बड़ी शर्म आती है मीडिया और मीडियाकर्मियों में बढ़ती चाटुकारिता पर. अखबार ना हुआ ड्रामा का मंच हो गया, जब जैसे मन करे नाटक कर लें. अब तक पेड न्यूज को लेकर ड्रामा होता था, अब पेड न्यूज नहीं मिल पा रहा है तो प्रायोजित न्यूज करके पत्रकारिता का छीछालेदर किया जा रहा है. और सारा खेल इसलिए कि कप्तान महोदय से नजदीकी बनी रहे. एकाध तबादला-पोस्टिंग कराकर कमाया-धमाया जा सके. गलत-सही मौकों पर उनका उपयोग किया जा सके. शायद अपने एसपी साहब भी प्रचार के पूरे भूखे हैं कि खबर ही प्रायोजित करा डाली. अब इस खबर को आयोग या कोई संस्थान कैसे पेड न्यूज बताएगा. किस आधार पर कोई कार्रवाई होगी?
मामला चंदौली जिले का है. एसपी साहब यानी शलभ माथुर ने सादे वर्दी में पिस्टल खोंसकर इनोवा गाड़ी से चेकिंग पर निकले. चेकिंग पर निकलने लगे तो अपने पत्रकार साथियों को बुला लिया ताकि जांच अभियान की पूरी नौटंकी और ड्रामा देखकर ये लोग दरबारी कवि स्टाइल में चारणगान कर सकें. दैनिक जागरण के ब्यूरोचीफ रत्नाकर दीक्षित, हिंदुस्तान के आनंद सिंह एवं अमर उजाला के अमित द्विवेदी को साहब अपने साथ बैठा लिए और निकल पड़े चेकिंग अभियान पर. अब जैसे सादे ड्रेस में चेकिंग करके वो अपनी ड्यूटी न निभा रहे हो बल्कि समाज के ऊपर, जिले वासियों के ऊपर एहसान कर रहे हों. ठीक उन नेताओं की तरह जो माल बटोरते समय तो मीडिया की परछाई भी नहीं देखना चाहते लेकिन अगर किसी स्कूल पर एक पेड़ लगा रहे होते हैं तो पूरे अखबार और चैनल वालों को नेवत देते हैं, जैसे बहुत बड़ा काम कर दिया हो.
वैसे भी चेकिंग अभियान अचानक होता है, जिसमें किसी को खबर नहीं होती, पर माथुर साहब तो प्रचार-प्रसार की पूरी व्यवस्था करके निकले. वो भी अपने खास दोस्तों के साथ, अगर इतना ही चेकिंग करनी थी तो जिले में तमाम अखबारों के पत्रकार हैं उनको भी नेवता बंटवा दिया होता, सारे लोग जय-जयकार करते, पर साहब ने तीन लोगों पर ही विश्वास जताया ताकि अगर कोई पोल खुले तो छीछालेदर न हो. साहब ने जांच किया, किसी को फटकारा तो किसी को दुलार किया. ये खबर अगर एक अखबार में छपी होती या बिना फोटो की प्रकाशित होती तो लोग एक बारगी मान भी लेते कि पत्रकार भाई मुस्तैद थे और साहब की चेकिंग अभियान के बारे में जान लिया. साहब की भी जय जयकार होती. पर ड्रामा तो ड्रामा ही होता है. उसको खुलते देर नहीं लगती. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है.
जब खबर मैनेज थी तो तीनों अखबारों में छपनी ही थी, छपी भी. वो भी फोटो के साथ तीनों अखबारों में एसपी साहब की मफलर से ढंकी फोटो छपी. ऐसा बखान किया गया कि साहब ने तो इतनी अच्छी व्यवस्था कर डाली है कि चुनाव के दौरान कोई परिंदा पर भी नहीं मार सकता. अखबारों का लेखन भाव ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे ये कप्तान साहब नहीं होते तो पता नहीं चुनाव हो भी पाता या नहीं हो पाता. अगर कोई कप्तान अपनी ड्यूटी कर रहा है तो वो आम जनता पर कोई एहसान थोड़े ही कर रहा है. वो वर्दी में जाए का सादे कपड़ों आम आदमी को उससे कौन सा फर्क पड़ जाना है. उसे तो फर्क उस समय पड़ेगा जब कानून-व्यवस्था सही हो. वैसे भी पुलिस विभाग कौन सा इन प्रायोजित जांच की नौटंकी से सुधर जाने वाला है. इस तरह की जांच की नौटंकी और ड्रामा चाहे जितना किया जाए यह विभाग नहीं सुधर सकता. हां साहब जरूर आम जनता तथा आयोग की नजरों में चमक सकते हैं.
पर क्या कहा जाए चंदौली जिले के इन पत्रकारों को, जो एक स्वस्थ्य पत्रकारिता करने की बजाय चाटुकारिता की पत्रकारिता पर उतर गए हैं. आम आदमी की आवाज कहे जाने वाले पत्रकार अब उसी आवाज से दूर होते जा रहे हैं. डीएम, एसपी से नजदीकी बढ़ाकर आम हित से जुड़ी खबरों को घोंट जाते हैं कि इन नौकरशाहों को कहीं खबरें चुभ ना जाएं. सही भी है आम आदमी क्या करेगा, क्या बना देगा और क्या बिगाड़ लेगा. जब वो नेता, अधिकारी, सरकारी कर्मचारियों का अब तक कुछ नहीं बिगाड़ सका तो इन पत्रकारों का क्या कर लेगा, जो ऐसे ही प्रायोजित खबरों के बल पर इन तीनों के चहेते बने हुए हैं.
शर्म आती है ऐसे पत्रकारों पर जिन्हें किसानों को खाद नहीं मिलने, नहर में पानी नहीं आने, जमाने भर की सड़के टूटी होने, गरीबों के लिए आने वाले अनुदानों में लूट मची होने, अस्पतालों में दवा नहीं मिलने, बैंकों से जरूरतमंदों को लोन नहीं मिलने, एनएचआरम, मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार होने की खबरें नहीं दिखती. शर्म आती है एसपी साहब पर भी कि उनकी नाक के नीचे अलीनगर में तेल डिपो और उसके आसपास नकली डीजल-पेट्रोल बनाने का धंधा हर दिन चलता है, पर आग के शोलों पर खड़े अलीनगर क्षेत्र की जनता के दुख को कम करने के लिए साहब छापेमारी नहीं करते. छापेमारी करते हैं तो बस प्रचार पाने के लिए. अब इन प्रायोजित खबरों पर आयोग और प्रेस परिषद क्या कहेगा.
भड़ास के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह की रिपोर्ट.





