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शराब + पैसा + जाति = उत्तर प्रदेश चुनाव!

: बिहार का असर फ़ैल रहा है, पर धीरे-धीरे : उत्तर प्रदेश में हो रहे इन चुनावों में एक रोशनी जरूर दिखी. वही मतदाता जो उत्तर प्रदेश में विधायकों का निर्णय करेंगे, बगल की बिहार की राजनीति से प्रभावित हैं. इस बार सिताबदियारा के उत्तर प्रदेश हिस्से के लोगों ने पूछा, क्या संविधान में कोई ऐसा प्रावधान है कि हम उत्तर प्रदेश के निवासी (सिताबदियारा), बिहार के निवासी बन जायें या बलिया जिला बिहार में मिल जाये?

: बिहार का असर फ़ैल रहा है, पर धीरे-धीरे : उत्तर प्रदेश में हो रहे इन चुनावों में एक रोशनी जरूर दिखी. वही मतदाता जो उत्तर प्रदेश में विधायकों का निर्णय करेंगे, बगल की बिहार की राजनीति से प्रभावित हैं. इस बार सिताबदियारा के उत्तर प्रदेश हिस्से के लोगों ने पूछा, क्या संविधान में कोई ऐसा प्रावधान है कि हम उत्तर प्रदेश के निवासी (सिताबदियारा), बिहार के निवासी बन जायें या बलिया जिला बिहार में मिल जाये?

पिछले 12-15 वर्षो से कोशिश रहती है कि मकर संक्रांति के अवसर पर गांव में रहूं. गांव यानी सिताबदियारा. गंगा और घाघरा दो नदियों से घिरा. दो राज्यों (उत्तर प्रदेश और बिहार) तथा तीन जिलों (आरा, छपरा और बलिया) में बंटा. पर 27 टोले का एक ही गांव. गंगा और घाघरा का संगम. हर मकर संक्रांति पर गंगा स्नान और संगम पर उमड़ती अपार भीड़ बचपन की स्मृति में है. पर, इस बार गांव में मकर संक्रांति का जोर नहीं था. उत्तर प्रदेश चुनाव की चर्चा थी. चौपाल में, गांव की बैठक में. कौडा-घूरा (जाड़े में आग तापने की सार्वजनिक जगह) समेत हर घर, दरवाजे पर. यह चर्चा भी कैसी? गांव की चुनावी चर्चा सुन कर यूआर अनंतमूर्ति याद आये. 1994 में ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता. 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित.

मशहूर कन्नड़ साहित्यकार, समाजवादी चिंतक और सर्जक. 2010 के उत्तरार्ध में उनका एक साक्षात्कार पढ़ा (पत्रकारिता की शुरुआत में मुंबई में पहली बार मुलाकात का अवसर मिला था). उन्होंने कहा था कि चुनाव इतने महंगे और खर्चीले हो गये हैं कि मेरा पहला फ़र्ज है कि मैं लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली, कार्यविधि और प्रक्रिया पर ही सवाल उठाऊं? यह भी कहा कि संसदीय लोकतंत्रकी स्कैनिंग होनी चाहिए. हमारा जनतंत्र, जनतंत्र की तरह काम नहीं कर रहा है. अपने गांव में चुनाव का रंग, ढंग और बयार देख, ऐसे अनेक सवाल मन में उठे. इसी गांव में आंख खुली. राजनीतिक चेतना की नींव पड़ी. खांटी गांव और अपढ़ लोगों के बीच सीखा कि राजनीति मानव कल्याण का माध्यम है. समाज जहां खड़ा है, वहां से उसे ऊपर उठाने का औजार.

बचपन याद है, जब कांग्रेस का जोर था. बड़े-बुजुर्ग कांग्रेसी थे. पर अधिसंख्य स्थापित अगड़े नेता लाल टोपी पहने बदलाव की शक्तियों की अगुआई कर रहे थे. परिवार के बुजुर्ग कांग्रेसी होते थे. हम युवा, कांग्रेस विरोधी. इसी परिवेश ने वह मानस दिया कि 1980 में कर्पूरी ठाकुर के आरक्षण के सवाल या 1991 में मंडल तक, हम सब का मानस समाज की यथास्थिति तोड़ने का बना. तब पत्रकारिता में भी ऐसी जमात कम थी. ये बातें दस्तावेज के रूप में मौजूद हैं. पर, इसी गांव में इस चुनाव में पाया कि राजनीति, जाति के सांचे से निकल कर गोत्र के दुर्ग में है. पर, उससे भी प्रभावी है पैसा. पैसे का प्रभाव हर क्षण गांव में बोलता है. दारू (पाउच) के असर के रूप में. तरह-तरह की गाड़ियों की सनसनाहट के रूप में. महंगी दो पहिया गाड़ी या चार पहिया वाहन. शरीर पर सोने के गहनों के रूप में. गागल्स के रूप में.

यह जयप्रकाश की जन्मभूमि है. चंद्रशेखर की कर्मभूमि है.’42 के हीरो चित्तू पांडे या ठाकुर जगन्नाथ सिंह जैसे लोगों का इलाका, जिनके नाम से अंगरेज भागते थे. 1980 के लोकसभा चुनाव में धर्मयुग (मुंबई) से चुनाव कवरेज के लिए बलिया आया. पत्रकार के रूप में पहली बार. क्रांतिकारी जगन्नाथ सिंह जीवित थे. पहलवान. विशाल शरीर. बड़े-बड़े पंजे. पूछा वोट किसे देंगे? कहा, जबान दे दिया, तो वोट दे दिया. यह 1857-1942 के बागी बलिया की धरती है. यह सड़े-गले मूल्यों का अवसान चाहनेवाली धरती. चुनाव में भी ऐसी ही ताकतों के साथ यह मिट्टी खड़ी होगी. यही इलाका कवि केदारनाथ सिंह का है. मशहूर ललित निबंधकार डॉ कृष्णबिहारी मिश्र का है. डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी, परशुराम चतुर्वेदी जैसे लोग इसी धरती पर हुए. भागवत शरण उपध्याय भी इसी धरती से थे.’42 में बलिया 15 दिनों के लिए आजाद हो गया था. यहां पहले कांग्रेस का जोर था. फ़िर समाजवादी ताकतों का.

फ़िर चरण सिंह का भी बोलबाला रहा. तब कांग्रेसी अगर जीप से प्रचार करते, तो समाजवादी या अन्य टमटम से. लाल टोपी लगा कर. तब सिद्धांत, नीति और आदर्शो के लिए टकराव होता था. सब साफ़ थे. कौन किसे वोट देगा या कौन किधर है? आज की तरह नहीं, अंत तक पता नहीं कि कौन किधर है? अब गांव के बड़े-बुजुर्ग या अधेड़ उम्र के भी लोग (जिनमें मूल्य और सरोकार है) चुनावों से उदासीन हैं. वे कहते हैं, सांपनाथ-नागनाथ, सब एक ही हैं. चुनावी राजनीति अब युवाओं का शगल है.

ये युवा कौन हैं? जो गांव से निकल नहीं सके या योग्यता व हुनर से कहीं जा न सके. अधिकतर बेरोजगारों की फ़ौज. जिन पर परिवार या अभिभावक का अंकुश या अनुशासन कम है. अपनी स्वतंत्र दुनिया ये युवा गढ़ रहे हैं. इनकी दुनिया के सपने हैं. कम समय में अकूत पैसा पाना. टीवी गांव-गांव पहुंच चुका है. टीवी के विज्ञापन दुनिया के इंद्रलोक का मोहक संसार इन युवाओं को चाहिए. सूरा के संग. बिना अर्जन और श्रम के युवाओं की यह टोली (चाहे जाति जो भी हो) संसार को अपने पांव के नीचे देखना चाहती है. चाहे मुंबई का अपराध संसार हो या ठेकेदारी-बिचौलिया का धंधा, इनकी आय के स्रोत हैं.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं. वे बिहार और झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उन्‍होंने यह लेख बलिया यूपी से के दौरे से लौटने के बाद लिखी है, जो प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुकी है. वहीं से साभार लिया गया है.

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