: खुद भरकर जमा करा रहे हैं प्रोफार्मा : सहारा ग्रुप अच्छा करने की कोशिश में सब गुड़ गोबर कर डालता है. इस बार भी ऐसा ही हो रहा है. राष्ट्रीय सहारा ने चुनावी राज्यों में पड़ने वाले यूनिटों में अपने प्रतिनिधियों को चुनावी सर्वेक्षण से संबंधित 'जन गण का मन' नाम का एक प्रोफार्मा सौंपा है. बताया जा रहा है कि इस प्रोफार्मा के निष्कर्ष के आधार पर ही वह अपने-अपने क्षेत्र तथा विधानसभाओं की तस्वीर प्रस्तुत करेंगे, हार-जीत का आधार तय करेंगे तथा बताएंगे कि किसी पार्टी की सरकार बन रही है, कौन लोगों का पसंदीदा मुख्यमंत्री है.
इस प्रोफार्म में लोगों से पिछले लोकसभा में किसे मतदान किया, कौन अच्छा मुख्यमंत्री हो सकता है. किस सरकार ने अच्छा काम किया, किस नेता को अच्छा मानते हैं, कौन सी पार्टी अच्छी है आदि से संदर्भित कई सवाल हैं. इसके बाद मतदाताओं का व्यक्तिगत ब्योरा है. यहां तक तो सब ठीक है. दिक्कत ये है कि राष्ट्रीय सहारा ने इस प्रोफार्मा को तैयार कराने का काम किसी एजेंसी से कराने की बजाय अपने प्रतिनिधियों के जिम्मे ही सौंप दिया है. प्रत्येक प्रतिनिधि को ऐसे कई सौ प्रोफार्मा दिए गए हैं, जिसे उन्हें अपने क्षेत्र के मतदाताओं से भरवाना है. प्रतिनिधि इस प्रोफार्म के कॉलम भराने में परेशान हैं.
बताया जा रहा है कि शुरुआत में तो प्रतिनिधियों ने किसी तरह कुछ फार्मों को सही ढंग से मतदाताओं से मिलजुलकर भरवाया. पर लगभग अपने क्षेत्र के सभी गांवों में जाने के फरमान के बाद प्रतिनिधि भी फैल गए. सभी गांवों में जाने की बजाय वे वहां इन गांवों के कुछ लोगों के नाम जानकर सब कुछ अपने हिसाब से भर दिया. जो प्रतिनिधि जिस पार्टी से मानसिक रुप में जुड़ा था, उस पार्टी के पक्ष में जमकर निशान लगाया तथा उस पार्टी व नेता को अच्छा बता दिया. कुछ प्रतिनिधियों को छोड़कर ज्यादातर ने ऐसा ही किया. अपने हिसाब से खुद प्रोफार्मा भरकर अपने-अपने मुख्यालयों को भेज दिया.
इस संदर्भ में पूछे जाने पर राष्ट्रीय सहारा के एक पत्रकार ने बताया कि अखबार पैसा हजार-पांच सौ देता है, पर चाहता है कि उसका हर काम हम लोग ही करें. हमसे खबरें भी चाहिए, विज्ञापन भी चाहिए और अब चुनाव में हम उनका प्रोफार्मा भी भरवाएं. अब हमलोगों के पास इतना पैसा नहीं है कि अपना तेल, अपनी गाड़ी लेकर दिन भर गांवों की खाक छानते फिरे, सो अपने-अपने हिसाब से जन गण का मन भरकर जिला कार्यालय में जमा करा दिया है. अब हमारे वरिष्ठ जिसका मन करे उसकी सरकार बनवाएं अपने को कुछ लेना-देना नहीं है. उसने बताया कि उसके परिचित और आसपास के सभी प्रतिनिधियों ने ऐसा ही किया है. बेचारे रात-रात भर जागरण प्रोफार्मा भरते रहे हैं.
इससे समझा जा सकता है कि राष्ट्रीय सहारा की पहल तो अच्छी है, पर बिना किसी योजना के तैयार होने के चलते यह उल्टी पड़ने जा रही है. हालांकि इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला है कि उनका सर्वेक्षण सही है या गलत, पर सहारा के नीति नियंताओं को इतना तो समझना ही चाहिए कि अगर वो अपने प्रतिनिधियों को कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंप रहे हैं तो उन्हें अतिरिक्त भुगतान या खर्च तो दे ही, पर ऐसा नहीं किया गया और प्रतिनिधियों ने सहारा इंडिया की तर्ज पर आधा सही-आधा गलत प्रोफार्मा भरकर जमा करा दिया है. अब देखना है कि राष्ट्रीय सहारा इन फर्जी आंकड़ों के आधार पर क्या निष्कर्ष निकालता है.





