वाइन किंग पोंटी चड्ढा के 25 ठिकानों पर एक साथ छापे मारकर आयकर विभाग ने खूब सोहरत बटोरी। आयकर विभाग की कार्यशैली से ऐसा लगा मानो पोंटी के पास काले धन की टकसाल होगी। यूपी-पंजाब और उत्तराखंड ही नहीं देशभर में लोग उत्सुकता से इस बात का इंतजार करने लगे कि क्या पोंटी का तिलिस्म टूटेगा? यह वो लोग थे जिनके लिए वाइन किंग का ‘साम्राज्य’ एक अबूझ पहेली जैसा था। भले ही उसकी चर्चा वाइन किंग के रूप में होती थी, लेकिन रंगीन पानी का यह सौदागर यहीं तक सीमित नहीं था। उसने कई धंधों में अपने पांव पसार रखे थे। रीयल स्टेट, चीनी मिल, ब्रासवेयर कारोबार, फिल्मी क्षेत्र आदि कई व्यवसायों में उसका हजारों करोड़ रुपया लगा हुआ था।
पोंटी की कार्यशैली बेहद गुपचुप तरीके से परवान चढ़ती थी, वह मीडिया से दूर रहता तो राजनीतिक मंचों पर भी कभी नहीं दिखता, लेकिन राजनेताओं को अपने इशारे पर नचाने की उसे महारथ हासिल थी। कुबेर जी उस पर मेहरबान थे तो वह बड़े-बड़े नेताओं पर ‘लक्ष्मी’ की मेहरबानी दिखाकर उन्हें अपना मुरीद बना लेता। शराब माफिया के रूप में कार्य करने वाला पोंटी अपने रिश्ते सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं से तो मजबूती के साथ बनाकर रखता ही था, विपक्षी दलों के नेताओं को भी वह कभी इस बात का अहसास नहीं होने देता कि विपक्ष में होने के कारण पोंटी के लिए वह गैर-जरूरी हैं।
उसके आका और हमदर्द सभी दलों में मौजूद हैं। भले ही पोंटी उनसे काम ले या न ले लेकिन वह किसी का हक नहीं मारता था, जब इन हमदर्दो को पोंटी की जरूरत पड़ती है तो वह उनके साथ खड़ा दिखाई देता तो यह हमदर्द पोंटी के लिए कायदे-कानून को ठेंगा दिखाने से पीछे नहीं रहते थे। यही वजह थी, वर्षों से तमाम विवादों में घिरे होने के बाद भी पोंटी के ‘गिरेबान’ में किसी की हाथ डालने की हिम्मत नहीं हुई। लीकर किंग की हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई राज्यों की सरकारें उसके एक इशारे पर नीतिगत फैसलों में भी बदलाव से हिचकिचाती नहीं थीं। यह बात एक ही उदाहरण से समझी जा सकती है। बात वर्ष 2007 की है जब मुलायम सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद उत्तर प्रदेश में माया सरकार सत्तारूढ़ हुई थी। माया के मुख्यमंत्री बनने ही लोगों को लगा कि मुलायम के करीबी पोंटी के दिन खत्म हो जाएंगे। इसका कारण भी था मायावती और मुलायम के बीच 36 का आंकड़ा। मायावती चुन-चुनकर हर उस नौकरशाह, पुलिस अधिकारी, उद्योगपति, व्यापारी को हाशिए पर डाल रही थी जो मुलायम की गुडलिस्ट में शामिल था। उनकी जगह वह अपने पसंदीदा लोगों को बैठा रही थी। मुलायम राज में अनिल अंबानी जैसे उद्योगपति और अमिताभ बच्चन तथा अमर सिंह सरीखे लोगों को उनका करीबी समझा जाता था। वहीं माया राज में इस जगह की भरपाई सतीश मिश्र, जेपी ग्रुप जैसे लोगों ने की।
ऐसा ही कुछ नौकरशाहों के साथ हुआ मुलायम राज में आईएएस अखंड प्रताप सिंह, सतीश अग्रवाल, चन्द्रमा प्रसाद, नीरा यादव, नवीन चन्द्र वाजपेई, अनीता सिंह, आईपीएस अधिकारी बाबू लाल यादव और डीजी बुआ सिंह की तूती बोलती थी। खासकर चन्द्रमा प्रसाद और अनीता सिंह तो मुलायम के कई राजनैतिक फैसलों में भी उनको राय देते थे। मुलायम राज में आईएएस अधिकारी मुख्य सचिव नवीन वाजपेई और डीजी बुआ सिंह सपा कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में मंच के ऊपर तक दिखाई दिए। इसको लेकर काफी बवाल मचा। जब मायावती ने राजपाठ संभाला तो उन्होंने सबसे पहले इन अधिकारियों को ही किनारे किया। माया की वजह से ही गैर आईएएस अधिकारी शंशाक शेखर कैबिनेट सचिव के पद पर विराजमान होकर कई आईएएस अधिकारियों को दिशा-निर्देश दे रहे हैं, लेकिन कोर्ट भी इस मामले में कुछ खास नहीं कर पाई। अदालत में काफी समय से शशांक को कैबिनेट सचिव बनाए जाने का मामला चल रहा है। माया राज में उनके बड़े अधिकारी मौका पड़ने से यह बताना नहीं भूलते कि किसे पार्टी से निकाला गया है। शशांक शेखर और आईएएस अधिकारी फतेह बहादुर सिंह बसपा सरकार की नाक-कान बने हुए थे तो पुलिस महानिदेशक बृजलाल भी वफादार अधिकारियों की लिस्ट में शामिल थे। इन अधिकारियों का बसपा शासनकाल में कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया, यह और बात थी कि चुनाव आयोग ने आते ही सबसे पहले इन अधिकारियों को चुनावी प्रक्रिया से किनारे करने का काम किया।
बसपा काल में अलग-अलग बैक ग्राउण्ड से आए उक्त लोगों ने खूब दौलत और शोहरत कमाईं। अगर माया ने मुलायम के किसी एक वफादार को नहीं छेड़ा तो वह वाइन किंग पोंटी चढ्डा ही था, जिसका सिक्का दोनों ही राज में खूब चला। पोंटी के अलावा यदि कोई और नाम माया राज में सबसे अधिक चर्चा में रहा तो वह जेपी ग्रुप था, जिसने खूब माल कमाया, लेकिन जब माया सरकार के जाने की उल्टी गिनती शुरू हुई तो उसने ‘गंगा एक्सप्रेस वे’ जैसी बसपा सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं से अपना पैसा वापस लेकर उसे अधर में लटकाने में भी देरी नहीं की। बहरहाल, बात पोंटी के लिए माया सरकार द्वारा नीतिगत फैसले बदलने के उदाहरण की कि जाए तो इसकी बानगी बसपा शासनकाल के शुरुआत में ही दिख गई थी। बसपा सरकार का गठन होते ही उत्तर प्रदेश चीनी निगम के माध्यम से पोंटी चड्ढा की अपनी ‘ब्लू वाटर लिमिटेड’ को शराब व्यवसाय का लाइसेंस प्रदान किया गया, इस पर जब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो सरकार ने जवाब दाखिल कर दिया कि आबकारी विभाग ने अपनी नीति बदल दी है। इसके बाद एक और बदलाव करते हुए सरकार के आकाओं ने मेरठ जोन के 23 जिलों में शराब कारोबार का लाइसेंस उत्तर प्रदेश सहकारी चीनी मिल संघ को दे दिया, जिसने पोंटी चड्ढा की ही दूसरी कंपनी ‘फ्लोर एंड फेना लिमिटेड’ के हाथों में शराब करोबार की डोर थमा दी। ऐसे ही तमाम फैसले लिए गए जिससे पोंटी और उसकी कंम्पनियां सीधे तौर पर फायदे में रहीं। आबकारी विभाग और पोंटी की मिलीभगत से शराब के शौकीन मोहताज हो गए, पोंटी जिस कंपनी की जो दारू लोगों को पिलाना चाहते, वह पिलाते कोई कुछ बोल नहीं सकता था। पैसे भी ज्यादा देना पड़ते थे। आबकारी मंत्री नसीमुद्दीन अपनी सरकार की सुप्रीम पॉवर और पोंटी के बीच ‘डील मैनेज’ करने का काम करते थे। बसपा के लिए लीकर किंग चड्ढा ‘एटीएम’ मशीन जैसा हो गया था।
पोंटी और बसपा गठजोड़ से उत्तर प्रदेश के छोटे कारोबारी बर्बादी के मुहाने पर पहुंच गए। इन लोगों ने कई बार इसके खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन जहां रक्षक ही भक्षक जैसे हों तो किसी का भला कैसे हो सकता था। वहीं उन नेताओं को भी यह गठजोड़ अच्छा नहीं लगता जिनको पोंटी ने घास नहीं डालनी बंद कर दी था। खासकर, समाजवादी पार्टी के नेताओं को बसपा और पोंटी का मेल-मिलाप बहुत खराब लगता। उत्तर प्रदेश में पोंटी रूपी पौध को ‘बागवान’ मुलायम ने ही बोया और सींचा था, लेकिन जब यह पौध पेड़ बनकर फलदार हुई तो दूसरा ‘बागवान’ (मायावती) आ गया। वह ‘फल’ खाने लगा। यह बात सपा के तो बर्दाश्त के काबिल थी ही नहीं, कांग्रेस भी इस धन-कुबेर को अपने पाले में लाने को लालायित थी, लेकिन उसके साथ मजबूरी यह थी कि वह उन राज्यों में कायदे से खड़ी ही नहीं थी जहां से पोंटी का धंधा पानी चलता था। फिर भी, पोंटी ने धंधे की खातिर दिल्ली और लखनऊ में बैठे कुछ कांग्रेसी नेताओं से अपनी करीबी बना रखी थी, इसके अलावा एक ही जिला मुरादाबाद के वाशिंदे होने के कारण पोंटी के गांधी परिवार के एक पारिवारिक सदस्य से भी काफी नजदीकियां हो गईं थीं। पोंटी को पता था कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस का यह सबसे ताकतवर ‘मोहरा’ उसके काम आ सकता है।
समय के साथ पोंटी पर संकट के बादल गहराते जा रहे थे, उसका दिनदूनी रात चौगनी तरक्की करना कुछ लोगों को रास नहीं आ रहा था। इसी बीच उत्तर प्रदेश में चुनाव का समय आ गया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जो काफी समय से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी के लिए हाथ-पैर मार रहे थे, वह तेजी से सक्रिय हो गए। उन्होंने मायावती सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार साबित करने की मुहिम चला दी तो दूसरी तरफ कांग्रेस गठबंधन की केन्द्र सरकार पर सपा-भाजपा और बसपा भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर उसके खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी माहौल गरम करने में लगे थे। राहुल को जनता के सामने यह साबित करने में पसीना आने लगा कि केन्द्र और राज्य में से कौन सी सरकार ज्यादा भ्रष्ट है। इस जंग में कभी बसपा सुप्रीमो मायावती का पलड़ा भारी लगता तो कभी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का। माया सरकार पर कई तरह के भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे तो वाइन किंग पोंटी की नजदीकी को लेकर वह कटघरे में खड़ी थी। कांग्रेस को पता था कि पोंटी और बसपा सरकार के रिश्तों को लेकर प्रदेश की जनता के बीच मायावती की छवि बेहद खराब है, इसी को भुनाने के लिए कांग्रेस ने एक तुरूप का पता चला। उसके एक इशारे पर आयकर विभाग की टीम पोंटी के खिलाफ सबूत जुटाने में लग गई। इस बात का अहसास पोंटी को भी था कि आयकर विभाग कभी भी उसके खिलाफ जाल बिछा सकता है। चुनावी संग्राम सिर चढ़कर बोल रहा था। आचार संहिता से बंधी मायावती सरकार पोंटी की किसी भी तरह की मदद करने में असमर्थ थीं तो चुनाव खर्च की बात कहकर बसपा सहित कई पार्टी के बड़े नेता उस पर चंदे के लिए दवाब डाल रहे थे। इसमें कुछ कांग्रेसी नेता भी शामिल थे, लेकिन पोंटी को वह कैश नहीं करा पा रहे थे।
उधर, उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के धुंआधार प्रचार और जीत के दावों से आत्ममुग्ध कांग्रेसियों को लगा कि यह समय पोंटी पर पकड़ बनाने के लिए मुफीद रहेगा। आयकर विभाग ने पोंटी के खिलाफ सबूत पहले से ही जुटा रखे थे। ऊपरसे इशारा पाते ही पोंटी के ठिकानों पर आयकर विभाग की छापेमारी शुरू हो गई। लखनऊ, दिल्ली, नोयडा, मुरादाबाद, बरेली आदि जिलों में एक साथ पोंटी के 25 ठिकानों पर छापामारी की गई। उस समय पोंटी सात समुंदर पार दुबई में मौजूद था। छापे में अरबों रुपया का काला धान सामने आने की बात कही जाने लगी। आयकर विभाग के छापों से वाइन किंग पोंटी चड्ढा बेचैन हो उठा। लीकर लॉबी के बादशाह और रीयल स्टेट में नई ऊंचाइयां हासिल करने वाले पोंटी को ऐसे समय पर आयकर विभाग ने जख्म दिया था, जब न तो बसपा सुप्रीमो उनकी कोई मदद कर सकती हैं और न सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव। कुछ दिनों बाद ही उसकी बेटी की शादी होने वाली थी, वह और उसका परिवार उसमें व्यस्थ्य था। भले ही आयकर विभाग की नियत में कोई खोट न हो लेकिन उसने छापा कार्रवाई के लिए जो समय चुना वह कई संकेत दे गया। आयकर विभाग ने पोंटी के ठिकानों पर छापे मारकर शादी के मौहल में रंग में भंग पैदा कर दिया। इतेफाक से जिस दिन पोंटी के यहां छापे की कार्रवाई हुई उसी दिन सोनिया गांधी और बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश में चुनावी बिगुल फूंका था।
पहले बसपा के निष्कासित नेता और मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के सहारे बसपा को घेरने की कोशिश फिर कुशवाहा के करीबी मुरादाबाद के ही सौरभ जैन की गिरफ्तारी और उसके बाद पोंटी पर शिकंजा। बसपा वाले इसमें राजनीति तलाशने लगे और उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि कहीं न कहीं कांग्रेस, सीबीआई और आयकर विभाग जैसे अपने नियंत्रण वाले विभागों के माध्यम से बसपा को घेरना चाहती है। गौरतलब हो जिस दिन पोंटी पर कार्रवाई की गई उसी दिन माया ने एक जनसभा में केन्द्र पर सीबीआई और आयकर विभाग के बेजा इस्तेमाल का भी आरोप लगाया था। पोंटी के ठिकानों पर छापा मारने वाली आयकर विभाग की टीम ने जिस तरह से व्यवहार किया उससे भी लोगों की शंका पुख्ता होने लगी। आयकर विभाग जो गुपचुप तरीके से काम करता है, वह छापे की कार्रवाई की खबरें लीक करने लगा। खासकर, नोयडा के एक माल के बेसमेंट में एक बड़ी तिजोरी में अरबों रुपया होने की बात को खूब हवा दी गई। छापा कार्रवाई चल ही रही थी कि आश्चर्यजनक रूप से यूपी के कई जिलों में प्रिंट रेट पर शराब बिकने लगी, जबकि पहले एमआरपी पर पांच रुपए से लेकर 50 रुपए तक प्रति बोतल अधिक वसूली हो रही थी। कहा यह जाता था यह पैसा चंदे के रूप में बसपा को मिलता है।
खैर, पोंटी के यहां आयकर विभाग के छापे की खबर जैसे ही उसके हमदर्दों को लगी, उन्होंने गुपचुप तरीके से छापे की हवा निकालने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया। पोंटी के हमदर्दो को पता था कि छापामारी के पीछे कांग्रेस का ही हाथ है। डैमेज कंट्रोल के लिए निकले पोंटी के लोगों ने गांधी परिवार के उस सदस्य से सबसे पहले सम्पर्क साधा जो मुरादाबाद में रहता तो था ही पोंटी से उसके पुराने संबंध भी थे। बात शुरू हुई तो बनने में देर नहीं लगी। धन कुबेर पोंटी चड्ढा के लोगों ने कुछ ही घंटों में सब कुछ मैनेज कर लिया। आयकर विभाग के जो अधिकारी छापामारी के समय आत्मविश्वास से लवरेज थे, उसके चेहरों पर ऊपर से आए एक आदेश ने कुठाराघात कर दिया। विभागीय अधिकारी हाथ मलते रह गए। जिस तिजोरी में अरबों रुपए की बात कही जा रही थी, उसमें एक पैसा भी नहीं मिला। सब कुछ मैनेज कर लेने के बाद पोंटी के अधिकारी सीना चौड़ा करके बात करने लगे उनकी तरफ से आयकर विभाग को कटघरे में खड़ा करने वाला बयान आया, ‘हमारी कम्पनी कोई गलत या नबंर दो का काम नहीं कर रही है, जितना भी कारोबार किया जा रहा है, उसका लेखा-जोखा कम्पनी के पास है और आयकर का भुगतान भी समय से किया जा रहा है।’’
आयकर विभाग को मुंह की खानी पड़ी और पोंटी का बालबांका नहीं हुआ। आयकर विभाग ने फजीहत से बचने के लिए शिगूफा छोड़ दिया गया कि सम्भवत: छापे की खबर लीक हो गई होगी, जिस कारण पोंटी के लोग सारा पैसा ठिकाने लगाने मे सफल हो गए। बहरहाल, छापे के बाद पोंटी को फायदा यह हुआ कि अब पोंटी के पास न कोई चंदा लेने आ रहा है न कोई यह पूछ रहा है कि क्या उसकी आस्था बदल गई हैं। कांग्रेस ने एक ही झटके में पहले पोंटी को झटका और उसके बाद उसे सहारा देकर उबार लिया। इसे लोग कांग्रेसी राजनीति और रणनीति बता रहे हैं। वैसे इससे इत्तर कहने वाले यह भी कह रहे थे वाइन किंग ने ही अपने खिलाफ छापेमारी का जाल बिछवाया था, इसके बदले में उसने मोटी रकम भी खर्च की थी, लेकिन यह रकम उस रकम से काफी कम थी जिसकी उम्मीद पोंटी से हासिल करने की उम्मीद बसपा आलाकमान लगाए हुए था। आयकर विभाग की छापेमारी कराकर पोंटी ने एक साथ कई निशाने साधे हैं। एक तो अब कोई यह नहीं कह पाएगा कि पोंटी के पास काले धन की खान है दूसरा पोंटी के करीबी यह कहते हुए बसपा को उसका ‘हक’ देने से बच जाएंगे कि उन्होंने कुछ कमाया ही नहीं तो देंगे कैसे। पोंटी जिस तरह से बसपा से दूरी बना रहे हैं उससे तो यही लगता है कि अगला शासन मायावती का नहीं होगा। वह माया से दूरी बनाकर और कांग्रेस एवं समाजवादी पार्टी के करीब आकर अपने भविष्य पर लगे ग्रहण को भी कम करना चाहते हैं। उन्हें पता है कि पिछले पांच सालों में उनके और माया सरकार के करीबी रिश्तों को लेकर खूब चर्चा हुई है, ऐसे में अगर कोई अन्य सरकार बनी तो वह उनकी कम्पनी
को अछूत समझकर किनारे लगा सकती है। यह बात यह बिजनेस मैन होने के नाते पोंटी कैसे बर्दाश्त कर सकते थे। बसपा से दूरी बढ़ाकर पोंटी एक तीर से कई निशाने लगाने के चक्कर में हैं।
लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की रिपोर्ट. अजय ‘माया’ मैग्जीन के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं. वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.






