पत्रकारिता को पेशा मान कर लोग अखबार निकालने लगते हैं और गुण की जगह अपनी पसंद के लोगों को संपादक बना देते हैं। इन संपादकों को खबर छपने के बाद क्या प्रभाव होगा इस का भी ज्ञान नहीं होता है। यदि यह कहे कि एक अखबार के संपादक सरदार शर्मा को यह भी पता नहीं है कि फ्रंट पेज पर कौन सी खबर छापनी चाहिये और कौन सी खबर नहीं, तो गलत नहीं है। बेचारे संपादक महोदय को खाद व्यापारी की मौत के बाद चाचा के हवाले से एक विवादित खबर छापना काफी महंगा पड़ गया।
खाद व्यापारी ऋषि अग्रवाल की मौत के बाद मृतक के चाचा की ओर से शेखर टाइम्स ने 22 जनवरी के अंक में खाद व्यापारी की मौत को फ्रंट पेज पर जगह दी। अखबार ने मृतक के चाचा के हवाले से लिखा है कि कृषि अधिकारी के कार्यालय का एक बाबू ढाई माह से ऋषि अग्रवाल को टरका रहा था। इसी में आगे लिखा है कि बाबू डीएम के नाम पर सुविधा शुल्क मांग रहा था। अपना नाम सुविधा शुल्क में घसीटे जाने से डीएम साहब खासे नाराज हैं। सूत्रों के अनुसार डीएम ने उप निदेशक सूचना को शेखर टाइम्स के संपादक को नोटिस देने के आदेश दिए। इसकी जानकारी होने पर संपादक महोदय डीएम से जाकर मिले और व्यक्तिगत तौर पर माफी मांगी।
सूत्र बताते हैं कि माफी के साथ उन्हें तगड़ी डोज भी मिली। इसका असर यह हुआ कि शेखर टाइम्स के 23 जनवरी के अंक में खबर का खंडन कर दिया गया। 'डीएम के नाम पर रिश्वत मांगना मिथ्या' शीर्षक से प्रकाशित खबर छापकर इसका ठीकरा मृतक के चाचा के सिर फोड़ दिया गया और चाचा के ही हवाले से लिखा कि वह उस समय भवावेश में कह गए थे। अब जानने वाले कह रहे हैं कि यह तो सरदार शर्मा की फितरत है। पहले……. हैं और फिर …… हैं।

पहले छापी खबर

फिर छापा खंडन
शाहजहांपुर से सौरभ दीक्षित की रिपोर्ट.





