायत राजस्थान पत्रिका को लिख भेजने की कोई तुक क्या?
मैं अपने पूरे होशो हवास के साथ ये कह रहा हूँ कि न तो मैंने प्रभाष जी से मिलने के बाद वैसी कोई खबर लिखी, न उस के न छपने पर कभी कोई विरोध हुआ. इंडियन एक्सप्रेस कंपनी आज भी है और 'जनसत्ता' भी. रिकार्ड चेक कर लीजिये कि 'जनसत्ता' से मैं खुद गया था बाकायदा त्यागपत्र दे कर और उसके बाद मैं कमलेश्वर जी के साथ उनके 'जागरण' में विशेष संवाददाता हो कर गया था.
रही श्रद्धेय प्रभाष जी के बारे में पत्र लिखने की बात तो ये मेरे लिए भी एक नई जानकारी है. अगर आप ये अपनी जानकारी के आधार पर कह रहे हैं तो मुझे वो पत्र दिखा दें. और अगर आप को ये जानकारी किसी और स्रोत से मिली है तो उसका खुलासा कर दें ताकि मैं उसके खिलाफ मुनासिब कोर्ट में उचित कारवाई कर सकूं. और अगर आप की जानकारी गलत है तो केवल कृपया उसे मान लें. या अपनी बात साबित करें. मैं भी जानना चाहूंगा कि किस ने क्या लिख के मेरे नाम पे मढ़ डाला. उनके प्रति मेरे आदर और उनके मुझ से स्नेह का एक सबूत ये भी है कि 'जनसत्ता' छोड़ने के भी कोई बारह वर्ष बाद मैं उन्हें जैन टीवी में करेंट अफेयर्स पर अपने कार्यक्रम में आमंत्रित किया करता था और वे पधारते भी थे.
धन्यवाद एवं शुभकामनायें.
जगमोहन फुटेला
: अब प्रभाष जी के नाम पर, यशवंत? : यशवंत भाई, मैंने 'भड़ास' बारे जो भी लिखा उस पे आपका बहसना समझ आ सकता था. तिलमिलाना और तू तड़ाक पे उतरना और मेरे नाम को बिगाड़ के छापना भी आपकी छवि के बहुत कोई बहुत ज्यादा अनपेक्षित नहीं है. मैंने जानबूझ कर बहुत जल्दी जवाब नहीं दिया. मैं चाहता था कि आप पहले अपना आप दिखा ही लें लोगों को. देख ही रहे हैं पत्रकार भाई कि मैंने लिखा क्या है और जवाब आप क्या दे रहे हैं. मैंने लिखा कि अपने किये अनकिये की कीमत आप ये कह के लोगों से वसूल नहीं सकते कि देखो ये हालत तुम्हारी वजह से हुई है, सो खामियाजा तुम भुगतो. आपके अलावा कभी किसी भी तरह के मीडिया ने वो अपने लेखकों या पाठकों से वसूली भी नहीं. आप इसी मुद्दे पे रहते तो बात समझ में आती. मगर आप उस पे नहीं रुके. वो इसलिए कि उस पे आप के पास कोई ठोस तर्क नहीं था. सो आप ने पहले तो अपनी उपलब्धियां गिनाईं. बताया कि कैसे आपने लोगों को लिखने का एक मंच दिया. लिखने नहीं भड़ास निकालने का. जिसके खिलाफ जो जी में आया, आपने छापा.
आपके हिसाब से 'जागरण' तो होना ही नहीं चाहिए था. शशि शेखर को हिंदुस्तान में नहीं होना चाहिए था. आपका बस चले तो भारत में भी नहीं. इंडियन एक्सप्रेस को आप पत्रकारिता का पाठ पढ़ाते हैं. जिसके बारे में जो जी में आये छापना अपना मौलिक अधिकार समझते हैं आप. छाप के नीचे लिख देते हैं कि भैया अगर गलत हो बता देना. वो भी छाप देंगे. क्या तरीका ढूँढा है आपने खुद को हिट करने का? किसी के खिलाफ कुछ भी छापने से गुरेज़ नहीं करते आप. खुद मान के चलते हैं कि पुष्टि नहीं की है छापने से पहले. क्या मानदंड है आपका ये पत्रकारिता का. अब अपने पे छपा है तो कपड़ों से बाहर हुए जा रहे हैं.
किसने कहा है कि न्यू मीडिया नहीं होना चाहिए. कौन कहता है कि आप ने लिखने वालों को मंच नहीं दिया है. मैं भी लिख चुका हूँ कि आपको इसका श्रेय मिलना चाहिए. आइकान होना चाहिए था आपको. आप नहीं हो पाए हैं तो अब झल्ला क्यों रहे हैं? मुझे अपने बराबर साईट हिट होने की चुनौती दे रहे हैं आप. क्यों? मेरा तो मुकाबला ही नहीं आप से. जैसी भी अच्छी बुरी पत्रकारिता कर रहे हैं आप, मुझे करनी ही नहीं. मुझे तो उदित साहू जी जैसे गुरुओं ने पच्चीस साल पहले ही सिखा दिया था अमर उजाला में कि अपने या अपने अखबार पे कोई हमला हो जाए तो अपनी अखबार में नहीं छपेगी खबर. वे कहते थे मज़ा तो तब है जब दूसरे आपकी लड़ाई लड़ें.
तर्क जिसके पास नहीं होता वो काटने को दौड़ता है आप की तरह. आप मुझ से बहस नहीं रहे मूल मुद्दे पे. मुझ से मेरे जीवन के निजी सवाल पूछ रहे हैं. पूछ रहे कि मैं अपना खर्च कैसे चलाता हूँ. आप जिज्ञासु हैं तो चलिए मैं बता ही देता हूँ. मैं बता चुका हूँ कि मैं एक संपन्न परिवार से हूँ और पत्रकारिता में मैं अपनी कमिटमेंट और कन्विक्शन की वजह से आया था. कुछ लाख हमारे लिए कभी भी बहुत बड़ी रकम नहीं रही और पांच लाख रूपये भी कहीं ठीक से लगे हों किसी प्रापर्टी में पांच साल में पांच गुने और दस लाख, दस साल में एक करोड़ बिना कुछ किये भी हो जाते हैं. किसी के भी. दारु मैं पीता नहीं. इतना ईश्वर दे देता है कि मेरे पास दूसरों के लिए भी बच रहता है. मैं कभी अलग से बता दूंगा आपको कि पत्रकार भाइयों समेत कितनों का मैंने इलाज कराया है पीजीआई में. पचास से अधिक बार अपना खून दे कर भी. रसम किरया, अंतिम अरदास, श्रद्धांजलि और जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम भी मेरे लिए कमाई का ज़रिया नहीं हैं. आप की तरह मैं उतारता नहीं फिरता लोगों की. फिर भी पीछे एक महीने में चौदह लाख का आंकड़ा हमने छुआ है. आप की साईट की कामयाबी आपको मुबारक. भगवान आपको और ऊपर ले के जाए. लेकिन सच तो ये है कि आप भारत में खुद को नंबर वन लिखने के बावजूद मांग रहे हैं. और मेरे हाथों से ईश्वर कहीं सलाहकार सम्पादक नहीं होने के बावजूद कुछ न कुछ समाज को लौटवा रहा है. ये भी बताता चलूँ आपको कि कभी भजन लाल ने मुख्यमंत्री रहते मुझे एक एक कनाल के दो प्लाट आफर किये थे. मैंने वो लेने से इनकार कर दिया था. उस से पहले गुडगाँव के सेक्टर 15 पार्ट 2 में आठ मरले का एक प्लाट अलाट कर के चिट्ठी भी भेज दी थी. मैंने वो भी लौटा दिया था. आप चाहें तो सरकारी रिकार्ड से इसकी पुष्टि कर सकते हैं. वो अकेला प्लाट भी आज तीन करोड़ से कम का नहीं होगा. आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि मेरी ज़रूरतें और मेरी प्राथमिकताएं क्या रहीं होंगी जीवन में.
लगे हाथ मैं अमित सिन्हा के हवाले से की आपकी टिप्पणी पे भी अपना पक्ष रखता चलूँ. अमित सिन्हा मेरे बीस साल पुराने परिचित और मित्र हैं. दोस्तों की तरह से हम दुश्मनों की तरह लड़ें भी हैं. मुश्किल की घड़ी में साथ खड़े भी हैं. लेकिन उन के खिलाफ पैसों के लिए मेरा कौन सा केस दुनिया की किस अदालत में चल रहा है, ज़रा बता तो दीजिये.
आप लिखते हैं मैं छिछोरा निकला. अचानक क्यों? आपके बारे में कुछ लिखा जाने के बाद क्यों? कोई भी आप की कैसी भी आलोचना करेगा तो आप उसको (अपनी आदत और अपेक्षा के अनुरूप) जवाब या खंडन नहीं भेजेंगे, गरियायेंगे? क्यों? आप कोई अंडरवर्ल्ड हैं? दादा है? या मवाली? कौन अधिकार देता है आपको मेरा नाम गलत तरीके से छापने का? जैसा मैंने पहले कहा मैं चाहता तो आपको अभी गलती पे गलती करते देता. और फिर एक दिन इधर बुला के किसी सक्षम न्यायालय के सामने खड़ा कर देता. मैं जानता था आप सभ्यता, संस्कार और व्यवहार की सीमाएं लांघ जाने के आदी हो. कुछ भी कह और लिख सकते हो. जैसे ये….
आपने छापा है कि मैंने राजीव गाँधी की हत्या की साज़िश पे खबर लिखी. प्रभाष जी ने कहा कि मुझे लिखना नहीं आता. और मैं राजस्थान पत्रिका को चिट्ठी लिख दी प्रभाष जी के खिलाफ. कुछ भी छापने से पहले उसकी पुष्टि करना तो आपकी पत्रकारीय नैतिकता में शामिल है या नहीं. होता और आप मुझ से एक बार पूछ ही लेते तो आप को पता होता कि जिस पंतनगर में हत्या की जिस साज़िश की बात है वो रिपोर्ट राजीव गाँधी नहीं, श्रीमती इन्दिरा गाँधी के बारे में थी. और वो छपी थी उनकी हत्या होने से पहले 'गंगा' में सन 84 के अक्टूबर अंक में. अब ज़रा अपने तेज़ तर्रार दिमाग का इस्तेमाल कर के बताइये कि क्या इंदिरा जी की हत्या की साज़िश की खबर उनकी हत्या हो चुकने के तीन साल बाद छप सकती है? मैं तो '87 में आया 'जनसत्ता' में. आदरणीय प्रभाष जी से पहली बार तभी मिला था.
ज़रा बताइये न कि सन 84 में 'जनसत्ता' (जो तब चंडीगढ़ में था ही नहीं) में खबर दी जा सकती है छपने के लिए? और नहीं छपने पे चिट्ठी वो भी राजस्थान पत्रिका को? फिर आप कितने भोलेपन से छाप रहे हैं कि वो चिट्ठी कहीं छपी भी नहीं है और आपके या आपके लेखक के पास भी नहीं है. जो चिट्ठी किसी ने कभी देखी ही नहीं उस के हवाले से आप मुझे तो फिर रगड़ दो कोई बात नहीं कम से कम प्रभाष जी आत्मा को तो बख्श दो! मैं ठोक बजा के कह रहा हूँ कि मैंने प्रभाष जी के बारे में कभी कहीं एक शब्द नहीं लिखा. चिट्ठी तो बहुत दूर की बात है. जैसा मैंने ऊपर लिखा राजीव गाँधी की हत्या जैसे किसी विषय पर मेरी किसी रिपोर्ट का तो कोई सवाल ही नहीं, 'जनसत्ता' से मैं खुद गया था. इस्तीफ़ा देकर और प्रभाष जी का आशीर्वाद ले कर. मेरे इस्तीफे की तस्दीक इंडियन एक्सप्रेस कंपनी के एच आर डिपार्टमेंट से कर भी कर सकते हैं आप. आप अपने ही यहाँ मेरे पुराने लेख देख लें तो पाएंगे कि मैंने पहले भी लिखा है कि मेरे 'जागरण' में जाने का फैसला मेरे 'जनसत्ता' में रहते ही हो गया था. फिर भी मेरी तरफ से चिट्ठी लिखी बतानी ही थी तो विवेक गोयनका को लिखवाते. राजस्थान पत्रिका से प्रभाष जी या मेरा क्या मतलब?
मैं निवेदन कर रहा हूँ आपसे कि वो चिट्ठी नहीं है आपके पास तो तुरंत स्पष्टीकरण छापें. और जब वो कोई हो कभी आपके पास तो शब्द नहीं, गोली चला देना मुझ पर. मैंने आपकी प्रतिक्रिया में अपमानजनक शैली और उस में दर्ज किसी शब्द पर आप से कुछ नहीं कहा. पाठक देख रहे हैं कि शालीनता का साथ कौन थामे है, कौन छोड़े. मैं लेखन की बात लेखन और पत्रकारिता की बात पत्रकारिता तक ही सीमित रखता. लेकिन आप यों बिना कारण, (और खुद के मुताबिक़ भी) बिना सबूत मानहानि करेंगे तो मुझे आपकी इस निजी लड़ाई की काट ढूंढनी पड़ेगी. चिठ्ठी या स्पष्टीकरण नहीं छापेंगे तो, मुझे पता है नियम, क़ानून, नैतिकता का मतलब कैसे समझाया जाता है. मैं कोर्ट जाऊँगा. स्पष्टीकरण न छापने की सूरत में बचाव के लिए चिट्ठी तैयार रखियेगा.
जगमोहन फुटेला
चंडीगढ़
फुटेला के इन नए पत्रों पर यशवंत का जवाब…
मैं कह चुका हूं कि जगमोहन फुटेला के लिखे पर अब एक भी शब्द नहीं लिखूंगा, फुटेला जो चाहे लिखता रहे. लेकिन मैं कुछ बातें और कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. वैसे तो मैंने अपनी बात पहले ही रख दी है पर जिस मंच पर फुटेला सवाल खड़ा कर रहे हैं उन्हें यह याद कर लेना चाहिए कि उसी मंच ने उनके जागरण से लड़ाई जीतने के बारे में खबर दमदारी के साथ छापी थी. संजय गुप्ता गोल्डेन हैंडशेक करना चाहते थे, यह खबर भी छापी. तब तो उन्होंने यह भड़ास को राय नहीं दी कि भड़ास संजय गुप्ता से यह पक्ष ले लेकि उन्होंने वाकई गोल्डेन हैंडशेक का प्रस्ताव फुटेला को किया था या नहीं. आज उसी तरह की खबरें छप जाती हैं तो फुटेला को चिंता हो रही है कि भड़ास किस तरह की पत्रकारिता कर रहा है? फुटेला जी, यह दोगलापन क्यों?
भड़ास का पाठक जानता है कि यह मंच कभी किसी के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं रहा है. जागरण के बारे में अच्छी चीजें आती हैं तो वो भी छपती हैं. शशि शेखर का लंबा इंटरव्यू इसी भड़ास पर प्रकाशित हो चुका है. हम लोग पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भड़ास पीआर वाली पत्रकारिता नहीं करता. बहुत सारे मंच हैं पोर्टल हैं वेबसाइट हैं मैग्जीन हैं जो पीआर वाली पत्रकारिता करती हैं और मीडिया घरानों व कारपोरेट घरानों से पैसे लेकर फलफूल रही हैं. उन्हें उनकी पत्रकारिता और उनका तरीका मुबारक. ये भड़ास है. यहां मीडिया वालों के दुख दर्द प्रकाशित होते थे और होते रहेंगे. और इस मंच को चलाने के लिए मीडिया वालों से डोनेशन, चंदे लिए जाते रहेंगे. किसी को मिर्ची लगे तो लगा करे.
जिस शख्स को खुद की साइट पर इमेज अपलोड न करना आए, वह दूसरों को वेबसाइट चलाने का तरीका समझाए, बड़ा दुखद लगता है. जिस व्यक्ति को अपनी प्रशंसा में लिखे लेख को पढ़ाने के लिए दूसरे को बिना वजह दो चार लाइन में गरियाकर उसे प्रोमो व हाइलाइटर बनाना पड़े , वह व्यक्ति शालीनता का पाठ पढ़ाए, लिखने की शैली बताए, बड़ा शर्मनाक लगता है. कल तक जो आदमी अपने लेख किसी भी रूप में भड़ास पर न छापने के लिए मेल लिखता हो, आज वह अपना स्पष्टीकरण भड़ास पर न छपने पर नोटिस भेजने की बात करता हो, कोर्ट में घसीटने की बात करता है, यह बड़ा हास्यास्पद लगता है.
अज्ञानता बुरी नहीं होती है. आदमी सीखे तो बहुत कुछ सीख जाता है. लेकिन मूर्खतापूर्ण आत्मविश्वास में आदमी वही सब करता लिखता है जो फुटेला जी कर रहे हैं. चलिए, आप लाखों रुपये स्वांत सुखाय खर्च कर अपनी महान पत्रकारिता करते रहिए, आपको मुबारक. हम तो चंदे लेकर बेतुकी पत्रकारिता करते रहेंगे, कल भी करते थे, आज भी करते हैं और आगे भी करेंगे या नहीं करेंगे, यह वक्त बताएगा.
अच्छा होता जो फुटेला जी अपने लाखों रुपये में से कुछ लाख रुपये भड़ास को चंदा दे देते, फिर समझाते-गरियाते तो लगता कि बंदा वाकई सीरियस है अपनी बात को लेकर. पर खुद तो बाप की कमाई उड़ा रहे और दूसरों को किसी से न मांगने की नसीहत दे रहे. लाखों रुपये आप यूं ही होम कर दे रहे हैं और आप कुछ रिटर्न नहीं चाहते हैं, सच में आप महान हैं. धन्य हैं आप. लेकिन जिसके घर ढेर सारी संपत्ति हो, वो दूसरे को उसमें से बिना दिए उसे न मांगने का उपदेश दे, तो उसे क्या कहा जाए. क्या पत्रकारिता वही करेंगे जिनके पिता ने लाखों रुपये बिना रिटर्न की उम्मीद किए खर्च करने को छोड़े हों? और, अगर कोई कारपोरेट से पैसे न लेता हो, अगर कोई बड़े घरानों से पैसे न लेता हो, और अपने पाठकों से चंदे लेकर पत्रकारिता करता हो तो उसे गोली मार देना चाहिए?
थोड़ी अपनी समझ और सोच का दायरा बढ़ाइए फुटेला जी. दुनिया की ढेर सारी न्यूज वेबसाइट सब्सक्रिप्शन बेस हैं. वे ट्रायल में कुछ दिन के लिए फ्री कंटेंट देखने पढ़ने को देती हैं उसके बाद ट्रायल अवधि बीतने के बाद पढ़ने के लिए डालर या रुपये मांगती है. यह भी एक माडल है. विकीलीक्स और विकीपीडिया जैसे मंच हैं जो डोनेशन, चंदे पर चलते हैं. यहां तक कि तहलका जैसे समूह ने निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए अपने पाठकों से पैसे मांगे और खुशवंत सिंह समेत सैकड़ों लोगों ने लाख लाख रुपये तहलका को दिए. आप आंख खोलेंगे तब तो दिखेगा. कूपमंडूक पत्रकारों को कहां कुछ नजर आता है, उन्हें तो उनका लिखा लेख, उनकी अपनी साइट और उनका अपना घर ही दुनिया का पहला व आखिरी रोल माडल समझ में आता है.
इस देश में ढेरों ऐसी लघु पत्रिकाएं हैं जो वार्षिक सदस्यता पर चलती हैं. हर पत्रिका का एक मूल्य तय होता है. आप उनके संपादकों को भी गरिया सकते हैं कि वे तो बड़े बकलोल निकले, भला अपने पाठकों से पैसे लेकर अपनी मैग्जीन पढ़ने को क्यों दिया जाता है, भला ऐसा भी होता है? करोड़ों रुपये टर्नओवर वाले समूह भी अपने पाठकों से अपने अखबार का एक दाम वसूलते हैं. ऐसे में आप कैसे गलत कह सकते हैं कि एक साझा मंच का संचालक मंच के संचालन के लिए अपने पाठकों से पैसे देने की अपील करता है तो गलत करता है? सोचिए, और बताइए.
भड़ास4मीडिया का मॉडल सब्सक्रिप्शन बेस्ड नहीं रखा गया है. जो भी आए पढ़ सकता है. भड़ास ने मीडिया के बड़े घरानों से कभी पैसे नहीं मांगे, क्योंकि उनसे पैसे लेंगे तो उनके खिलाफ जो खबरें आती हैं, उसे कैसे छाप पाएंगे. यहां तक कि कुछ छोटे व नए समूहों ने भड़ास को विज्ञापन देने के बाद शर्त रख दी कि भड़ास पर उनके बारे में निगेटिव खबर नहीं छपेगी तो हमने उनके विज्ञापन को लेने से मना कर दिया.
ऐसे में भड़ास के संचालन के लिए आप ही बताइए क्या विकल्प बचता है? अगर हम अपने पाठकों के आगे यह विकल्प रखते हैं कि जो देने की स्थिति में हो वो भड़ास को डोनेशन देकर इसके स्मूथ संचालन में मदद कर सकता है क्या गलत किया? इस मंच के संचालन के लिए किसी से अनैतिक समझौता न करना पड़ा, इस मंच को चलाने के लिए बड़े घरानों से कुत्सित समझौते न करने पड़े, इसके लिए हम लोगों को भीख मांगना पड़ रहा है, तो आपको क्यों दिक्कत हो रही है. सच कहते हैं, लोग अपने दुखों से नहीं, दूसरे के सुखों से दुखी रहते हैं. अगर हम लोग अपने पाठकों से मिल रहे पैसे के बल पर भड़ास चला रहे हैं, और पैसे कम पड़ने पर फिर फिर मांग रहे हैं तो आपको जलन किस बात की?
अब भी मौका है फुटेला जी, कुछ रकम भड़ास के नाम डोनेट करके अपनी स्वांत सुखाय पत्रकारिता को विस्तार दें और अपनी आत्मा को जीतेजी शांति प्रदान कर लें. शायद अपनी जिंदगी में आप यही एक नेक काम कर लें 🙂
रही प्रभाष जोशी जी के बारे में मुंबई के पत्रकार कमल शर्मा के लिखे लेख का तो उन्होंने दावा किया है कि पत्र उनके पास जयपुर स्थित उनके घर पर है. जब वो घर जाएंगे तो उस पत्र को स्कैन करके भड़ास के पास भेजेंगे. तब दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. उन्होंने फिलवक्त अपनी स्मृति के आधार पर जो लिखा है, उसमें संभव है एक दो तथ्य दाएं बाएं हो गए हों, लेकिन उनके लिखे की मूल भावना तो यही है कि आपने प्रभाष जोशी के खिलाफ एक पत्र राजस्थान पत्रिका प्रबंधन को लिखा था, और उस पत्र में प्रभाष जोशी को काफी कुछ आपने उल्टा सीधा कहा है. आप ऐसा कोई पत्र भेजे जाने से इनकार कर रहे हैं. ऐसे में कमल जी पत्र जब सार्वजनिक करेंगे तब सबको समझ में आ जाएगा कि सच क्या है.
यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया
…पूरे प्रकरण से अगर आप परिचित नहीं हैं तो नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ समझ सकते हैं…
भड़ास के खिलाफ जगमोहन फुटेला की भड़ास
फुटेला जी, आप 'गरियाना' जारी रखें, और मैं 'भीख' मांगना
फुटेला को सीरियस और सींसियर मानता था, पर बड़ा छिछोरा निकला
ये फुटेला प्रभाष जोशी पर कीचड़ उछाल चुका है, यशवंत क्या चीज हैं





