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चौखंडी और पाठा के लोगों का नारा- पानी नहीं, तो वोट नहीं

इलाहाबाद का त्रिवेणी संगम। वेद-पुराणों में इस संगम के महात्म पर बड़ी-बड़ी बातें कही गई हैं। हिंदुओं का ये पवित्र तीर्थ स्थल है। कहते हैं, यहां समुद्र मंथन के बाद अमृत की कुछ बूंदे गिरी थीं, जिसे आधुनिक समाज या कलयुग के लोग आचमन कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। कुंभ मेला उसी का प्रतीक है। गंगा और यमुना का यह संगम स्थल हिंदू समाज के लिए चाहे जितना भी पवित्र क्यों न हो, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यहां जनता, नेताओं और पार्टी के बीच संगम दिखाई कहीं नहीं पड़ रहा है। संगम तट पर लगे माघ मेले में हजारों-लाखों की भीड़ को आप देख सकते हैं। पंडों, पुजारियों, दुकानदारों, फेरीवालों, ग्राहकों और दर्शकों समेत मेले में घूम रहे दलालों, ठगों और राजनीतिक एजेंटों से भी आप यहां मिल सकते हैं।

इलाहाबाद का त्रिवेणी संगम। वेद-पुराणों में इस संगम के महात्म पर बड़ी-बड़ी बातें कही गई हैं। हिंदुओं का ये पवित्र तीर्थ स्थल है। कहते हैं, यहां समुद्र मंथन के बाद अमृत की कुछ बूंदे गिरी थीं, जिसे आधुनिक समाज या कलयुग के लोग आचमन कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। कुंभ मेला उसी का प्रतीक है। गंगा और यमुना का यह संगम स्थल हिंदू समाज के लिए चाहे जितना भी पवित्र क्यों न हो, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यहां जनता, नेताओं और पार्टी के बीच संगम दिखाई कहीं नहीं पड़ रहा है। संगम तट पर लगे माघ मेले में हजारों-लाखों की भीड़ को आप देख सकते हैं। पंडों, पुजारियों, दुकानदारों, फेरीवालों, ग्राहकों और दर्शकों समेत मेले में घूम रहे दलालों, ठगों और राजनीतिक एजेंटों से भी आप यहां मिल सकते हैं।

प्रदेश की राजनिति से किसी को कोई मतलब नहीं है। संगम तट पर लाखों की भीड़ जरूर है, लेकिन वह सिर्फखुद में खोई हुई है। इसे आप मजाक कहें या राजनीति के प्रति लोगों में घृणा का भाव, लेकिन इतना तय है कि इलाहबाद मंडल चुनावी तस्वीर साफ नहीं है। लगता है, यहां इस समय छाया घना कोहरा चुनावी माहौल पर भी अपनी छाप छोड़ रहा है।

इलाहाबाद मंडल के जिले हैं- इलाहाबाद, कौशांबी, प्रतापगढ़ और फतेहपुर। इनमें 12 विधानसभा सीटें इलाहाबाद की हैं, जबकि तीन सीटें कौशांबी की और सात सीटें प्रतापगढ़ की हैं। फतेहपुर की छह सीटों पर चुनाव चतुष्कोणीय कहो या लड़ाई इतनी बढ़ गई है कि स्थानीय जनता हतप्रभ है। स्टोरी के ‘फ्लैश बैक’ में हम आपको ले चलेंगे यमुना नदी के उस पहाड़ी क्षेत्र पर जिसे ‘पाठा’ के नाम से जाना जाता है। इसकी तुलना उड़ीसा के कालाहांडी या बुंदेलखंड से की जाती है। हम आपको इलाहाबाद के ब्राह्मण बांकुरों से भी परिचय कराएंगे और बताएंगे इस मंडल में फंसी इनकी प्रतिष्ठा के बारे में। लेकिन सबसे पहले परिचय कराते हैं इलाहाबाद के चौखंडी मोहल्ला से।

यह वही मोहल्ला है जहां के लोग एक माह मेहनत करके सालों भर खुशियां मानते हुए अपना घर चलाते हैं। यह इलाहाबाद के संगम पर लगने वाले मेलों, कुंभों में हंसाकर, रुलाकर, डराकर, धमकाकर और धर्म के नाम पर पैसा वसूलने वाले पंडों का मोहल्ला है। आठ से 10 हजार आबादी वाला यह मोहल्ला भले ही पंडों के नाम से चर्चित है और भाजपा के समर्थकों के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस बार इस मोहल्ले के मतदाताओं की सोच बदल गई है। राम पुकार पांडेय, संयोग शर्मा और विद्याधर स्नेही की बातों पर यकीन करें, तो इस दफा चौखंडी मोहल्ला भाजपा को वोट नहीं देगा। कारण? भाजपा ने चौखंडीवासियों के लिए कुछ नहीं किया है। पंडों की इस नगरी से कोई यह नहीं समझे कि यह ब्राह्मणों या अन्य अगड़ी जाति का मोहल्ला है। इस मोहल्ले में हर जाति-प्रजाति, दलित, पिछड़े सभी रह रहे हैं। लेकिन सबका पेशा पंडागीरी करना ही है।

सूरतराय कहते हैं, ‘भाजपा को हम लोगों ने बहुत बार वोट दिया, लेकिन चौखंडी तो वहीं का वहीं है। रात में बिजली और दिन में पानी के लिए बिलखते रहते हैं और नेताओं के पास जाओ, तो विपक्ष की सरकार का हवाला देकर टरका दिया जाता है।’

ठूंठ खेती, सूखे तालाब, कातर निगाहें : यमुना का पहाड़ी क्षेत्र पाठा के नाम से जाना जाता है। दरअसल, यह इलाका गंगा और यमुना का दोआब पहाड़ी क्षेत्र है। अब इसे लोग ‘मिनी बुंदेलखंड’ भी कहने लगे हैं। ठूंठ खेती, सूखे तालाब और कातर निगाहें। चप्पे-चप्पे पर उपेक्षा की कहानी। यहां पानी के लिए जब इस मौसम में जंग हो रही है, तो गर्मी के दिनों की कल्पना आप खुद ही कर सकते हैं। कई दफा कांग्रेस और गैर कांग्रेसी दलों की सरकारें आर्इं, लेकिन पाठा के दर्जनों गांवों की तस्वीरें नहीं बदलीं। अब यहां वोटर पानी मांग रहा है। वोट और पानी आमने-सामने है। पानी नहीं, तो वोट नहीं… के नारे गली-गली में लग रहे हैं और नेताओं के लोग मुंह छुपाते-दुबकते फिर रहे हैं।

पाठा का चर्चित इलाका है शंकरगढ़। बदहाली के लिए बदनाम। इस इलाके के ‘हिनोती पांडेय’ गांव के लोगों ने इस बार चुनाव बहिष्कार का निर्णय ले लिया है। यही हाल गाढ़ा, कटरा, बिहरिया अभयपुर, बसहरा, गढ़वा, टकटई और रानीगंज के लोगों का भी है। रानीगंज के अनंत सिंह, फुलेन और विशंभर ताल ठोककर किसी को वोट नहीं देने की बात कह रहे हैं। गाढ़ा के मंजीत सिंह, बालेश्वर और संतोष शर्मा के निशाने पर बसपा है, तो मोहन और रवींद्र के निशाने पर सभी पार्टियां। मोहन कहते हैं कि सभी दलों ने पाठावासियों का खून पिया है। हर साल हम वोट देते हैं भले के लिए, लेकिन हमारा कुछ भला नहीं होता। हमारे गांव के लोग पानी और भूख की वजह से बाहर भाग रहे हैं, लेकिन शहरों में बैठे नेता पानी बहाते नजर आ रहे हैं।

इलाहाबाद की राजनीति : इलाहाबाद की राजनीति पंडित नेहरू से शुरू हुई थी, लेकिन आज कांग्रेस की जो स्थिति है, उसे बयां नहीं किया जा सकता। चुनाव में कांग्रेस अगर यहां कुछ बेहतर कर पाती है, तो संभव है कि नेहरू जी की आत्मा को शांति मिलेगी, क्योंकि पिछले 20 सालों में भाजपा, सपा और बसपा ने कांग्रेस को जमींदोज ही कर दिया है। इस इलाके के चर्चित नेता हैं भाजपा के केशरीनाथ त्रिपाठी। वह इलाहाबाद दक्षिण की राजनीति करते रहे हैं। इस बार भी चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन ताल ठोंककर जीतने का दावा नहीं कर सकते। इलाहाबाद की राजनीति करने वालों में भाजपा के ही मुरली मनोहर जोशी हैं, तो कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी। रीता हालांकि लखनऊ से चुनाव लड़ रही हैं, लेकिन इलाहाबाद की राजनीति को वह अक्सर प्रभावित करती रही हैं। इस बार भी रीता के कहने पर आठ लोगों को टिकटें दी गई हैं।

उधर कुंडा के राजा भैया, सपा के कुंवर रेवती रमण सिंह, बसपा के इंद्रजीत सरोज, कांग्रेस के ही प्रमोद तिवारी और ‘अपना दल’ के अतीक अहमद को भला भारतीय राजनीति में कौन नहीं जानता? ये सभी धुरंधर इसी पवित्र नगरी से राजनीति करते हैं। सपा सांसद कुंवर रेवती रमण सिंह के बेटे उज्ज्वल रमण करछना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन वहां सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है। भाजपा और कांग्रेस के अलावा बसपा के लोग उज्ज्वल को पूरी तरह से घेरने की फिराक में हैं और संभव है कि कुंवर साहब की प्रतिष्ठा कहीं फंस भी जाए। कुंवर रेवती रमण कहते हैं, ‘सपा इस बार सरकार बनाएगी और इस पर शक करने की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन बेटे के सवाल पर कुंवर साहब चुप्पी साध जाते हैं। कहते हैं, राजनीति में कुछ भी संभव है। लेकिन हम बेहतर स्थिति में हैं। संगम के तट पर बांसुरी बजाते करछना के शख्स ने इस संवाददाता को बताया कि बसपा बुरी है, तो सपा ठीक कैसे है? हम लोग सोंचगे सब के सब हमें सालों से ठग रहे हैं। अब ऐसा नहीं चलेगा। नेताओं की गाड़ियां, नेताओं और पार्टियों के झंडे बैनर और कार्यकर्ताओं की टोली संगम के जनमानस को टटोल रही है, लेकिन संगम मौन है।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल का यह लिखा हमवतन अखबार में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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