Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

आवाजाही, कानाफूसी...

जनसंदेश टाइम्स में सुभाष राय का अंतिम लेख- ”मिलेंगे फिर किसी मोड़ पर”

: सपने देर तक नहीं चलते, टूटते हैं, टूटने के लिए ही होते हैं शायद : मिलेंगे फिर किसी मोड़ पर : आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर एक दारोगा को गोली मारने का अधिकार है तो मुझे क्यों नहीं? मेरे बड़े भाई आलोक धन्वा ने कभी अपनी एक मशहूर कविता में ये पक्तियाँ लिखी थीं। जवानी के दिनों में हम सब इसके बड़े दीवाने थे। जब आपातकाल लगा था तो इन्हीं पंक्तियों के बीच से एक सपना मेरे मन में उगा था। मेरे कई मित्रों के मन में। हम सब युवा थे, मन में जोश था, कुछ भी अनैतिक, अनुदात्त और अस्वीकार्य झुका नहीं पाता था, बड़ा से बड़ा आकर्षण भी डिगा नहीं पाता था। मन जरूरत से ज्यादा आदर्शवादी था। उसके खिलाफ किसी का जाना, किसी परिस्थिति का भी, कभी स्वीकार नहीं होता। प्रतिरोध रग-रग में था और कई बार उसके हिंसक हो जाने पर भी कोई रंज नहीं होता था। ऐसे मन पर आपातकाल का गहरा असर हुआ।

: सपने देर तक नहीं चलते, टूटते हैं, टूटने के लिए ही होते हैं शायद : मिलेंगे फिर किसी मोड़ पर : आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर एक दारोगा को गोली मारने का अधिकार है तो मुझे क्यों नहीं? मेरे बड़े भाई आलोक धन्वा ने कभी अपनी एक मशहूर कविता में ये पक्तियाँ लिखी थीं। जवानी के दिनों में हम सब इसके बड़े दीवाने थे। जब आपातकाल लगा था तो इन्हीं पंक्तियों के बीच से एक सपना मेरे मन में उगा था। मेरे कई मित्रों के मन में। हम सब युवा थे, मन में जोश था, कुछ भी अनैतिक, अनुदात्त और अस्वीकार्य झुका नहीं पाता था, बड़ा से बड़ा आकर्षण भी डिगा नहीं पाता था। मन जरूरत से ज्यादा आदर्शवादी था। उसके खिलाफ किसी का जाना, किसी परिस्थिति का भी, कभी स्वीकार नहीं होता। प्रतिरोध रग-रग में था और कई बार उसके हिंसक हो जाने पर भी कोई रंज नहीं होता था। ऐसे मन पर आपातकाल का गहरा असर हुआ।

कुछ बोल नहीं सकते, कुछ लिख नहीं सकते, कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। क्यों नहीं कर सकते? जो गलत है, उसे गलत क्यों नहीं कह सकते, जो बुरा है, उसे बुरा क्यों नहीं कह सकते, जो स्वतंत्रता को बाधित करता है, उसके खिलाफ खड़े क्यों नहीं हो सकते? मन में तमाम सवाल एक साथ उठे। वह कैशौर्य था। मन में करुणा, प्रेम, दया हिलोरें लेता महसूस होता। कविताएं भी लिखने लगा था। आलोक और धूमिल बहुत पसंद आते। हम कई मित्र कई बार साथ बैठकर उनकी कविताओं का सामूहिक पाठ करते और भीतर एक  झनझनाती संवेदना, एक सब-कुछ बदल देने की ऊर्जा महसूस करते।

इसी ऊर्जा ने तब भी ताकत दी, अंदर से आवाज उठी, बाहर सड़क पर निकलो और हम कुछ दोस्त निकल आये सुनसान सड़कों पर। जब सबके मुंह पर पट्टियाँ बंधी थी, जब हर कोई किसी भी अपरिचित से सावधान होकर मिलता था, जब तमाम लोग दीवारों की मुखबिरी से डरते थे, तब इंकलाब जिंदाबाद, इमर्जेंसी मुर्दाबाद करते हुए हम किसी चौराहे पर इकट्ठे होते और नारे लगाते हुए भीड़ में गुम हो जाते। रात में जुते हुए खेत में सोते, दिन भर अंधेरे के सख्त पहरे को छिन्न-भिन्न कर देने की योजनाएं बनाते और उसे निर्भय, निर्द्वद्व क्रियान्वित करने में जुटे रहते। हथियार भी होते हम सबके पास, पता नहीं कब जरूरत पड़ जाये, पता नहीं कब शब्दों से काम न चले, पता नहीं कब संवाद की गुंजाइश खत्म हो जाये। आदर्शवादी मन को तब लगता था कि हम वैसा ही कोई काम कर रहे हैं, जैसा कभी सुभाष बोस ने, भगत सिंह ने, चंद्रशेखर ने या ऐसे ही तमाम स्वप्नद्रष्टा क्रांतिकारियों ने किया था।

पर सपने तो सपने ही होते हैं। आते हैं तो अच्छे लगते हैं, टूटते हैं तो परेशान करते हैं। लंबे कभी नहीं चलते सपने। शायद सपने टूटने के लिए ही होते हैं। आजादी के लिए लड़ने वाले जाँबाज बहादुरों ने जिन सपनों के लिए कुर्बानिर्या दी, जिन सपनों के लिए हँसते-हँसते, देशप्रेम के तराने गाते-गाते फाँसी के फंदे चूमे, उन सपनों का क्या हुआ। बस अंग्रेजों को भगा सके हम। उनकी विरासत, उनकी भाषा, उनके संस्कार, उनके दमन के तौर-तरीके, उनका लुटेरापन कहाँ भगाये जा सके। उनकी देसी संतानों ने पूरे मुल्क को पूंजीवादी साम्राज्यवाद के नये  कूड़ेदान में ढकेल दिया, जहाँ न संवेदना है, न प्यार है, न संस्कार हैं, न जीवन मूल्य। जहाँ अमीरों को खुलेआम अपनी शानो-शौकत बढ़ाने की आजादी है, जहाँ गरीबों को सिर्फ भूख, रोटी और वंचना की पीड़ा के बोझ तले दबकर, घुटकर मर जाने की आजादी है। जहाँ जीवन की पुनर्रचना करने वाली कला, साहित्य, रंग-मंच और बौद्धिक संवाद की गुंजाइश दिन-ब-दिन सीमित होती जा रही है।

ऐसी आजादी में उन क्रांतिकारियों के सपनों का बदरंग हो जाना, टूट कर बिखर जाना कोई अनहोनी नहीं है। यह तो होना ही था। कुछ ऐसा ही हुआ आपातकाल के बाद। बोलने, लिखने और विरोध करने की आजादी पर लगी बेड़ियों, जंजीरों को तोड़ते हुए अपने हाथ, पाँव और सीने लहूलुहान करने वाले लोगों के दिल में जो सपने तैर रहे थे, पाबंदियों के झंझावात में संभावित परिवर्तन के जो स्प्वप्नदीप जल रहे थे, मन में भविष्य की जो उड़ानें अपने पंख तोल रही थीं, उनका क्या हुआ। संपूर्ण क्रांति के अगुआ जयप्रकाश की बूढ़ी हड्डियों पर बरसी लाठियों से उपजे आक्रोश की ज्वाला का क्या हुआ। कहाँ गयीं जनता के गुस्से में डूबी तीलियों की विस्फोट करने की ताकत। मैंने अपनी आंखों से देखा सपनों को चकनाचूर होते हुए, एक झटके में शीशे की तरह गिरकर टूटते हुए, बिखरते हुए। मेरे जैसे बहुत सारे लोग थे, मैं कहूंगा, मेरे से अपरिचित मेरे अपने, मेरे दोस्त थे, जो लड़े थे, जिन्होंने लाठियाँ खायी थीं, जिनके नाखून खींच लिये गये थे, जिनके मुंह में अंग्रेजों की संतानों के हुक्म से तानाशाही के खाकी पहरेदारों ने पेशाब किया था, उन सबके सपनों का क्या हुआ।

तब एक बार लगा था कि क्या सचमुच बंदूकें जरूरी हैं, क्या बंदूकें किताबों से भी ज्यादा जरूरी हैं, कविताओं से भी ज्यादा? मन होता था कि जनता के सपने, देश के सपने और क्रांतिवीरों के सपने तोड़ने वालों से निपटने का एक ही तरीका हो सकता है और वह है बंदूक। जब जंगल ज्यादा उपादेय लगने लगा था। तब लगने लगा था कि भीडतंत्र के झूठे और लुच्चे खलनायकों के सीनों में आग उतार दें। इस द्विविधा में कई वर्ष जीता रहा। इलाहाबाद के   मेरे मित्रों में से कई जंगल से लौटे हुए थे, कई के हाथ ट्रिगर पर सधे हुए थे लेकिन मैंने देखा कि वे शब्दों में बंदूक से भी ज्यादा बड़ा धमाका करने के सपने देखते थे, कई बार करते भी थे। मैंने शब्द का रास्ता चुना। पत्रकारिता को बदलाव के औजार के रूप में देखा। देखा ही नहीं, अपने पूरे वजूद के साथ चल पड़ा उस ओर।

इन 35 वर्षों में मैंने क्या किया, मैं नहीं जानता लेकिन इस दौर में मेरे पास आयी पाठकों की हजारों चिट्ठियाँ, उनके अनगिनत फोन अगर कोई गवाही देते हैं तो मैं समझता हूं कि मैंने सही रास्ता चुना, जो किया, ठीक ही किया। पर दुख है, वक्त टुकड़ों-टुकड़ों में मौका देता है। वक्त ही रास्ते देता है, वही रास्ते बंद करता है। हर किसी के तयशुदा रास्ते होते हैं, वे अनायास और बेवजह नहीं बनते। किसी भी आदमी का पथ उसकी चिंताएंं, उसके सरोकारं, उसकी प्रतिबद्धता और जीवन को देखने-समझने की उसकी ताकत समाज की प्रतिकूलताओं और प्रतिगामी शक्तियों की बाधा भरी रपटीली, पथरीली जमीन तोड़कर बनाती है। मेरे जैसे आदमी के लिए अपने रास्ते से हटना या डिगना बहुत मुश्किल रहा है। बंदूक की जगह मैंने किताब चुनी, कविता चुनी, शब्द चुने और इन रास्तों पर चलने वाले मित्र चुने तो मुझे इसका कोई पछतावा नहीं है। यह रास्ता बार-बार बंद हुआ, इससे मैं कभी हताश नहीं हुआ।

इस रास्ते में बाजार आया, बाजार के पैरोकार आये, अपनी घिसी-पिटी समझ की घुट्टी पिलाने की कोशिश करते हुए, पुरानी और पहचानी जा चुकी समाज विरोधी लुटेरी सोच डिक्टेट करते हुए पर मैंने कभी उनकी परवाह नहीं की। जनसंदेश टाइम्स का एक वर्ष अपने सपनों के लिए लड़ते हुए गुजर गया। मुझे खुशी है कि शब्दों के इस सफर में बहुत सारे नये मित्र मिले, बहुत सारे बड़े लेखकों, रचनाकारों का स्नेह मिला। यह सब नहीं होता तो मैं यह सपना गढ़ नहीं पाता। पर सपने बहुत कम टूटने से बच पाते है। यह सपना भी दरक गया है, टूट रहा है या शायद टूट चुका है। जब बाधाएं मुक्ति पर छाने लगें, तो उन्हें झटक देना चाहिए। मैं उन्हें झटक रहा हूं, मुक्त हो रहा हूं। जनसंदेश टाइम्स के जरिये जिनका स्नेह मिला, जिनकी मदद मिली, जिनका प्यार मिला, जो केवल साथ खड़े रहे, उन सबको मेरा अभिवादन। फिर किसी मोड़ पर कहीं और मिलेंगे, अलविदा।

लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स  के संपादक सुभाष राय का जनसंदेश टाइम्स अखबार में प्रकाशित यह अंतिम लेख है. उन्होंने कई मुद्दों पर प्रबंधन की मनमानी के विरोध में खुद को अखबार से अलग करने की घोषणा कर दी है.

….इन्हें भी पढ़ें….

हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स को तगड़ा झटका, सुभाष राय अलग हुए
http://bhadas4media.com/edhar-udhar/2251-2012-02-01-05-42-44.html

मुझे जनसंदेश टाइम्स में अब नहीं होना चाहिए, मगर क्यों : सुभाष राय
http://bhadas4media.com/edhar-udhar/2254-2012-02-01-06-02-05.html

वो मेल जो अनुज पोद्दार को सुभाष राय ने लिखा, पर जवाब न आया
http://bhadas4media.com/edhar-udhar/2255-2012-02-01-06-25-39.html

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...