मीडिया जगत के दिग्गजों की टीम के साथ गॉडविन ग्रुप द्वारा धूमधाम से शुरू किए दैनिक जनवाणी अख़बार के प्रकाशन को एक साल पूरा होने वाला है. 14 फ़रवरी 2010 को लांच हुए जनवाणी अख़बार को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए. लांचिंग के साथ शुरू की गई बैग देने और एक रुपये कीमत रह जाने की स्कीम के बलबूते अख़बार काफ़ी बुलंदी पर पहुंच भी गया. लेकिन अख़बार से जुड़े दिग्गजों के तमाम दावों के विपरीत दैनिक जनवाणी इन बुलंदियों पर कायम नहीं रह सका. आपसी खींचतान और लाबिंग की कवायद में कई ऐसे लोग दरकिनार किए गए, जो समर्पित होकर काम कर रहे थे.
अख़बार में ऐसी ख़बरों का नितांत अभाव देखने को मिला, जिनके बलबूते पाठक उसे नाम से ख़रीदना चाहते. साथ ही अखबार में पेज घटाने और पेपर की क्वालिटी बेहद घटिया हो जाने से पाठकों में दैनिक जनवाणी के प्रति कोई आकर्षण ही नहीं रह गया. जैसे-तैसे करके स्कीम की अवधि में प्रसार को बचाए रखा गया. हालांकि कई जगह से ऐसी ख़बरें भी प्रबंधन के पास आई कि अख़बार को रद्दी बनाया जा रहा है. ऐसे कई मामले पकड़े भी गए, लेकिन जैसे तैसे काम चलता रहा, और एक वर्ष की अवधि पूरी होने का समय निकट आ गया.
आजकल जनवाणी प्रबंधन के समक्ष सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा हो गया है कि स्कीम समाप्त होने के साथ प्रसार को कैसे कायम रखा जाए. दरअसल जनवाणी की स्कीम में दस महीने पूरे होने के बाद पाठकों को जूस सेट दिए जाने का वायदा भी शामिल था. लेकिन समय रहते यह काम नहीं किया जा सका. जिसको लेकर इन दिनों वितरकों और वेंडरों के साथ प्रबंधन का द्वंद्व किसी से छिपा नहीं है, जिनका कहना है कि पाठक स्कीम के अनुसार जूस सेट की मांग कर रहे हैं. इसी बात को लेकर कई महीने से उनके बिल तक का भुगतान तक पाठक नहीं कर रहे हैं. एक दुविधा ये भी है कि वितरक सप्लाई के अनुसार जूस सेट मांग रहे हैं, जबकि जनवाणी प्रबंधन स्कीम की शुरुआत में घोषित योजना के अनुसार दस माह की अवधि में हर महीने के पांच अख़बारों के हेडर लेकर ही जूस सेट दिए जाने की बात कह रहा है.
जनवाणी की स्कीम को लेकर चल रहे विवाद के बीच कई जगह सप्लाई न उठाने की ख़बरें भी आ रही हैं. इस विवाद के बीच हिन्दुस्तान ने अपनी स्कीम शुरू कर दी, जिसमें एक साल की बुकिंग के समय आकर्षक गिफ़्ट, दस रुपये महीने का डिस्कांउट कूपन शामिल है. यह स्कीम वितरकों, वेंडरों और पाठकों को खूब लुभा रही हैं. जिसका सीधा प्रभाव जनवाणी पर पड़ता दिख रहा है. इन परिस्थियों के बीच जनवाणी की कीमत बढ़ाने की योजना भी अख़बार के प्रसार के लिए आत्मघाती बन सकती है.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





