उत्तराखंड में चुनाव संपन्न हो गए पर पहाड़ की जनता यह देखकर हैरान व परेशान है कि दयनीय माली हालत वाले प्रत्याशियों ने भी इन चुनावों में करोड़ों रुपये कहाँ से झोंक दिए. इस बार सत्ता की बागडोर संभालने वाले संभावित दलों भाजपा तथा कांग्रेस के प्रत्याशियों पर तो धन्धेबाजों ने पैसे लगाए ही उसके अलावा जिताऊ उम्मीदवारों पर भी खूब धन लुटाया गया. इन चुनावों में प्रत्याशियों ने जमकर जनता की नब्ज टटोलकर उन्हें हर प्रकार से लुभाने का प्रयास किया. शराब के साथ-साथ मिठाई के डिब्बों में नोट भी खुलेआम चले. भाजपा के एक उम्मीदवार ने तो देवता के मंदिरों में जाकर कई किलो चांदी चढ़ा दिया ताकि देवता को मानने वाले ग्रामीण उसकी झोली वोटों से भर दें. उसका यह नुस्खा काम कर गया और बेचारे धर्म भीरू ग्रामीणों ने उसके पक्ष में जमकर वोट भी किये. वैसे इस उम्मीदवार को क्षेत्र में उन दर्जनों लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा जिनसे यह नौकरी देने तथा अन्य प्रकार के काम करने के बदले पहले ही लाखों रुपये ठग चुका है.
देहरादून के कई धन्ना सेठों ने पहाड़ के उम्मीदवारों पर पैसा लगाया है, स्थानीय लोग में ये काफी चर्चित नाम हैं. अब जितने वाला प्रत्याशी तो जनता की संपदा लूटकर इन धन्ना सेठों का पैसा ब्याज सहित लौटाएगा ही पर हारने पर अपना कर्ज कैसे चुकायेंगे? एक धन्ना सेठ के गुर्गे ने बताया कि उन्होंने अपना भी सर्वे किया है और अधिकाँश रेस के घोड़ों यानी जिताऊ उम्मीदवारों पर ही दांव लगाया है. जीतने के बाद ये प्रत्याशी अपने सेठ के लिए इस हद तक गिर जाते हैं कि कुछ साल पहले एक विधायक पर अपनी गाड़ी से दुर्लभ जडी-बूटी तस्करी तक के आरोप खुलेआम लगे. पहाड़ों में वन संपदा की लूट ही आय का सबसे बड़ा माध्यम है. दूसरा, पहाड़ में गरीबों की जमीनों को सस्ते में खरीदकर उस पर रिजोर्ट व होटल खड़े करना मैदानी पैसे वालों का बढ़ता शौक है. इसके लिए विधायक सबसे काम का आदमी सिद्ध हो सकता है और आज भी कई नेता इनके एजेंट का काम कर रहे हैं.
एक विश्वस्त सूत्र ने बताया कि देहरादून व हरिद्वार के कुछ लकड़ी के तस्करों ने भी कई उम्मीदवारों पर पैसा लगाया है वे चाहते है कि वे जीतने के बाद सरकार पर जोर डाल कर नाप खेती पर खड़े पेड़ों को काटने की इजाजत ले लें, बाकी का काम ये तस्कर अधिकारियों के साथ मिलकर खुद कर लेते हैं. एक बार यह इजाजत मिल जाए फिर हरे पेड़ों को सूखा दिखाने तथा एक पेड़ पर पूरे ट्रक हरी लकड़ी का जुगाड़ करने में उन्हें महारत हासिल है. इस बन्दरबाँट में नेता व प्रशासन सब शामिल हो जाते हैं और अगर कोई मरता है तो स्थानीय गरीब व महान हिमालय!! इसका पता तब चलेगा जब विधान सभा में बैठने वाले नेता, धन्नासेठ व नौकरशाह पहाड़ों से धन कमाने का जुगाड़ तलाशेंगे इसलिए पहाड़ का हर हितैषी पहाड़ के चुनावों में बरसे इस काले धन से भयभीत हैं.
लेखक विजेंद्र रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.





