Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

विविध

मीडिया बना चुनावी मुद्दों पर परिचर्चा का बड़ा विकल्‍प

इस विधानसभा चुनाव में राजनीतिक संवाद के परंपरागत साधन और तौर-तरीक़े ग़ायब हो जाने से मीडिया लोगों के बीच चुनावी मुद्दों पर परिचर्चा का एक बड़ा विकल्प बनकर उभरा है. लगभग सभी टीवी चैनल और कई अख़बार भी नगर-नगर डगर–डगर अपनी सार्वजनिक चौपाल लगा रहे हैं. इन्हीं चर्चाओं से स्थानीय चुनावी मुद्दों का अहसास होता है और जनमत की बानगी भी मिलती है.

इस विधानसभा चुनाव में राजनीतिक संवाद के परंपरागत साधन और तौर-तरीक़े ग़ायब हो जाने से मीडिया लोगों के बीच चुनावी मुद्दों पर परिचर्चा का एक बड़ा विकल्प बनकर उभरा है. लगभग सभी टीवी चैनल और कई अख़बार भी नगर-नगर डगर–डगर अपनी सार्वजनिक चौपाल लगा रहे हैं. इन्हीं चर्चाओं से स्थानीय चुनावी मुद्दों का अहसास होता है और जनमत की बानगी भी मिलती है.

लोग भी इन परिचर्चाओं में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. टांडा में बुनकर समुदाय और फ़ैज़ाबाद में किसानों से बातचीत के बाद मुझे लगा कि शहरी मध्यमवर्ग और बुद्धिजीवियों से संवाद किया जाए, जो ज़्यादा व्यापक और पैनी नज़र रखते हैं. इसलिए मैंने गाड़ी नेशनल हाई-वे से बस्ती शहर के लिए मोड दी. यहाँ चाय पर क़रीब 15-20 प्रतिष्ठित नागरिकों से मुलाक़ात हुई. ये वकील, डॉक्टर, अध्यापक और पत्रकार ऐसे लोग हैं, जो दिनभर में तमाम तरह के लोगों से मिलते रहते हैं और थोड़ा गहन चिंतन-मनन करते हैं.

इंतज़ार : जैसे हर किसी को इंतज़ार था अपनी बात कहने के लिए एक माध्यम का. एडवोकेट भारत भूषण वर्मा ने बहुजन समाज पार्टी सरकार के पांच साल का मूल्यांकन करते हुए शुरुआत की. उनका कहना था, "सरकार बहुत अच्छी तो नहीं चली. हमें तो नहीं लगता कि कोई विकास हुआ हो या कोई इंडस्ट्री क़ायम हुई हो." थोड़ा तह में जाते हुए डॉक्टर एआर ख़ान ने कहा, "सत्ता केंद्रित होने से, सारी शक्ति मुख्यमंत्री के पास रहने से यह नॉन फ़ंक्शनिंग सरकार थी. मंत्री भी इसमें असहाय थे. करप्शन ज़्यादा था."

मैंने सवाल किया कि इसका लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ा? बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मोहम्मद इक़बाल ने कहा, "क़ानून व्यवस्था की समस्या है और पांच साल में कुछ हुआ ही नहीं, विकास के नाम पर." डॉक्टर इक़बाल में माया सरकार को 10 में से केवल दो नंबर दिए. यह आम शिकायत थी कि मुख्यमंत्री मायावती ने सारे पैसे हर जगह अपना नाम लगवाने, अपनी मूर्ति लगवाने और हाथी बनवाने में ख़र्च किए, पब्लिक को कोई राहत नहीं मिली. काम के नाम पर लोगों ने उदाहरण देकर कहा कि अस्पताल और सड़कें बन सकती थीं. पानी-बिजली की व्यवस्था हो सकती थी. नालियां ठीक हो सकती थीं. यह भी सुझाव आया कि मूर्तियों की जगह यूनिवर्सिटी बन सकती थीं, जिससे लोगों को उच्च शिक्षा मिलती.

शिकायत : एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी नियाज़ अहमद को शिकायत थी कि सरकार बात सर्वजन समाज की करती थी, लेकिन काम केवल दलित समुदाय के हित में होते थे. ट्रांसफ़र पोस्टिंग में केवल दलित अफसरों को अच्छी जगह तैनाती देने की शिकायत है. मुझे जिज्ञासा हुई कि अगर सरकार से इतनी शिकायतें थीं, तो लोग विरोध क्यों नही करते थे. एक सीनियर वकील विपुल वर्मा ने कहा, "सबसे बड़ी समस्या यही थी कि अगर कोई आदमी बिजली-पानी जैसे मुद्दे पर भी अपनी प्रतिक्रया व्यक्त करना चाहता था या विरोध प्रदर्शन करना चाहता तो प्रशासन उसे तुरंत लाठी-डंडे के ज़ोर से दबा देता था. कोई राजनीतिक दल अगर धरना प्रदर्शन करना चाहता था, उसको दबा दिया जाता था."

इन लोगों का कहना है कि अब सारा ग़ुस्सा गुबार चुनाव में वोट के माध्यम से ही निकलेगा. एडवोकेट विपुल वर्मा ने कहा, "लोगों की आवाज अगर नहीं सुनी जाएगी तो लोग वोट देकर दिखाएँगे. उनके पास और कोई हथियार तो है नहीं." बस्ती में इन लोगों की बातचीत से मुझे टांडा के एक प्रतिष्ठित नागरिक मोहम्मद अहमद की यह याद आ गई कि उत्तर प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर पूरे ज़ोरों पर बह रही है.

जवाब : बहस का अगला बिंदु था कि फिर उत्तर प्रदेश में अच्छी सरकार कौन दे सकता है? इसके जवाब में एक जवाब आया कांग्रेस पार्टी. तर्क यह कि मायावती या मुलायम अगर ग़लती करते हैं, तो उनके ऊपर कोई ऐसा आदमी नहीं है, जो उन पर ब्रेक लगा सके. इसलिए राष्ट्रीय पार्टी बेहतर है. लेकिन फ़िलहाल कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इतनी मज़बूत नहीं दिखाई दे रही कि सरकार बना सके. इन सब लोगों में आम राय यह थी कि उत्तर प्रदेश में मिली-जुली सरकार बनने के आसार हैं.

बहुमत इस राय का कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मिलकर सरकार बनाएंगे. जबकि दो लोगों की राय थी कि बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से सरकार बना सकती है. भाजपा इस संभावना का ज़ोरदार खंडन कर चुकी है, लेकिन अतीत को देखते हुए लोगों को उसके खंडन पर भरोसा नहीं. बहरहाल, चलते-चलते यह भी बताते चलें कि अभी बहुत से मतदाता ढुलमुल हैं, जो अपनी राय मतदान से ठीक पहले बनाते हैं और कई बार यही निर्णायक भूमिका अदा करते हैं.

वरिष्‍ठ पत्रकार रामदत्‍त त्रिपाठी का यह आर्टिकल बीबीसी पर प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...