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हिंदू के विज्ञापन में निशाना टीओआई पर और चोट डीएनए को

बड़े ब्रांड विज्ञापनों के जरिए अपनी चादर दूसरे से सफेद दिखाने का काम आमतौर पर करते ही रहते हैं, इनको लेकर ब्रांडों में टकराव भी होती रहती है. कारपोरेट कंपनियां विज्ञापनों के सहारे एक दूसरे का मजाक भी उड़ाती रहती हैं, पर पत्रकारिता में इस तरह के मामले कम देखने में आते हैं. संस्‍थान एक दूसरे का मजाक नहीं बनाते हैं, पर इस बार ऐसा हुआ है और इस कारनामे को अंजाम दिया है द हिंदू ग्रुप ने. गंभीर पत्रकारिता का पर्याय माने जाने वाले इस अंग्रेजी अखबार के विज्ञापन में टाइम्‍स ऑफ इंडिया को निशाना बनाया गया है.

बड़े ब्रांड विज्ञापनों के जरिए अपनी चादर दूसरे से सफेद दिखाने का काम आमतौर पर करते ही रहते हैं, इनको लेकर ब्रांडों में टकराव भी होती रहती है. कारपोरेट कंपनियां विज्ञापनों के सहारे एक दूसरे का मजाक भी उड़ाती रहती हैं, पर पत्रकारिता में इस तरह के मामले कम देखने में आते हैं. संस्‍थान एक दूसरे का मजाक नहीं बनाते हैं, पर इस बार ऐसा हुआ है और इस कारनामे को अंजाम दिया है द हिंदू ग्रुप ने. गंभीर पत्रकारिता का पर्याय माने जाने वाले इस अंग्रेजी अखबार के विज्ञापन में टाइम्‍स ऑफ इंडिया को निशाना बनाया गया है.

इसके जरिए हिंदू ने कई सवाल भी खड़े किए हैं, खासकर कंटेंट को लेकर, युवाओं के च्‍वाइस को लेकर भी. अपने विज्ञापन में द हिंदू ने दिखाया है कि कुछ युवाओं से समसामयिक विषयों पर सवाल किया जाता है, पर इनमें से एक भी युवा किसी भी सवाल का सही जवाब नहीं दे पाता है. पर जब उन्‍हीं युवाओं से वॉलीबुड से जुड़ा सवाल किया जाता है तो सब के सब इसका सही उत्‍तर दे देते हैं. इसके बाद इन सभी से पूछा जाता है कि आप कौन सा अखबार पढ़ते हैं तो इस सवाल के जवाब में युवा टाइम्‍स आफ इंडिया का नाम लेते हैं. हालांकि इसको विज्ञापन में म्‍यूट कर दिया गया है, पर युवाओं के होठों से साफ पता चलता है कि वे क्‍या बोल रहे हैं. इसके बाद द हिंदू अखबार के साथ एक पंचलाइन आता है – 'स्‍टे अहेड ऑफ द टाइम्‍स'.

माना जा रहा है कि इसके पहले टाइम्‍स ऑफ इंडिया का एक विज्ञापन आया था, जिसकी पंच लाइन थी – 'वेक अप टू द टाइम्‍स आफ इंडिया'. हिंदू के विज्ञापन को टीओआई के इसी विज्ञापन का जवाब माना गया था. हिंदू ने निशाना तो टाइम्‍स ऑफ इंडिया पर साधा है पर इसकी चोट अंग्रेजी समाचार पत्र डीएनए को लगती दिखती है. कुछ समय पहले डीएनए ने भी एक ऐसा ही विज्ञापन लांच किया था, जिसमें उसने दिखाया था कि इसको पढ़ने वाले युवाओं को बाकी चीजों की जानकारी हो या न हो पर उन्‍हें बॉलीवुड से जुड़ी हर बात की जानकारी है. डीएनए के विज्ञापन का पंचलाइन था – 'योर डेली डोज आफ ग्‍लैमर एंड गासिप'.

विज्ञापन में भले ही अखबार एक दूसरे पर कटाक्ष करके अपने मार्केट बढ़ाने की जुगत लगा रहे हों, पर इसके साथ कुछ सवाल भी उठते हैं. क्‍या सचमुच अखबार अपने पाठकों को स्‍तरीय कंटेंट उपलब्‍ध करा रहे हैं. या पत्रकारिता अब बस नाच गाने की खबरों तक ही सीमित रह गया है. इन विज्ञापनों में भले ही एक दूसरे से बीस दिखाने की कोशिश की गई हो, पर सवाल यह भी है कि क्‍या अब अंग्रेजी चाहे हिंदी के अखबार जनसरोकार की पत्रकारिता कर रहे हैं, एक बड़े मास का नेतृत्‍व कर रहे हैं या फिर ये कुछ खास लोगों की गोदी में जाकर बैठ गए हैं. आप भी नीचे देखिए विज्ञापनों को और सोचिए बदलते दौर की पत्रकारिता के बारे में. विज्ञापनों के लिंक   

हिंदू का विज्ञापन 

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/566/–media-music/stay-ahead-with-the-hindu.html

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/565/–media-music/stay-ahead-with-the-hindu.html

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/564/–media-music/stay-ahead-with-the-hindu.html

डीएनए का विज्ञापन

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/567/–media-world/dna-after-hrs.html

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/568/–media-music/dna-after-hrs.html

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