जनसंदेश टाइम्स ने सोमवार को बनारस में अपना अखबार लांच कर दिया है. अखबार की लांचिंग सिर्फ सिटी में हुई है. बनारस के ग्रामीण क्षेत्र या डाक एडिशनों की लांचिंग नहीं की गई है. 20 हजार प्रतियों के साथ लांच हुए अखबार को बनारस भर में बांटा गया. इस दौरान कंपनी के एमडी अनुज पोद्दार एवं मैनेजर अनिल पाण्डेय भी वाराणसी में मौजूद थे. पहले दिन यह अखबार 20+4 पेज का प्रकाशित हुआ. पर अखबार में कुछ भी ऐसा नहीं दिखा जिससे कि लोग इसे हाथोंहाथ ले सकें.
लांचिंग के साथ यह भी सवाल खड़ा हो गया है कि दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान जैसे स्थापित अखबारों के बीच बिना बेहतर कंटेंट के कैसे यह अखबार पांव जमा पाएगा. न तो राष्ट्रीय सहारा जैसी योजना या संसाधन ही प्रबंधन के पास दिख रही है, जिससे यह पाठकों तक अपनी पहुंच बना सके. सूत्र बताते हैं कि अखबार में कर्मचारियों का अभाव है. दूसरे संस्थानों से आए कुछ पेजिनेटर तो यहां का माहौल देखकर वापस हो लिए. दूसरे संस्थानों से आए मजबूरों की टीम कितना बढि़या काम कर पाएगी, यह अखबार के लांचिंग से ही दिखने लगा है. जनसंदेश टाइम्स से जुड़े ज्यादातर अपने पूर्व संस्थानों में उपेक्षित थे या फिर बेरोजगार थे. नाम गिनाने की जरूरत नहीं है, पर जरूरत पड़ी तो इन लोगों के नाम भी गिनाए जाएंगे.
अगर पाठक को 'ये पलटा, वो लुटे, चार मरे-पांच घायल, राजू नगर में, पप्पू शहर में, और विज्ञप्तियां' ही पढ़ने को मिलेंगी तो वो जनसंदेश टाइम्स को क्यों पढ़ेगा, दूसरे स्थापित अखबार क्यों नहीं? बताया जा रहा है कि सिटी एवं डेस्क पर भी काम करने वालों की कमी है, जिससे डाक एडिशन लांच करने की हिम्मत प्रबंधन नहीं दिखा सका. वैसे भी बताया जा रहा है कि जिस तरह की योजना जिलों में अपनाई जा रही है उससे इस अखबार को अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलने में नाकों चने चबाने पड़ेंगे. जिलों में विवादित रहे या फिर नौसिखिए लोगों को प्रभार दिया गया है. प्रबंधन 20 से 25 हजार में पूरे जिलों को संचालित करने की योजना तैयार कर रखी है. अब आजमगढ़, गाजीपुर, सोनभद्र, बलिया जैसे बड़े जिलों में किस तरह से काम होगा यह आसानी से समझा जा सकता है.
अखबार की एजेंसी लेने वाले ही पत्रकारिता भी करेंगे. या फिर वे लोग पत्रकार बनाए गए हैं, जो अपने पैसे के बलबूते पत्रकारिता कर सकें तथा अखबार और उसकी इज्जत दोनों को बेच सकें. अखबार को विज्ञापन के कमिशन के सहारे पत्रकारिता करने वालों की जरूरत है. अब ऐसा पत्रकार विज्ञापन खोजेगा या पत्रकारिता करेगा? तो क्या पाठक विज्ञापन देखने के लिए अखबार खरीदेगा! जब नींव ही ऐसी है तो इमारत का अंदाजा लगाया जा सकता है. बलिया में अखबार की एजेंसी जागरण प्रतिनिधि प्रमोद उपाध्याय के भाई के पास है. पर बताया जा रहा है कि नाम भले भाई का है असली काम प्रमोद ही करेंगे. उनको देखकर ही उनके भाई के नाम एजेंसी की गई है. ऐसे ही अन्य जिलों में भी कई विवादित लोग अखबार से जुड़े हैं. अखबार को स्तरीय पत्रकार नहीं मिल पा रहे हैं क्योंकि पैसे की गांठ नहीं खुल पा रही है. सूत्र ये भी बता रहे हैं कि जो दूसरे संस्थानों से आए हैं वो अब पश्चात कर रहे हैं.





