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सूत न कपास : सीएम पद के लिए बेनी-पुनिया कर रहे बकवास

कांग्रेस के कुर्मी चेहरे एवं केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और दलित चेहरे एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पन्ना लाल पुनिया की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है. ताजा घटनाक्रम में बेनी बाबू ने बाराबंकी सांसद पीएल पुनिया को बाहरी बता विवाद को जन्म दे दिया है. मंत्री वर्मा ने दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र में पुनिया के लिए ये बात कही. दरियाबाद से वर्मा का बेटा राकेश कांग्रेस प्रत्याशी हैं. बेनी ने कहा पुनिया पंजाब के हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं है. ये बयान पुनिया के उस बयान से जोड़ कर देखा जा रहा है जिसमें पुनिया ने कहा था कि पार्टी ने किसी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया है.

कांग्रेस के कुर्मी चेहरे एवं केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और दलित चेहरे एवं राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पन्ना लाल पुनिया की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है. ताजा घटनाक्रम में बेनी बाबू ने बाराबंकी सांसद पीएल पुनिया को बाहरी बता विवाद को जन्म दे दिया है. मंत्री वर्मा ने दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र में पुनिया के लिए ये बात कही. दरियाबाद से वर्मा का बेटा राकेश कांग्रेस प्रत्याशी हैं. बेनी ने कहा पुनिया पंजाब के हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं है. ये बयान पुनिया के उस बयान से जोड़ कर देखा जा रहा है जिसमें पुनिया ने कहा था कि पार्टी ने किसी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया है.

ऐसे में आज जब उन्होंने कांग्रेस सांसद पीएल पुनिया को पंजाब का निवासी बता डाला तो कांग्रेस की गुटबाजी भी उभरकर सामने आ गयी. असलियत यह है कि बेनी बाबू अभी से ही अपने को प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री मान चुके हैं और उनके लिए कांग्रेस हाई कमान भी कोई खास मायने नहीं रखता. बताते चले कि बेनी प्रसाद उत्तर प्रदेश में कुर्मियों के बड़े नेता माने जाते हैं, और मध्य एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनका अच्छा प्रभाव व रसूख है. वहीं पुनिया भी कांग्रेस और प्रदेश के रसूखदार दलित नेता हैं, सूबे के दलित उन्हें पूरा आदर व मान देते हैं. खुद को भावी मुख्यमंत्री का योग्य और सक्षम उम्मीदवार साबित करने की जंग में बेनी और पुनिया के बीच छिड़ी लड़ाई से अगले छह चरणों के मतदान और मिशन 2012 को गहरा धक्का लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. विवाद को ठंडा करने के लिए दिग्विजय सिंह ने वर्मा को संयम बरतने की सलाह दी है. सिंह कहा कि दोनों ही पार्टी के कद्दावर नेता हैं. वर्मा को ऐसे बयान नहीं देने चाहिए.

पीएल पुनिया और बेनी के बीच छिड़ी लड़ाई कोई नयी नहीं है. केन्द्र में पद मिलने के बाद भी दोनों महानुभावों का अधिकतर समय यूपी में ही बीतता है. असल में पुनिया और बेनी दोनों की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी है. यह बात पार्टी हाइकमान से लेकर आम कार्यकर्ता तक को बखूबी मालूम है. दोनों को पार्टी और मंत्रिमंडल में महत्व देने की पीछे उनकी जाति का फैक्टर सबसे सबल पक्ष रहा है. कांग्रेस ने दलितों को साधने के लिए पुनिया और कुर्मियों को अपने पाले में लाने के लिए बेनी को खूब तवज्जों दी जाती है. सपा छोड़कर कांग्रेस में आए बेनी बाबू के पीछे स्ट्रांग कुर्मी वोट बैंक है, तो वहीं नौकरशाह से नेता बने पीएल पुनिया को मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के गरज और इरादे से पार्टी में खास जगह दी गयी है. कांग्रेस ने बेनी और पुनिया दोनों को केन्द्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण पद सौंप रखे हैं, बावजूद इसके दोनों का अधिकतर समय यूपी में ही बीतता है. बेनी बाबू के अजेंडे में केन्द्र की कुर्सी से ज्यादा सूबे की कमान महत्वपूर्ण हैं.

लखनऊ एयरपोर्ट से लेकर बहराइच तक मेन सड़क के किनारे इस्पात मंत्रालय के लगे बड़े-बड़े होर्डिंग बेनी बाबू की राजनीतिक महत्वकांक्षा और मन में दबी भावनाओं का खुलकर प्रदर्शन करते हैं. पीएल पुनिया भी यूपी से जुड़े दलित अत्याचार, अपराध के मुद्दे को अति गंभीरता से लेते हैं, जिसके चलते राष्ट्रीय स्तर का आयोग यूपी में ही सिमटकर रह गया है. बेनी और पुनिया दोनों एक दूसरे को पटखनी देने और एक दूसरे पर शब्द बाण चलाने का कोई अवसर छोड़ते नहीं है. बेटे के चुनाव प्रचार में व्यस्त बेनी बाबू को जैसे ही वोटिंग के दिन फुर्सत मिली उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी पुनिया पर हमले करने में देरी नहीं की और उन्हें बाहर का बताकर मुख्यमंत्री की रेस से बाहर करने का अचूक दांव चला. फिलहाल पुनिया ने इस मुद्दे पर सधा जवाब देकर एक बार फिर यह साबित किया कि वे संगठन के दायरे में रहने वाले नेता हैं. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि बेनी और पुनिया मुख्यमंत्री बनने के सपने किस आधार पर देख रहे हैं.

विधानसभा में कांग्रेस के 22 विधायक हैं, राहुल बाबा की दिन रात की मेहनत और दलित एवं मुसलमान प्रेम की बदौलत बहुत ज्यादा छलांग लगाकर कांग्रेस दुगनी सीटें पा जाएगी इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है. वोटरों को भरमाने और बरगालाने के लिए सभी दल अपने दम पर सरकार बनाने के दावे ठोंक रहे हैं लेकिन असलियत किसी से छिपी नहीं है. कांग्रेस की हालत और प्रदर्शन से राहुल खुद ही झुंझलाए और झल्लाए हुए हैं, उनकी हताशा, निराशा और चुनाव नतीजों की झलक वाराणसी में हुई प्रेस कांफ्रेस में दिख ही चुकी है, ऐसे में जो थोड़ा बहुत बेहतरी होने की संभावना है भी वो बेनी और पुनिया जैसे नेताओं की बयानबाजी और झगड़े की वजह से मिट्टी में मिल रही है. आज कांग्रेस आलाकमान पार्टी को सूबे में आईसीयू से बाहर निकालने में जुटा है और उसके नेता खुद को मुख्यमंत्री की दौड़ में अव्वल बनाने में जुटे हैं, बेनी और पुनिया के झगड़े को देखकर पुरानी कहावत न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लट्ठ साबित होती है.

लेखक डा. आशीष वशिष्‍ठ लखनऊ के स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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