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पहाड़ की जनता के साथ धोखा कर रहे हैं बीसी खडूड़ी

उत्तराखंड की बीजेपी सरकार को.. खंडूड़ी है जरूरी… का एक चुनावी नारा क्या मिला कि उसने इस पहाड़ी राज्य के जनहित के मुद्दों को ही जमीन में दफना दिया है. आज जहाँ पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली 60 प्रतिशत महिलायें खून की कमी के जूझ रही हों तथा 72 प्रतिशत महिलायें बिना इलाज के किसी न किसी बीमारी को ढोने को मजबूर हों, वहां करोड़ों रुपये के घोटाले हो जाने के बाबजूद मुख्यमंत्री खंडूड़ी ने उन पर एक जांच बैठानी भी जरूरी नहीं समझी. खंडूरी है जरूरी.. इसलिए उनसे कुछ सवाल करने जरूरी हैं.. खंडूड़ी जी ने मुख्यमंत्री काल के दौरान पूरे पहाड़ में घूम-घूमकर निशंक पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार के आरोप लगाए लगाए.. तथा इन आरोपों के समर्थन में बीजेपी हाई कमान से लेकर आरएसएस नेताओं तक अपनी बात पहुंचाई. खंडूड़ी द्वारा पेश सुबूतों के आधार पर दिल्ली के नेताओं को अपने चहेते निशंक की बलि देनी पड़ी.

उत्तराखंड की बीजेपी सरकार को.. खंडूड़ी है जरूरी… का एक चुनावी नारा क्या मिला कि उसने इस पहाड़ी राज्य के जनहित के मुद्दों को ही जमीन में दफना दिया है. आज जहाँ पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली 60 प्रतिशत महिलायें खून की कमी के जूझ रही हों तथा 72 प्रतिशत महिलायें बिना इलाज के किसी न किसी बीमारी को ढोने को मजबूर हों, वहां करोड़ों रुपये के घोटाले हो जाने के बाबजूद मुख्यमंत्री खंडूड़ी ने उन पर एक जांच बैठानी भी जरूरी नहीं समझी. खंडूरी है जरूरी.. इसलिए उनसे कुछ सवाल करने जरूरी हैं.. खंडूड़ी जी ने मुख्यमंत्री काल के दौरान पूरे पहाड़ में घूम-घूमकर निशंक पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार के आरोप लगाए लगाए.. तथा इन आरोपों के समर्थन में बीजेपी हाई कमान से लेकर आरएसएस नेताओं तक अपनी बात पहुंचाई. खंडूड़ी द्वारा पेश सुबूतों के आधार पर दिल्ली के नेताओं को अपने चहेते निशंक की बलि देनी पड़ी.

राज्य की जनता को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलते ही खंडूड़ी, भ्रष्ट लोगों को सलाखों के पीछे पंहुचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगें. पर कुर्सी मिलते ही खंडूड़ी ने एक रहस्यमय छुपी साध ली.. अब खंडूड़ी से एक सवाल पूछना लाजिमी है कि जिस निशंक को वे भ्रष्ट बताते थे उनके बारे में कुर्सी मिलते ही उन्होंने मौन क्यों साध लिया? इसका मतलब या तो या तो निशंक ईमानदार थे और खंडूड़ी ने हाई कमान को गुमराह कर उनकी बलि ली और या फिर उनका सारा खेल कुर्सी तक ही सीमित था. कम से कम उन्हें एक जांच तो बैठानी ही चाहिए थी. वैसे वे कांग्रेस राज के 56 घोटालों की जांच बैठाकर फ्लॉप हो चुके हैं, जिसकी जांच पर लाखों रुपये खर्च होने के बाबजूद पांच साल बाद भी कुछ नहीं निकल पाया. खंडूड़ी जैसे फ़ौजी अफसर पर मुझे भी आम उत्तराखंडी की तरह गर्व है और वहां की जनता ने उन्हें फ़ौज से सेवानिवृति के बाद उम्मीद से ज्यादा दिया है.. अब उनकी बारी थी जो वे नहीं दे पा रहे हैं.

दस साल में उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन बढ़ा है…. दुःख की बात है कि अभी तक पहाड़ों में बागवानी के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं बनी है यहाँ तक कि किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच की कोई व्यवस्था भी नहीं हो सकी है. महिलाओं के हेल्थ कार्ड की बात कोई नहीं करता. बेरोजगारी चरम पर है और दो हजार वेतन पर पहाड़ी लड़के शहरों में काम करने के लिए मजबूर हैं. वहां की जमीनों को औने पौने दामों पर दलाल लूट रहे हैं. जिसको रोकने की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है. खंडूड़ी जी के इर्द गिर्द भ्रष्ट नौकरशाही का कब्जा अब भी मौजूद है. और सबसे खतरनाक बात यह है कि पलायन के शिकार पहाड़ का युवा ही नहीं खुद खंडूड़ी व निशंक जैसे बड़े नेता भी हुए हैं और दोनों ने कठिन पहाड़ी क्षेत्र के बजाय कोटद्वार तथा डोईवाला जैसे मैदानी क्षेत्र को चुना. उन्हें अपने गिरेवान में झाँक कर देखना होगा कि क्या वे सच्चे अर्थ में पहाड़ की सेवा करना चाहते हैं या फिर पहाड़ की राजनीति करना चाहते है..   

लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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