ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन को भले जस्टिस मार्कण्डेय काटजू के कहे पर एतराज हो लेकिन न्यूज टेलीविजन का मेरा अनुभव यही रहा है कि इसके 'कुछ' महान संपादक भीतर से डरे हुए, चापलूसों से घिरे हुए, अहंकार को जिए हुए और छद्म बुद्धिजीविता को ओढ़े हुए ऐसे पत्रकार हैं, जिनके खाते में एक भी कायदे का पत्रकार तैयार करने का श्रेय शायद ही जमा हो। जस्टिस काटजू की बातों की काट के लिए बीईए के पास गिनाने को कुल जमा दो मामले ही मिले।
इन महान संपादकों में से कुछ ऐसे भी है जिन्हें राजनीति शास्त्र का क, ख, ग भी नहीं पता। कम से कम हिंदी न्यूज़ चैनलों का मेरा अपना अनुभव यही रहा है कि पिछले पांच सात साल में एंकरिंग शुरू करने वाले तमाम एंकर्स को अगर कायदे से पीसाआर से ब्रीफ न किया जाए या बुलेटिन प्रोड्यूसर की किस्मत अच्छी न हो तो इनमें से कुछ एंकर किसी भी बढ़िया से बढ़िया कार्यक्रम का कबाड़ा करने में पूरी तरह से सक्षम हैं।
एक बार की बात है। एक खबर संविधान संशोधन को लेकर थी। संपादक महान स्क्रिप्ट राइटर पर इस बात पर ख़फ़ा हो गए कि इसमें ये लाइन क्यों लिखी गई कि आवश्यक बहुमत न होने की वजह से संबंधित बिल पेश नहीं किया गया। उनके मुताबिक ऐसा था तब तो सरकार को गिर जाना चाहिए था, पर शायद उन्होंने राजनीति शास्त्र नहीं पढ़ा था। नहीं तो उन्हें मालूम होना चाहिए था कि संविधान संशोधन सामान्य बहुमत से नहीं बल्कि सदन में उपस्थित सांसदों के दो तिहाई बहुमत से पास होता है।
बाकी, एक उदाहरण यहां दे रहा हूं। टीवी न्यूज़ चैनलों ने ऐश्वर्या राय के जन्मदिन पर जो कुछ दिखाया, उसकी हक़ीक़त खुद अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लाग पर बयां की। आप भी पढ़िए, ये रहा लिंक… http://bigb.bigadda.com/?p=8681
लेखक पंकज शुक्ला इन दिनों नई दुनिया, मुंबई के रेजीडेंट एडिटर हैं. वे कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. फिल्म निर्माण के कार्य से भी जुड़े रहे हैं. उनकी यह टिप्पणी उनकी फेसबुक वाल से उड़ाकर यहां प्रकाशित की गई है.





