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गोरखपुर में अपने पाठकों को गुरुवारीय देगा जनसंदेश टाइम्‍स

गोरखपुर में जनसंदेश टाइम्‍स अभी ठीक से भले ही लांच न हुआ हो, पर उसने घोषणा की है कि अब वह प्रत्‍येक गुरुवार को गुरुवारीय निकालेगा. इसकी सूचना अखबार के पेज नम्‍बर तीन पर प्रकाशित की गई है. गोरखपुर के साहित्‍यकारों के लिए यह खुशखबरी जैसी है. उल्‍लेखनीय है कि जब शैलेंद्र मणि त्रिपाठी दैनिक जागरण के सर्वेसर्वा हुआ करते थे तब गुरुवारीय नाम से एक टैबलाइड अखबार दैनिक जागरण के साथ हर गुरुवार को मुफ्त दिया जाता था.

गोरखपुर में जनसंदेश टाइम्‍स अभी ठीक से भले ही लांच न हुआ हो, पर उसने घोषणा की है कि अब वह प्रत्‍येक गुरुवार को गुरुवारीय निकालेगा. इसकी सूचना अखबार के पेज नम्‍बर तीन पर प्रकाशित की गई है. गोरखपुर के साहित्‍यकारों के लिए यह खुशखबरी जैसी है. उल्‍लेखनीय है कि जब शैलेंद्र मणि त्रिपाठी दैनिक जागरण के सर्वेसर्वा हुआ करते थे तब गुरुवारीय नाम से एक टैबलाइड अखबार दैनिक जागरण के साथ हर गुरुवार को मुफ्त दिया जाता था.

जागरण के गुरुवारीय में संस्‍कृति‍, भोजपुरी व्‍यंग्‍य, धर्म, आध्‍यात्‍म, चुटकुले और विद्वानों के विचारोतेजक लेख प्रकाशित होते थे. शैलेंद्र मणि का 'चिंतन', शैलेश त्रिपाठी का 'मोबाइल बाबा' नर्वदेश्‍वर पाण्‍डेय का 'देहाती की दिल्‍लगी' सहित कई कॉलम प्रकाशित होते थे, जो गोरखपुर एवं आसपास के जिलों में धूम मचाए हुए थे. शैलेंद्र मणि अब उसी गुरुवारीय का प्रयोग जनसंदेश टाइम्‍स में भी करने जा रहे हैं. माना जा रहा है कि इससे पाठकों का एक बड़ा वर्ग इससे जुड़ेगा. वैसे भी इस अखबार के पूर्व संपादक एवं साहित्‍यकार डा. सुभाष राय ने इस अखबार को बुद्धिजीवी पाठकों के अखबार के रूप में स्‍थापित किया है. गुरुवारीय प्रबुद्ध वर्ग के पाठकों के लिए टॉनिक जैसा काम करेगा.

पर लांचिंग के साथ सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि जनसंदेश टाइम्‍स केवल गुरुवारीय के सहारे अपने प्रतिद्वंद्वी अखबारों से कितना लोहा लेगा. इसने जागरण को क्षति तो पहुंचाई है, पर जिस अनप्रोफेशनल तरीके से भर्तियां की गईं उसने जागरण को राहत दे दी है. जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ने का विचार रखने वाले तमाम लोग इसके चलते अपने कदम पीछे खींच लिए. अब देखना है कि गोरखपुर में प्रतिष्ठि अखबारों के बीच कैसे यह अपनी जगह बनाता है. माना जा रहा है कि जनसंदेश टाइम्‍स का सर्कुलेशन जितना बढ़ेगा, जागरण को उतना नुकसान उठाना पड़ेगा.

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