सिस्टम में रह कर सिस्टम की गंदगी के खिलाफ लड़ने के लिए जाने जाते हैं आईपीएस अधिकारी अमिताभ. ईमानदारी एवं दिलेरी के चलते मुश्किलें भी झेलते रहते हैं. परेशान भी होते हैं, पर लड़ना कभी नहीं छोड़ते. जेन्यूइन मुद्दों पर लड़ने के चलते वे हमेशा से सरकार एवं ताकतवर नौकरशाहों के निशाने पर रहे हैं. सस्पेंड किए गए, बिना महत्व की जगहों पर भेजे गए, पढ़ने के लिए छुट्टी नहीं दी गई, पर इन्होंने कभी हार नहीं मानी. लड़े और जीते. सिस्टम को मजबूरी में इन्हें बहाल करना पड़ा.
पहले मेरठ में भ्रष्टाचार अनुसंधान विभाग में भेजे गए. अपनी आदत के अनुसार जब इन्होंने यहां भी भ्रष्टाचारियों के गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किए तो चोर-गिरहकट परेशान होने लगे. ताकत लगाया अपने शुभचिंतकों तक बात पहुंचाई. फिर अमिताभ का तबादला कर दिया गया. इस बार इन्हें पुलिस के रुल्स एवं मैन्युल्स विभाग में एसपी बनाकर भेजा गया. अपनी आदत के अनुसार यहां भी इन्होंने काम करना चाहा तो पता चला कि यहां तो कोई काम ही नहीं है. यानी यहां वो ही लोग भेजे जाते हैं जिन्हें काले पानी की सजा देनी हो. यहां भी ये सिस्टम को समझने में जुट गए. वायरलेस चौराहा स्थित रेडियो मुख्यालय में दो कमरो में संचालित होता है, रुल्स और मैन्युअल्स का कार्यालय. एक में डीजी ओपी दीक्षित बैठते हैं तो दूसरे कमरे में अमिताभ एवं राहुल अस्थाना.
छोटे से कार्यालय में दो आईपीएस यानी एक कुछ खटपट करे तो दूसरे का ध्यान भंग. कहा जा रहा है कि ऐसा हर रोज होता है. सूत्र बताते हैं कि दूसरे साहब पूरे पुलिस वाले हैं. तेज आवाज और गाली-ग्लौज के बिना बात करना उन्हें पसंद नहीं है. बताया जा रहा है कि इससे अमिताभ को भी परेशानी होती थी. इस लिए उन्होंने सिस्टम में बैठे जिम्मेदार लोगों को पत्र लिखकर एक अलग कमरा एलाट करने की गुजारिश की. बताया जा रहा है कि उन्होंने डीजीपी, प्रमुख सचिव गृह समेत उन तमाम लोगों को पत्र लिखा जो नियमानुसार उन्हें अलग कमरा एलाट करा सकते थे. पर सिस्टम अपने तरीके और अपने रफ्तार से ही चलता है जब तक कि कोई इसे झकझोरे नहीं. इस बार भी ऐसा ही हुआ. चार दिन बीतने के बाद भी अमिताभ की बात का संज्ञान नहीं लिया गया. उन्हें अलग कमरा एलाट नहीं किया गया.
पर अपनी संघर्ष करने की आदत से मजबूर अमिताभ ने फिर एक रास्ता निकाला. बिना किसी शोर-शराबे के वो रेडियो मुख्यालय में स्थित पार्क में एक पेड़ के नीचे पहुंच गए. एक टेबल और चार कुर्सियां डाली बन गया कार्यालय. अब वे इसी खुले कार्यालय में वो अपना काम निपटा रहे हैं. पर सवाल खड़ा होता है कि अपने देश और राज्य के सिस्टम में हर बार ईमानदार को ही क्यों इतनी परीक्षाएं देनी पड़ती हैं या उनकी इतनी परीक्षाएं क्यों ली जाती हैं. अब देखना है कि पेड़ के नीचे अपना काम काज निपटा रहे इस आईएएस को शासन-प्रशासन एक अलग कमरा एलाट कराता है या फिर उन्हें पेड के नीचे ही कार्यालय चलाने के लिए छोड़ देता है. बहरहाल यह कार्यालय लखनऊ की मीडिया में भी सरगर्म है.









