Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

प्रिंट-टीवी...

कैसी-कैसी खबरें और कैसे-‍कैसे बाइलाइन

कारपोरेटीकरण की चपेट में आते-आते अखबारों में सोच-समझ भी खतम होती दिखने लगी है. सूचनाओं और खबरों के बीच की बारीक लाइन भी मिटने लगी है. संपादकीय लोगों को समझ ही नहीं है कि किन खबरों पर बाइलाइन दिया जाए और किन खबरों पर नहीं. संपादकीय में मनमाना या फिर कहें कि चाटुकाराना रवैया हर जगह हावी हो गया है, जिसकी डेस्‍क से बनती है उसे किसी भी खबर पर बाइलाइन मिल जाती है और जिसकी खटपट रहती है उसकी अच्‍छी खबर भी बाइलाइन लायक नहीं समझी जाती. कभी-कभी ऐसा लगता है कि तमाम अखबारों में काम कर रही टीम को अच्‍छी और चलचाऊ खबरों के बीच का फर्क समझ में नहीं आता है, उन्‍हें बस अपने और पराए की भाषा ही समझ में आती है.  

कारपोरेटीकरण की चपेट में आते-आते अखबारों में सोच-समझ भी खतम होती दिखने लगी है. सूचनाओं और खबरों के बीच की बारीक लाइन भी मिटने लगी है. संपादकीय लोगों को समझ ही नहीं है कि किन खबरों पर बाइलाइन दिया जाए और किन खबरों पर नहीं. संपादकीय में मनमाना या फिर कहें कि चाटुकाराना रवैया हर जगह हावी हो गया है, जिसकी डेस्‍क से बनती है उसे किसी भी खबर पर बाइलाइन मिल जाती है और जिसकी खटपट रहती है उसकी अच्‍छी खबर भी बाइलाइन लायक नहीं समझी जाती. कभी-कभी ऐसा लगता है कि तमाम अखबारों में काम कर रही टीम को अच्‍छी और चलचाऊ खबरों के बीच का फर्क समझ में नहीं आता है, उन्‍हें बस अपने और पराए की भाषा ही समझ में आती है.  

पहले बाइलाइन लेने के लिए रिपोर्टरों को जहां एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता था, अब ऐसी वैसी खबरों पर भी रिपोर्टरों को बाइलाइन मिल जाता है. बुधवार यानी आज प्रकाशित एक खबर में यही दिख रहा है. आज की बड़ी खबरों में से एक है फ्रांस की कंपनी से युद्धक विमानों का सौदा. इन खबरों को कई अखबारों ने अलग-अलग तरीके से ट्रीट किया है. दैनिक भास्‍कर ने इस खबर को लीड बनाया है तथा हेमंत अत्री के नाम से बाइलाइन खबर दी है. राष्‍ट्रीय सहारा में यह खबर लीड तो नहीं है पर इसे पहले पन्‍ने पर प्रमुखता से छापा गया है, वो भी संजय सिंह के नाम से. नईदुनिया ने भी इस खबर को लीड बनाया है तथा सुरेश बाफना की बाइलाइन खबर के रूप में प्रकाशित किया है. जनसत्‍ता में यह खबर सेकेंड लीड है तथा एजेंसी के हवाले से खबर का प्रकाशन किया गया है. हिंदुस्‍तान ने इस खबर को पहले पेज पर सिंगल कॉलम में सलटा दिया है. किसी का नाम नहीं दिया गया है लेकिन नीचे विस यानी विशेष संवाददाता लिख दिया गया है.

इस खबर को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्‍या पीएमओ देखना ही रिपोर्टर के बाइलाइन पाने का लाइसेंस है. सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि यह खबर एक्‍सक्‍लूसिव नहीं है बल्कि प्रेस नोट द्वारा जारी की गई खबर है. एजेंसी के हवाले से भी यह खबर आई है, फिर इस स्थिति में इन अखबारों में बाइलाइन छपने का क्‍या मतलब है? सवाल इस लिए भी है कि इस खबर में रिपोर्टर की मेहनत क्‍या है, बस खबर लिख देना. इसमें उसकी खोज तो कहीं दिखती नहीं है. यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि ये अखबार अच्‍छी से अच्‍छी खबरों पर कभी बाइलाइन नहीं देते और कभी-कभी सामान्‍य से खबरों को बाइलाइन छाप देते हैं. कुछ लोग तो कहते हैं कि किसी खबर पर आसानी से बाइलाइन मिल जाने से रिपोर्टर के अंदर की खबर खोजने की इच्‍छा खतम हो जाती है, इसलिए कई बड़ी खबरें या भ्रष्‍टाचार बाहर नहीं निकलते या बहुत देर से निकलते हैं. वो भी तब जब दो गलत काम करने वाले आपस में भिड़ जाते हैं तब.

स्‍थानीय स्‍तर पर मेहनत करने वाले तथा अच्‍छी रिपोर्ट देने वाले रिपोर्टरों को बाइलाइन लेने में आधी जिंदगी गुजर जाती है, पर तमाम यूनिटों में बैठे तथा लोगों के चहेते बने रिपोर्टर अच्‍छी-बुरी हर खबर पर बाइलाइन पा जाता है. बाइलाइन पाने के लिए कोई क्राइटिरिया तय नहीं है. जिस पर संपादक को प्‍यार आ जाए वो ही स्‍टार रिपोर्टर. आज भी इस खबर से यही दिख रहा है कि सबके लिए जारी की गई खबर को बाइलाइन दिया गया है, क्‍या बाइलाइन इसलिए दिया गया है कि फ्रांस से सौदा तय हुआ है या इसलिए कि ये रिपोर्टर पीएमओ देखते हैं. सच चाहे जो हो संपादकीय समझ पर सवाल तो खड़ा ही होता है. पहले खबरों को बाइलाइन इसलिए दिया जाता रहा है कि यह खबर अलग है और किसी के पास नहीं है, एक्‍सक्‍लूसिव है, पर अब तो ऐरी-गैरी खबरें भी बाइलाइन लायक हो जाती हैं. अगर ऐसा ही है तो सभी खबरों पर बाइलाइन मिलनी चाहिए क्‍योंकि लिखने की मेहनत तो हर रिपोर्टर ही करता है. सोचिए और रोइए बाइलाइन के बदलते दौर पर.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...