नागपुर : लोकमत समाचार पत्र समूह ने पत्रकारिता की दुनिया में एक अभिनव प्रयोग किया है. प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट श्री आर.के. लक्ष्मण के कार्टून के किरदार ‘कॉमनमैन’ को हिंदी दैनिक लोकमत समाचार, मराठी दैनिक लोकमत तथा अंग्रेजी दैनिक लोकमत टाइम्स का अतिथि संपादक बनाया. अभी तक दुनिया के किसी भी देश में ऐसा संभव नहीं हुआ कि किसी ‘व्यंग्य चित्रकार’ का कोई ‘किरदार’ ‘मसखरी के मकसद’ से बाहर आकर, लगभग पुरा-कथाओं के पात्र की तरह एक सार्वदेशीय सम्मानजनक स्वीकृति हासिल कर सके.
कहने की जरूरत नहीं, देश के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति-प्राप्त व्यंग्यचित्रकार श्री आरके लक्ष्मण के ‘कॉमन मैन’ ने निर्विवाद रूप से ऐसी ही हैसियत पा ली है. आज जब भी आप ‘कॉमन मैन’ (आम आदमी) शब्द को उच्चरित करते हैं तो उसी क्षण आर.के. लक्ष्मण का वह पात्र आपकी याददाश्त के सफे पर प्रकट हो जाता है. चौखाने का कोट पहना हुआ, धोतीधारी एक भारतीय अधेड़, जिसके सिर पर बस नाममात्र के कुछ बाल शेष रह गए हैं. उसकी आंखों में समाये सूनेपन और सन्नाटे में सवालों से ज्यादा पीड़ाएं भरी हुई हैं. वह हक्का-बक्का है. वह अपनी आंखों से देखी जा रही हकीकत से हतप्रभ है. वह अपने अंदर के प्रश्नों को प्रकट करना चाहता है. उसे उन प्रश्नों के वाजिब और ठोस उत्तर चाहिए. लेकिन, वह चुप है, जैसे किसी ने हलक में हाथ डालकर उसकी जबान खींच ली है?
जी हां, ये ही सारी बातें हमारे मन के भीतर उठती हैं, जब हम महान व्यंग्यकार श्री लक्ष्मण के द्वारा रचे गए इस ‘कॉमन मैन’ पर निगाह डालते हैं. आप याद कीजिए कि भगवान बुद्ध, जब केवल एक राजकुमार थे, तब उस राजकुमार सिद्धार्थ की आंखों ने केवल एक ही बीमार आदमी देखा था, एक ही वृद्ध तथा एक ही मृत व्यक्ति और वह संसार की हकीकत से घबराकर एक रात घर छोड़कर जंगल में चला गया. लेकिन, लक्ष्मण का कॉमन मैन आजादी के बाद से लगातार, आधी शताब्दी तक हिंसा, हत्या, बलात्कार और हवाला-दिवाला देखता आ रहा है और चुप रहने को बाध्य रहा. उसे एक भी शब्द नहीं बोलने दिया गया. क्या हम, भारतीय सामाजिक यथार्थ को देखकर चुप रहने को बाध्य कर दिए गए आदमी की पीड़ाओं और प्रश्नों की कल्पना कर सकते हैं? काश, यदि उसे बोलने को मिल जाए तो वह क्या बोलेगा?
बहरहाल, इस ‘परिकल्पना’ को सामने रखकर हमने महान व्यंग्यचित्रकार श्री आर.के.लक्ष्मण से मिलकर निवेदन किया कि क्या वे अपने उस सार्वकालिक पात्र ‘कॉमन मैन’ को लोकमत के पृष्ठों पर आकर कुछ कहने की अनुमति देंगे? और यह अनुमति हमें मिल गई. नतीजतन, आज वह ‘कॉमन मैन’ आपके प्रिय अखबार लोकमत समाचार’ के पृष्ठों पर आकर अपनी ‘व्यथा-कथा’ का तो बखान करने ही जा रहा है, बल्कि वह अखबार के संपादकीय की आयाताकार जगह पर खड़ा होकर अपनी कलम से एक संपादकीय भी दर्ज कर रहा है. हमारी कोशिश रही है कि हमारे समाचार पत्र के पृष्ठों पर आम-आदमी की आवाज ठीक उतने ऊंचे स्वर पर गूंजे, जिस स्वर पर कभी औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध ‘वंदेमातरम्’ के स्वर गूंजे थे.
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