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कैनविज टाइम्स दैनिक के रूप में हुआ प्रकट, पढ़ें दीन का विशेष संपादकीय

लखनऊ : कैनविज टाइम्स नामक अखबार अब लखनऊ शहर में दैनिक के रूप में प्रकट हो गया है. इस री-लांचिंग पर इस अखबार के प्रधान संपादक प्रभात रंजन दीन ने पहले पेज पर लंबा चौड़ा संपादकीय लेख लिख मारा है. क्या कुछ समझाया सिखाया बताया है उन्होंने, खुद पढ़िए और जानिए…

लखनऊ : कैनविज टाइम्स नामक अखबार अब लखनऊ शहर में दैनिक के रूप में प्रकट हो गया है. इस री-लांचिंग पर इस अखबार के प्रधान संपादक प्रभात रंजन दीन ने पहले पेज पर लंबा चौड़ा संपादकीय लेख लिख मारा है. क्या कुछ समझाया सिखाया बताया है उन्होंने, खुद पढ़िए और जानिए…

आपकी बंदूक और मेरा कंधा

प्रभात रंजन दीन

फिर एक अखबार निकल रहा है। फिर एक संपादक विशेष संपादकीय लिख रहा है। लेकिन इस अग्रलेख को आप संपादकीय मत मानें और इसे लिखने वाले को न संपादक। भारी-भारी संज्ञाओं-शब्दावलियों-संबोधनों के कारण ही संपादकों का दिमाग सातवें आसमान पर उडऩे लगा है और आम आदमी उसकी निगाह में बहुत नीचे सतह पर कीड़े-मकोड़े की तरह दिखने लगा है। इस लेख में आपको फिर से… और फिर से दोहराई जाने वाली किस्म किस्म की सैद्धांतिक कलाबाजियां नहीं दिखेंगी, इसमें विरुदावलियां नहीं सुनाई देंगी आपको। फिर से बेमानी बौद्धेय का प्रदर्शन नहीं दिखेगा। फिर से घिसे पिटे थके रास्तों को रंग-रोगन से पोत कर नई लीक बनाने का मुगालता नहीं परोसा जाएगा। फिर से अखबार पढ़वाने के लिए आपके सामने शाब्दिक-पदार्थिक मायाबाजी का धोखाजाल नहीं बिछाया जाएगा।

इस लिखे को आप अपनी बंदूक से दगी गोली का धमाका और मेरे कंधे का इस्तेमाल मानिएगा। संपादकों-पत्रकारों-नेताओं-नौकरशाहों-दलालों की साठगांठ ने समाज को दिग्भ्रमित करके रख दिया है, भटका दिया है… इसलिए पाठको, हम अपने अंदर उबलते-खौलते मौन को उड़ेलने के लिए कुछ साफ-सपाट शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, आप इसे दोहराए हुए शब्द मत मानिएगा, महसूस कीजिएगा कि हमारे शब्द हमारी आपकी आत्मा की तरह बिल्कुल मौलिक हैं, बिंदास हैं… घिसे-पिटे दोहराए-तिहराए नहीं।

‘कैनविज टाइम्स’ दैनिक अखबार के रूप में आपके सामने है… लेकिन आप इसे क्यों पढ़ें? आपके सामने कई और अखबार आते हैं, आ चुके हैं और आते रहेंगे, लेकिन आप इसे क्यों पढ़ते हैं? पढ़ते हैं या लेते हैं? कभी सोचा है आपने? यह बड़ा सवाल है, आप मंथन तो करें… इसका जवाब तो ढूंढें़! देखिए, असलियत से नजरें बचाए बगैर अगर हम सही उत्तर का सामना करें तो हमारे मन से साफ आवाज आएगी कि हम कोई भी उपहार पा जाने के लिए अखबार खरीदते हैं और रद्दी में बेचने के लिए उसे संजो कर रख देते हैं, हम अखबार को उसके आत्मिक वजन के बजाय उसके भौतिकवजन से पहचानते हैं, यह सोचे बगैर कि हमारा सम्पूर्ण नागरिकीय अस्तित्व अखबार के बदले गिफ्ट और अखबार की कबाड़ से मिलने वाली कीमत के निहायत ही घटिया से तोलमोल में फंस कर रह गया है।

हम अखबार पढ़ते नहीं, उस पर घिसटते हैं… चेतनाहीन चलन को चालू रखते हैं, नस्ल दर नस्ल। हम खुद को तो नष्ट कर ही चुके, भावी पीढिय़ों को भी सौदा-संस्कार के संसार में धकेल रहे हैं। कभी दो पेज का सादा अखबार हमारी नसों में अंगारे भर देता था, हमारे दिल-दिमाग को झंकृत कर रखता था और देश-समाज के सकारात्मक परिवर्तन में हमारी भूमिकाएं अदा करा लेता था, लेकिन आज रंगीन पेजों से भरपूर अखबार हमें बर्फ बना रहे हैं, हमारे दिल-दिमाग को काठ मार रहे हैं, समाज हमारे आपके होते हुए गर्त की तरफ जा रहा है, पर हम कुछ कर नहीं पा रहे… क्यों? कभी सोचते हैं आप इस फर्क के बारे में? यदि नहीं सोचते तो आप यह लेख मत पढ़ें… और यदि सोचते हैं तो केवल सोचें नहीं… अखबार ऐसा जो सटीक लक्ष्य साध सके। पत्रकार और संपादक ऐसा जो आपका मित्र भी हो और आपकी सुरक्षा में उठा हथियार भी। अखबार ऐसा जो आपको भेड़ों की भीड़ का हिस्सा बनने से रोके।

अखबार ऐसा जो सुबह जीता-जागता आपके हाथों तक पहुंचे और आपको जाग्रत कर दे, जीवंत बना दे। अखबार ऐसा जो आपकी मूर्छा तोड़े और अनैतिकता के खोखले तिलस्म से खींच कर यथार्थ की कठोर जमीन पर ला पटके। अखबार ऐसा जो आपके पूरे व्यक्तित्व में, समाज में, सरोकारों में सत्य और साहस की प्राकृतिक सुगंध भर दे… लेकिन ऐसा अखबार बनाएगा कौन? यह सवाल सामने है। आपने देश बनाया, तो देश का हाल सामने है। आपने समाज बनाया, तो उसकी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं। आपने सियासतदानों को बनाया, तो उन्होंने देश-समाज को नाबदान बना डाला और पूरा लोकतंत्र, सम्पूर्ण तंत्र और समग्र मीडिया उस गंदे नाबदान में जाकर घुस गया, उसी में बस गया… तो कौन बनाएगा हमें खबरदार करने वाला अखबार? …और समझेगा कौन कि कौन कर रहा हमें खबरदार और कौन बना रहा हमें खरीदार? विज्ञान के विकास ने सूचनाओं का रास्ता सुगम कर दिया है।

खबरें घटना के साथ ही आपका दरवाजा खटखटाने लगती हैं। सुबह अखबार में आपको सारी खबरें जानी-सुनी-देखी लगती हैं। लेकिन क्या आपको लगता है कि खबरें जो आपने जानी-सुनी-देखीं उससे काम चल गया? क्या शाम को टीवी पर दिखी और सुबह अखबार में छपी खबरें आपके दिमाग का सांकल खडख़ड़ाने में सक्षम होती हैं? भ्रष्टाचार पर बहस आयोजित कराते या करातीं दागदार-शानदार पत्रकार/पत्रकारा और उसमें बात-बहादुरी करते भ्रष्टधन्य चेहरे क्या आपकी विचार-धारा को सुगबुगाते हैं? नैतिकधन में दो कौड़ी के लोगों के अखबारों में छपे लेख क्या आपको असली आजादी के रास्ते की तरफ ले जाते हुए दिखते हैं? फिल्म अभिनेत्रियों के गर्भवती होने की सुर्खियां और आम गर्भवती महिलाओं की सडक़ छाप मौतों के प्रति शातिराना उपेक्षा, बार गर्ल की हत्या पर चिल्लपों और न्याय के लिए कानून के दरवाजे पर जिंदगी घिस देती महिलाओं के प्रति आपराधिक मौन, मॉडल के वस्त्र खिसक जाने पर उसे और उघारने का मीडियाई जतन, घपले-घोटालों के सबूत मिटाए जाने की तसल्लीदार मुहलत बख्श दिए जाने के बाद होने वाले प्रायोजित खुलासे, घूस लेकर बड़े-बड़े आकार में छापी जाने वाली खबरों से टुच्चे नेताओं का महिमामंडन, बुंदेलखंड की राजनीति पर खबरों की भरमार लेकिन बुंदेलखंड की भुखमरी पर पाखंड, प्रदेश को खंडित किए जाने के तिकड़मों को तरजीह लेकिन समाज को जोडऩे की पहल पर शून्य… आम आदमी की घनघोर उपेक्षा भी और आम आदमी से ही फरेब!

यदि इसे ही आप अखबार मानते हैं और ऐसा करने वालों को ही पत्रकार… तो हम ऐसे पत्रकार और ऐसा अखबार होने से इन्कार करते हैं। हम तो मानते हैं कि शब्द में इतनी ताकत है कि समाज के किसी भी बदनुमा चेहरे को भौतिक तौर पर तमाचा मारने की जरूरत नहीं। शब्द बिगुल की तरह बजते हैं और महाभारत रच देते हैं। पर इसके लिए जरूरी है कि शब्द कृत्रिम न हों, प्रायोजित न हों, भ्रष्ट न हों, नकारात्मक न हों… शब्द तब ब्रह्म है… कोई अखबार चलो ऐसा भी बनाया जाए, शब्द को ब्रह्म की तरह उसमें बसाया जाए…

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