उत्तराखंड में विधान सभा चुनाव संपन्न हो गए. वोटों की गिनती 6 मार्च को होनी है. लेकिन गिनती से पहले जो रुझान आ रहे है उसे देख यही लगता है कि ''खंडूरी हैं जरूरी'' का नारा बीजेपी का नहीं चला, और ''कांग्रेस है जरूरी'', या ''परिवर्तन है जरूरी'' की हवा चली. खबर तो यह भी है कि कोटद्वार से खंडूरी की सीट भी निकलनी मुश्किल है. अलबत्ता पूर्व मुख्यमंत्री निशंक जीत रहे हैं. उत्तराखंड में चार महीने पहले मुखिया बदले जाने का प्रयोग एक बार फिर से नाकामयाब रहा. बीजेपी के कई दिग्गज चुनाव हार रहे हैं, ऐसे संकेत मिल रहे हैं. 70 सीटों में से कांग्रेस को 38, बीजेपी को 20, बसपा को 4 और अन्य को 8 सीट मिलने की सम्भावनायें जताई जा रही है.
हालाँकि एक न्यूज़ चैनल ने ये एलान किया था की यहाँ बीजेपी की फिर से सरकार बनेगी, पर ऐसा नहीं होने जा रहा. अन्ना का लोकपाल नहीं चला. रामदेव का जादू भी नहीं चला. बीजेपी की ऐसी फजीहत की एक वजह पार्टी के अंदर एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ भी रही है. खंडूरी के विरोध में निशंक और कोश्यारी की लॉबी लगी रही. मोदी, सुषमा जैसे नेता उत्तराखंड नहीं आये. प्रदेश अध्यक्ष, महामंत्री संगठन के बिना बीजेपी ने चुनाव लड़ा. ये दोनों अपनी सीट बचाने में लगे रहे. तराई और मैदानी इलाके में बीजेपी ने अपने आप को पिछले दस सालो में मज़बूत नहीं किया जबकि यहाँ पहाड़ की तुलना में अब सीट भी ज्यादा हो गयी है. यहाँ बसपा ज्यादा मज़बूत हो रही है. खबरें आ रही हैं कि कांग्रेस के कुछ बागी भी चुनाव जीत रहे हैं. यानि कांग्रेस को और मजबूती हो सकती है. कांग्रेस में मुख्यमंत्री कौन होगा, ये सवाल है. कांग्रेस आज के हालात में अपना एक भी एमपी कम नहीं कर पाएगी यानि हरीश रावत मैदान से बाहर. हरक सिंह रावत चुनाव जीते तो वो मज़बूत दावेदार होंगे. दलित होने के नाते यशपाल आर्य और महिला होने के नाते डॉ. इंदिरा हृदयेश का नाम भी चर्चा में है.
कांग्रेस में नेता हाई कमान से तय होकर आता है, देहरादून में तो सिर्फ मोहर लगती है. उत्तराखंड में कांग्रेस को पांच साल के लिए मुख्यमंत्री लाना होगा, नहीं तो इस पार्टी का हाल भी बीजेपी जैसा ही होगा. उत्तराखंड में खंडूरी की सख्ती, इमानदारी भी सरकारीकर्मियों को रास नहीं आई. खबर है कि चुनाव ड्यूटी पर जाने से पहले सरकारी कर्मियों ने डाक वोट के मार्फ़त सरकार के खिलाफ वोट किया. ये संख्या हजारों में रही जिसने सरकार के खिलाफ परिवर्तन का माहौल बनाया. इस बार मैं कई जगह चुनाव कवर करने के लिए गया. मुझे कहीं भी बीजेपी का माहौल नहीं दिखा. कार्यकर्ता मायूस से दिखे. उनमें जोश नहीं था. कांग्रेस में राहुल, सोनिया, मनमोहन और अन्य नेताओं के आने से उत्साह था. बीजेपी ने मानों खुद ही समर्पण कर दिया हो. बहरहाल उत्तराखंड में नया मंत्रिमंडल मार्च के दूसरे हफ्ते शपथ ले लेगा. देखते हैं कौन मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठता है.
लेखक दिनेश मानसेरा एनडीटीवी के नैनीताल के रिपोर्टर हैं.





