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उत्‍तराखंड में दलालों के हाथों में गिरवी हुई पत्रकारिता

इस बात को कोई नकार नहीं सकता कि आज के दौर में मीडिया का प्रभाव यत्र-तत्र-सर्वत्र है. देश के कई बड़े घोटाले, झूठ के पुलिंदे सिर्फ और सिर्फ मीडिया के दबाब के चलते ही लोगों के सामने आ पाए. शुरू से ही पत्रकारों को बुद्धिजीविओं की श्रेणी में पहला स्थान दिया जाता है. सोचने की ताक़त और समाज को सच का आईना दिखाना पत्रकारिता का पहला उसूल है. यह वो सिद्धांत हैं जिसके बिना पत्रकारिता मृत है. यह समाज का कड़वा सच है कि आज के युग में भ्रष्‍टाचार के दलदल ने लगभग सब कुछ निगल लिया है. ऐसे में सच्चाई, ईमानदारी की बात करने वाले को लोग बेवक़ूफ़ से ज्यादा कुछ नहीं समझते. 

इस बात को कोई नकार नहीं सकता कि आज के दौर में मीडिया का प्रभाव यत्र-तत्र-सर्वत्र है. देश के कई बड़े घोटाले, झूठ के पुलिंदे सिर्फ और सिर्फ मीडिया के दबाब के चलते ही लोगों के सामने आ पाए. शुरू से ही पत्रकारों को बुद्धिजीविओं की श्रेणी में पहला स्थान दिया जाता है. सोचने की ताक़त और समाज को सच का आईना दिखाना पत्रकारिता का पहला उसूल है. यह वो सिद्धांत हैं जिसके बिना पत्रकारिता मृत है. यह समाज का कड़वा सच है कि आज के युग में भ्रष्‍टाचार के दलदल ने लगभग सब कुछ निगल लिया है. ऐसे में सच्चाई, ईमानदारी की बात करने वाले को लोग बेवक़ूफ़ से ज्यादा कुछ नहीं समझते. 

गलती उनकी भी नही, दरअसल हवा ही कुछ ऐसी चल रही. भ्रष्‍टाचार का अंधाकार इस हद तक हावी हो गया है कि उम्मीद का दीपक भी इसके सामने टिक नही पता.. आखिर करे तो करें क्या. हद तो तब हो जाती है जब देश का चौथा स्तम्भ हाशिये कि कगार पे आ जाये. कुछ ऐसा ही अनुभव रहा मेरा उत्तराखंड चुनाव की कवरेज दौरान. पीड़ा और अधिक बढ़ जाती है जब आप उत्तराखंड की मिट्टी से ही सम्बन्ध रखते हैं. शायद आप कुछ हद तक मेरे हृदय की पीड़ा समझ सकें. आप में से कई लोग इस बात से इत्तेफाक रखेंगे कि आज के राजनेता हों या फिर चुनाव के पहले घर-घर जाने वाले प्रत्‍याशी… वोटर्स के मन में इन लोगों के प्रति ज़रा सा भी विश्वास नही. हालात ही कुछ ऐसे हैं कि आप विश्वास करें भी तो कैसे… चुनावी मौसम में कहीं नोटों की बहार है तो कही शराब का खुमार है.. अजी क्या करियेगा… पर हद तो तब हो जाती है जब देश के चौथे स्तम्भ को कुछ फर्जी लोग पैसा उगाही का धंधा बना लें.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में मुझे कुछ ऐसा ही ड्रामा देखने को मिला.. देवभूमि में कुछ फर्जी लोगों के चलते सरे आम बेआबरू हो रही पत्रकारिता और इसकी आड़ में हो रही दलाली… चुनाव  की इस बयार में जहां प्रत्‍याशी चुनावी अखाड़े में परचम लहराने को कोई भी हद पार करने से नहीं हिचकिचा रहा.. तो वहीं ऐसे दलालों की कमी नहीं जो पैसे लेकर आपके पक्ष में खबर दिखने से गुरेज़ नहीं करते (पेड न्यूज़)… ऐसे ऐसे लोग पत्रकार का तमगा लगाये घूम रहे हैं जिनका दूर-दूर तक पत्रकारिता से कोई भी वास्ता नही… बस मतलब है तो पैसा कमाने से… यहाँ पत्रकारिता के नाम पे दलाली पूरी तरह फल फूल रही है… इन दलालों में से ज़्यादातर लोग दबंग किस्म के हैं, जिनको किसी भी किस्म का डर या खौफ नहीं… लूटने का यह आलम है कि कुछ समय में इन लोगों ने बड़ी-बड़ी कोठियां खड़ी कर ली हैं. फिर कहते हैं पहाड़ी सीधे होते हैं… इसमें कोई शक नहीं कि देव भूमि की मिट्टी में छल-कपट नहीं पर यहाँ के लोग इतने लाचार भी नहीं कि कोई भी बेच के खा जाये.

पत्रकारिता को बेचने वाले दलालों के लिए एक सुझाव है… आप बेशक दलाली करिए.. आपके लिए आसमान और भी हैं… कम से कम पत्रकारिता को तो बदनाम न करें… इमान की बातें आप लोगों के सामने करना बेईमानी सी है… क्यंकि कुछ बदलने वाला नहीं… आने वाले समय में दलाली का यह विष पूरी तरह देवभूमि की नस नस में ज़हर बन के फ़ैल जायेगा… यह रास्ता विकास उत्तराखंड को विकास नहीं विनाश की तरफ ले जा रहा… सवाल यह नहीं कि इस हाशिये का ठीकरा किसके सर थोपा जाये… सवाल यह है कि इस राज्य का गौरव बरकरार रखते हुए कितने लोग इसको विनाश से बचाने को तैयार हैं.

लेखिका डाली जोशी 'अपराजिता' मूलरूप से उत्‍तराखंड की रहने वाली हैं तथा दिल्‍ली में रहकर टीवी पत्रकारिता कर रही हैं. कविताओं पर इनके तीन कलेक्‍शन प्रकाशित हो चुके हैं. कहानियां और लेखों के साथ ये अक्‍सर हस्‍तक्षेप करती रहती हैं.

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