अभी सप्ताह भर पहले छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के कलेक्टर ने पूरे जिले को ''घटिया'' कह दिया. एक नहीं अनेक बार कहा. वहां लोग गुस्से मे आ गए और 'जशपुर बंद'. 'जशपुर जिला' बंद रहा. खबर तो छपी मगर जैसा प्रतिकार होना था, नहीं हुआ. यहाँ की पत्रकारिता सत्ता-प्रशासन से आतंकित रहती है. मेरा एक शेर है- ''जिसे चाहिए सुविधाएँ वो, सच कहने से डरता होगा''. कलेक्टर अभी तक वहीं है. कम से कम उसका तबादला तो होता, यही सजा काफी होती उसके लिए. 'बड़ा' पद मिल जाये तो घमंड आ जाता है. रायगढ़ जिले के एक कलेक्टर ने एक वरिष्ठ पत्रकार को पिछले साल भद्दी गाली दे कर 'गेटआउट' कह दिया था.
कमजोर मनुष्यों के साथ ऐसा होता है. अनेक कलेक्टर इसी अकड़ के शिकार रहते हैं. कलेक्टर हो जाने का मतलब राजा हो जाना नहीं होता. आप जनता के नौकर है, उन पर राज करने भेजे गए सामंत नहीं है. भाषा, व्यवहार का संयम जरूरी है लेकिन यह सब वे ही कर पाते हैं, जिनको अच्छे संस्कार मिले है. लेकिन आजादी के बाद हमारे यहाँ कलेक्टरों को जितने अधिकार दे दिए गए हैं, उसके कारण वे 'मनुष्य' नहीं, 'कलेक्टर' हो जाते हैं, और वे अंगरेजों के ज़माने के कलेक्टरों जैसी हरकतें करने लगते हैं. मुख्यमंत्री तक बात पहुँची तो कलेक्टर ने खेद जताया है. मगर क्या इस खेद से कलेक्टर का पाप-कथन धुल जायेगा? कलेक्टर मुस्कराते क्यों नहीं? सहज क्यों नहीं रहते? ये तथाकथित बड़े पद क्यों ऐसी 'हीन-उच्चता' के शिकार होते हैं?





