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सुख-दुख...

… आखिरकार अमिताभ ने वसूल ही लिए सरकार से ढाई सौ रुपये

यह हम सभी जानते हैं कि सरकार से पैसा निकाल पाना कितना मुश्किल है. सरकार तो लोगों के टैक्स, दंड, फाइन आदि के पैसे निकलवाने में तनिक भी देर नहीं करती और कई तरीकों से सरकारी पैसा निकलवा ही लेती है. खास कर के यदि सामने वाला गरीब या साधारण आदमी हो, उसकी कोई खास पहुँच नहीं हो या उससे किसी सरकारी अधिकारी की मिलीभगत नहीं हो. लेकिन इसके विपरीत सरकार से कोई आदमी अपना पैसा निकलवा पाए, यह मामूली बात नहीं है. वह पैसा यदि सरकार पर लगाया गया दंड हो तब तो उसे निकलवाना लगभग असंभव सा होता है.

यह हम सभी जानते हैं कि सरकार से पैसा निकाल पाना कितना मुश्किल है. सरकार तो लोगों के टैक्स, दंड, फाइन आदि के पैसे निकलवाने में तनिक भी देर नहीं करती और कई तरीकों से सरकारी पैसा निकलवा ही लेती है. खास कर के यदि सामने वाला गरीब या साधारण आदमी हो, उसकी कोई खास पहुँच नहीं हो या उससे किसी सरकारी अधिकारी की मिलीभगत नहीं हो. लेकिन इसके विपरीत सरकार से कोई आदमी अपना पैसा निकलवा पाए, यह मामूली बात नहीं है. वह पैसा यदि सरकार पर लगाया गया दंड हो तब तो उसे निकलवाना लगभग असंभव सा होता है.

ऐसे ही एक विरले मामले में गृह विभाग, उत्तर प्रदेश शासन द्वारा अंत में बाध्य हो कर आईपीएस अधिकारी अमिताभ, जो वर्तमान में एसपी (रूल्स एवं मैनुअल) के पद पर तैनात हैं, को न्यायालय द्वारा आदेशित कॉस्ट की धनराशि प्रदान कर ही दी गयी. इनमें पहला 200 रुपये का कॉस्ट का दंड केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण, लखनऊ द्वारा मुक़दमा संख्या 179/2009 में दिनांक 15 जुलाई 2009 को आदेशित किया गया था. कारण यह था कि बार-बार मौका दिये जाने के बावजूद भी राज्य सरकार द्वारा कैट में काउंटर एफिडेविट प्रस्तुत नहीं किया जा रहा था. कैट ने जब इस मामले में राज्य सरकार को कई मौके दिये थे और हर मौके पर राज्य सरकार यही कह देती थी कि उसे काउंटर एफिडेविट प्रस्तुत करने के लिए थोडा और समय दिया जाए तब अमिताभ ने कैट के सामने यह आपत्ति रखी थी कि राज्य सरकार जानबूझ कर मामले को लंबा खींचना चाहती है और इसीलिए समय से काउंटर एफिडेविट नहीं प्रस्तुत कर रही है. कैट ने इस बात को सही मामते हुए राज्य सरकार पर दो सौ रुपये का दंड लगाया था.

इसी प्रकार एक दूसरे मामले में मुक़दमा संख्या 316/2008 में कैट ने 18 सितम्बर 2009 को राज्य सरकार पर पचास रुपये का कॉस्ट का दंड लगाया था. इस मामले में शासकीय अधिवक्ता बार-बार सुनवाई के समय अनुपस्थित हो रहे थे और उनके जूनियर हर बार मुक़दमा आगे बढ़वाये जा रहे थे. इसका दुष्परिणाम यह हो रहा था अमिताभ का यह मुक़दमा लगातार आगे बढ़ता जा रहा था और उन्हें इसका सीधा नुकसान हो रहा था. अंत में जब अमिताभ ने इस तरह बार-बार सीनियर वकील के नहीं आने पर आपत्ति प्रकट की और तारीख बढ़वाने का विरोध किया तो कैट ने राज्य सरकार पर पचास रुपये का कॉस्ट लगाया.

अमिताभ ने इन दोनों मामलों में 07 जुलाई 2010 को गृह विभाग, उत्तर प्रदेश को पत्र लिख कर कॉस्ट की धनराशि भुगतान करने के अनुरोध किया. उन्हें इस पत्र का कोई उत्तर तक नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने गृह विभाग को पत्र लिखना लगातार जारी रखा. किसी भी पत्र का कोई उत्तर नहीं. अंतिम बार उन्होंने दिनांक 12 नवंबर 2011 को गृह विभाग को फिर से अनुरोध किया. गृह विभाग द्वारा कैट के आदेश का अनुपालन करने से लगातार आनाकानी किया जाता रहा. लेकिन इस तरह लगातार प्रयास करने का परिणाम यह रहा कि अंत में 24 जनवरी 2012 को गृह विभाग ने डीजीपी कार्यालय के माध्यम से कैट के इन दोनों आदेशों के अनुसार ढाई सौ रुपये का कॉस्ट वादी के रूप में अमिताभ को प्रदान कर ही दिया.

वैसे तो कॉस्ट मात्र ढाई सौ रुपये का है और यह धनराशि आज के समय कुछ भी नहीं है. मैं समझती हूँ कि इससे ज्यादा खर्च तो अमिताभ को रजिस्ट्री में लगातार पत्र भेजने में हो गया होगा. पर इस मामले का महत्त्व इसीलिए है क्योंकि सरकार द्वारा इस तरह कोर्ट के आदेश पर कॉस्ट का वास्तविक भुगतान बहुत ही कम होता है. ज्यादातर मामलों में सरकार कोर्ट के इन आदेशों को नज़रंदाज़ कर देती है और वादी भी थक-हार कर बैठ जाता है. इस मामले में अमिताभ द्वारा लगातार प्रयास करने के कारण ही उन्हें कैट द्वारा दिये गए कॉस्ट के दंड की धनराशि प्राप्त हो सकी.

मैं इस मामले को इस लिए सामने रख रही हूँ कि यह दूसरे लोगों के लिए भी एक नजीर के रूप में काम आ सके कि यदि लगातार मामले का पीछा किया जाए तो सरकार को भी सही बात माननी पड़ती है, हाँ इसके लिए धैर्य की भी जरूरत होती है और समय भी बहुत लगता है. पर इस प्रक्रिया का अपना एक अलग आनंद भी तो है.

डॉ. नूतन ठाकुर

कन्‍वेनर

नेशनल आरटीआई फोरम

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