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यूपी चुनाव : काले धन पर अपनी नीति और नीयत दिखा राहुल ने गंवा दिया अवसर

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सोमवार को वाराणसी में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में जो कुछ भी मीडिया के सामने कहा उससे राहुल गांधी की नीति, दर्शन और भविष्य की योजनाओं को आसानी से समझा जा सकता है। राहुल की भाव-भंगिमा और भाषाशैली सीधे तौर पर यह इशारा कर रही थी कि उनका मिशन 2012 मंजिल से पहले ही हांफने लगा है। प्रथम चरण की वोटिंग से दो दिन पहले चुनाव अभियान के बीच राहुल का प्रेस कांफ्रेंस करना किसी खास रणनीति का हिस्सा है। राहुल ने बड़ी बेबाकी से पत्रकार बंधुओं के सवालों का जवाब दिया, जिससे उनकी पार्टी का ग्राफ ऊपर उठ सकता था, या फिर चुनावों में तात्कालिक लाभ मिल सकता था, लेकिन काले धन के अहम सवाल पर उन्होंने जिस तरह गोल-मोल जवाब दिया, उससे कांग्रेस की नीति और नीयत दोनों का एकबार फिर खुलासा हो गया।

कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने सोमवार को वाराणसी में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में जो कुछ भी मीडिया के सामने कहा उससे राहुल गांधी की नीति, दर्शन और भविष्य की योजनाओं को आसानी से समझा जा सकता है। राहुल की भाव-भंगिमा और भाषाशैली सीधे तौर पर यह इशारा कर रही थी कि उनका मिशन 2012 मंजिल से पहले ही हांफने लगा है। प्रथम चरण की वोटिंग से दो दिन पहले चुनाव अभियान के बीच राहुल का प्रेस कांफ्रेंस करना किसी खास रणनीति का हिस्सा है। राहुल ने बड़ी बेबाकी से पत्रकार बंधुओं के सवालों का जवाब दिया, जिससे उनकी पार्टी का ग्राफ ऊपर उठ सकता था, या फिर चुनावों में तात्कालिक लाभ मिल सकता था, लेकिन काले धन के अहम सवाल पर उन्होंने जिस तरह गोल-मोल जवाब दिया, उससे कांग्रेस की नीति और नीयत दोनों का एकबार फिर खुलासा हो गया।

असल में चुनाव के समय काले धन के बड़े सवाल पर राहुल को पार्टी की नीति का खुलासा देश-विदेश की मीडिया के सामने करना चाहिए था, लेकिन राहुल ने लड़कपन में एक बड़ा अवसर हाथ से गंवा दिया। अगर राहुल में थोड़ी सी भी परिपक्वता, राजनीतिक समझ या दूरदर्शिता होती तो राहुल काले धन के सवाल को रामदेव के विरोध या काले झण्डे से जोड़कर नहीं देखते, बल्कि एक जिम्मेदार नेता और देश की सत्ताधारी पार्टी के महासचिव के तौर पर देशहित और आम आदमी से जुड़े कालेधन के मुद्दे पर अपने विचार और नीति का खुलासा करके विरोधियों की हवा बिगाड़ने के साथ देश की जनता का ध्यान भी अपनी ओर खींच सकते थे।

राहुल ने जिस तरह काले धन के मुद्दे को रामदेव के साथ जोड़ा है। उससे रामदेव को मुफ्त का प्रचार मिला। राहुल का यह बयान कि अगर रामदेव समझते हैं कि अपने चार-पांच लोगों को मुझे काले झंडे दिखाने के लिए भेजकर डरा देंगे तो वह गलतफहमी में हैं। राहुल ने कहा कि चाहे काले झंडे दिखाओ या जूता मारो, राहुल गांधी डरने वाला नहीं है। मुझे डरना नहीं आता और यह सीख मुझे अपनी दादी इंदिरा गांधी से मिली है। राहुल के बयान से देश के आम आदमी में यह संदेश गया कि देश की सत्ताधारी पार्टी का महासचिव जिसे उसकी पार्टी पीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करती है, वो रामदेव के अभियान और विरोध से घबराता है। राहुल और कांग्रेस पार्टी रामदेव के अभियान से भयभीत और घबराई है तभी तो राहुल कालेधन के सीधे सवाल पर सीधा जवाब देने की बजाय रामदेव के सर्मथकों के विरोध पर तीर चला रहे हैं। कालेधन से काले झण्डे पर पहुंचे राहुल को चार जून को रामलीला मैदान में आधी रात निहत्थे सोये हुए प्रदर्शनकारियों, जिनमें स्त्रियां और बच्चे भी शामिल थे पर कांग्रेस सरकार द्वारा चलाए गए काले डंडे भी नहीं भूलने चाहिए। 

गौरतलब है कि यूपी को साधने के लिए राहुल गांधी पिछले पांच साल से दिन-रात एक किये हुए हैं, लेकिन चुनाव के समय मन मुताबिक परिणाम मिलते न देखकर राहुल झुंझला और परेशान हो गए हैं। एक-एक करके राहुल की हर चुनावी रणनीति और योजना की कलई खुलती जा रही है, ऐसे में घबराए राहुल ने चुनावी रैली और सभा के बीच प्रेस कांफ्रेंस करना जरूरी समझा। राहुल ने चुनाव की घोषणा से पूर्व ही बसपा पर सीधे हमले करके सपा को मैदान से बाहर दिखाने का प्रयास किया था, लेकिन उनका ये दांव सफल नहीं हो पाया। उसके बाद राहुल ने सपा को भी निशाने पर लिया, लेकिन ये बात भी जनता को पता चल ही गयी कि चुनाव बाद सपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बनाने के सपने बुन रहे हैं। भाजपा को तो राहुल दौड़ और मैदान से बाहर समझ ही रहे हैं लेकिन उमा भारती को चरखारी से चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा ने राहुल के बने बनाये खेल को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। उमा भारती के चरखारी से चुनाव मैदान में उतरने से झुंझलाए राहुल ने बचकानी बयानबाजी पर उतर आए। चुनाव प्रचार के हवा निकलते और आपसी गुटबाजी में उलझी कांग्रेस की गति देखकर राहुल ने छोटी बहन प्रियंका को चुनाव अभियान में उतार दिया। प्रियंका ने मीडिया के सामने राहुल की स्थिति, नीति और रानजीति को क्लियर करने की कोशिश की थी।

वाराणसी में राहुल भी अपनी स्थिति साफ करते दिखाई दिये। राहुल ने कहा कि जब तक यूपी अपने पैरों पर नहीं खड़ा हो जाता, वह यहां से नहीं जाने वाले हैं। मेरा मकसद प्रधानमंत्री बनना नहीं, बल्कि यूपी को बदलना है। राहुल ने कहा कि जब तक यूपी के गरीबों, किसानों और मजदूरों को इज्जत नहीं मिल जाती, मेरा काम यहां खत्म नहीं होने वाला। मैं यहां गांवों में, झुग्गियों में और गरीबों के बीच आपको नजर आऊंगा। आखिरकर चुनाव के समय राहुल और प्रियंका को ऐसी बयानबाजी की जरूरत क्यों पड़ी, यह अहम सवाल है? 

राहुल को एक के बाद एक कई अवसर मिले जब वो भ्रष्टाचार, कालेधन और लोकपाल बिल पर पार्टी का रूख और अपने विचार देश के सामने रख सकते थे, लेकिन लगता है राहुल ने जान बूझकर सारे मौके हाथ से गंवा दिये। योगगुरु रामदेव के कालेधन विरोधी अभियान से लेकर अन्ना को लोकपाल और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान यूपीए सरकार ने जनभावनओं का सम्मान करने की बजाय हठधर्मिता और बेशर्मी का परिचय दिया। बाबा रामदेव के समर्थकों पर रामलीला मैदान में आधी रात लाठियां बरसाकर लोकतंत्र की हत्या करने का काम किया। रामदेव के बाद अन्ना के साथ भी सरकार ने बदसलूकी करने की हिमाकत की लेकिन भारी जनदबाव और समर्थन के कारण सरकार के मंसूबे पूरे नहीं हो पाये। अगस्त में अन्ना के आंदोलन के समय यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी इलाज के लिए विदेश में थी, पार्टी और सरकार की दारोमदार राहुल के युवा कंधों पर था, लेकिन उस समय राहुल ने अदूरदर्शिता और अनाड़ीपन दिखाकर सरकार की किरकरी करवाई और आम आमदी की नजर में कांग्रेस को गुनाहगार साबित कर दिया। राहुल में अगर थोड़ी सी भी राजनीतिक समझ और परिपक्वता होती तो वो संसद में रटा-रटाया भाषण देने की बजाय दिल से बोलते और जनता की आवाज और भावना को सम्मान देते। असलियत यह है कि पिछले तीन सालों में ऐसे कई मौके आए जब राहुल जनता की आखों के तारे बन सकते थे लेकिन ऐसे हर मौके पर राहुल सीन से पूरी तरह गायब नजर आए। यूपी में दलित और किसान के मुद्दे उठाकर राहुल ने सहानुभूति बटोरी थी, और पार्टी की छवि को सुधारा भी था लेकिन बहुत जल्द ही राहुल की सच्चाई सामने आ गयी कि राहुल भाषणों में चाहे जितनी लंबी-चौड़ी बाते करें लेकिन असलियत में उनका मकसद कुर्सी हड़पने की ही है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले पांच साल में मिशन 2012 के लिए राहुल ने कई नये प्रयोग किये और वो अपने मकसद में कामयाब होते दिख भी रहे थे, लेकिन भ्रष्टाचार, लोकपाल और कालेधन के सवाल राहुल के सामने बार-बार आकर खड़े हो जाते हैं और राहुल की पेशानी पर बल पड़ जाते हैं। राहुल बार-बार इन सवालों का सीधा और सही जवाब देने से बचने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन एक न एक दिन उन्हें इन सवालों का जवाब देना ही होगा। क्योंकि जो व्यक्ति खुद यह कह रहा हो कि उसका मकसद प्रधानमंत्री बनना नहीं सेवा करना है, उसकी बात को आसानी से समझा जा सकता है कि वो प्रधानमंत्री बनने के लिए कितना उतावला है, ऐसे में राहुल को वाराणसी की प्रेस कांफ्रेस में एक बार फिर सुनहरा अवसर मिला था जब वो कालेधन पर पार्टी का स्टैण्ड मजबूती से रख सकते थे, लेकिन कालेधन के सवाल का गोल-मोल जवाब देकर राहुल ने देश की जनता को एक बार फिर सोचने को मजबूर किया है कि राहुल और कांग्रेस पार्टी कालेधन के मुद्दे पर जनता को साफ संदेश देने की बजाय गुमराह करने की कोशिश कर रही है, चुनाव के समय राहुल का कालेधन पर गोल-मोल जवाब उनके चुनावी गणित को भी कहीं गोल-मोल ही न कर दें। चुनाव नतीजे तो आने वाला वक्त ही बताएगा फिलहाल राहुल ने एक सुनहरा अवसर हाथ से गंवा दिया है, जो उनकी राजनीतिक अदूरदर्शिता और नासमझी से बढ़कर कुछ और नहीं कहा जा सकता है। 

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ लखनऊ के स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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