जी हां, ये दृश्य दिल्ली के दूर के जिलों में दिखने लगा है. अगर स्ट्रिंगरों को कोई चैनल पैसा न देगा तो क्या होगा, सब आपस में मिल जाएंगे और एक साझा दुकान खोल लेंगे, यही है न्यूज चैनलों की दुकान.. आ जाओ… खबर देने के लिए.. विज्ञापन देने के लिए.. सुख दुख बताने के लिए… और स्टिंग कराने के लिए. क्योंकि स्ट्रिंगरों को भी तो अपना पेट जिलाना है, बच्चे पालने हैं. केवल संपादकों के पास ही बच्चे व पत्नी तो होते नहीं. उनके स्ट्रिंगरों के पास भी होते हैं. वे खुद लेंगे कई लाख रुपये महीने और स्ट्रिंगरों को धेला भी न देंगे. ऐसे में क्या होगा.
वैसे में यही होगा कि स्ट्रिंगर सब आपस में मिलकर हंटिंग करेंगे और उससे मिलने वाले आर्थिक लाभ को आपस में बाट लेंगे. पत्रकारिता की बड़ी बड़ी बातें व बकचोदियां करने वाले नेता, जज, पत्रकार, अफसर सबके सब तब दोगले साबित हो जाते हैं जब स्ट्रिंगर पाते हैं कि उनकी बातें केवल हवा हवाई होती है, उसका जमीनी असर कुछ नहीं क्योंकि जमीन पर मीडिया के मालिकों द्वारा कमाई की जाने वाले अरबों की कमाई का एक धेला नहीं पहुंच रहा.
उत्तराखंड के टिहरी जिले का वीडियो नीचे दिया जा रहा है. वहां एक ही इन्सान कई चैनल का रिपोर्टर है या कई रिपोर्टर मिलकर एक आफिस खोल चुके हैं, यह बता पाना मुश्किल है. वीडियो में जो दुकान दिख रही है, वह एक एसटीडी की दुकान है, जिस पर बोर्ड में तमाम न्यूज़ चैनल के नाम दिए गए हैं. उत्तराखंड में चुनाव चल रहा है. हर नेता चाहता है कि कम पैसा बटे और ज्यादा कवरेज मिले. ऐसे में ये दुकानें बड़ी काम की हैं. हालांकि कई लोग इस तरह की दुकानों से नाराज हैं.
नाराज पत्रकारों का कहना है कि हर नेता सिर्फ और सिर्फ इस दुकान के मालिक पत्रकार को ही पूछ रहा है. ये एसटीडी दुकान के मालिक आजतक स्टार न्यूज़ सहित कई चैनलों और कई मैग्जीनों के लिये काम करते है. टिहरी में हर पत्रकार इन्हें जानता है. और कई लोग इनसे परेशान भी रहते हैं कि आखिर कोई कैसे मीडिया की दुकान एक ही जगह खोल सकता है. कहने वाले कहते हैं कि जैसे ही कोई नया न्यूज़ चैनल आता है, सबसे पहले इन भाई साहब के पास ही उसकी आईडी आ जाती है. ये दुकानदार पत्रकार महोदय किसी नए पत्रकार की बारी आने ही नहीं देते. इस कारण बाकी सभी पत्रकारों के पेट में दर्द होता रहता है.
ये है दुकान. देखने के लिए इस वीडियो लिंक पर क्लिक करें….





