प्रेषक: Hare Prakash Upadhyay ([email protected]), दिनांक: 9 फरवरी 2012 9:45 अपराह्न, विषय: पत्र, प्रति: [email protected], श्री अनुज पोद्दार, मैं आपको यह पत्र अत्यंत व्यथा और विक्षोभ के साथ लिख रहा हूं। आपका जैसा आचरण और जैसी गति है, उसमें संवेदना और विनम्रता जैसे तंतु तलाशना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है और यह पर्याप्त और समुचित वजह है कि आपसे कोई संवाद, संबंध या संपर्क कदापि न रखा जाए। यही वजह है जनसंदेश टाइम्स में आप जब से पधारे मेरे जैसे व्यक्ति का वहां काम कर पाना खासा असुविधाजनक हो गया था और संपादक श्री सुभाष राय अगर वहां बने भी होते तो अब मेरा वहां बने रह पाना कतई संभव नहीं था और मैंने सोच लिया था कि एक फरवरी से मुझे वहां नहीं होना है।
सुनने में यह आया है कि आपने जनवरी महीने में मेरे द्वारा जनसंदेश टाइम्स को दी गई सेवा का मेहनताना इसलिए रोक रखा है कि मैंने वहां छपनेवाले लेखकों के संपर्क नंबर या उनके लिखे लेख आपको नहीं सौंपे। आपका यह तर्क आपकी समझ को मेरे सामने और स्पष्ट करता है और मुझे आश्वस्त करता है कि संस्थान से अलग होने का मेरा निर्णय अत्यंत उचित है। आप वही शख्स हैं जिसने कभी मुझे फोन कर कहा था कि लेखकों से कहो कि वे जनसंदेश टाइम्स के लिए विज्ञापन का प्रबंध करें तब उनके लेख प्रकाशित करो। आपने करीब आठ महीने से लेखकों की पारिश्रमिक रोक रखी है जो अत्यंत न्यूनतम भुगतान के विश्वास पर भी लगातार लिखते रहे हैं। आपको शायद पता नहीं है कि आपके यहां नियमित लिखनेवाले ये लेखक दूसरी जगहों पर आपके यहां से भुगतान के लिए तय की गई राशि की करीब आठ गुनी दर पर अपने लेख या दूसरी रचनाएं देते हैं। मुझे दुःख है कि रचनाओं और लेखकों के संबंध में आपसे निहायत किराना दुकान वाली भाषा में बात करनी पड़ रही है। आप बार-बार कहते रहे हैं कि आपको इन्हें छापना ही नहीं है। आखिर ऐसा अब क्या है कि आपको इन लेखकों से संपर्क आदि की जरूरत पड़ गई।
मैं जबसे जन संदेश टाइम्स में आया तब से संपादकीय और फीचर के कुल पांच पृष्ठों की सामग्री रोज ही प्रबंध कर प्रकाशित करता रहा और रविवार के दिन नौ पृष्ठ। इधर आकर आप उन पन्नों से घृणा वश उन्हें बंद करने पर तुले थे और काफी पेज कम कर दिए थे। मैंने चुनाव के चार पृष्ठों पर भी अपनी देख-रेख में लगातार गंभीर सामग्री प्रकाशित की। मैं जब आया तो मुझे भी कहीं से एक मैटर संस्थान ने तो दिए नहीं थे। सब अपने बल बूते ही तो किया।
दूसरी बात यह कि जिस दिन मैंने संस्थान को छोड़ा, उस दिन भी अपने सारे पेज मैंने बखूबी प्रकाशित किए और जब मैं वहां से बाहर निकला तो वहां कोई सन्नाटा नहीं था, सारा स्टाफ भरा हुआ था। मैंने करीब आठ बजे रात्रि तक अपना सारा काम समाप्त कर लिया था। पूछिए वहां के तमाम काम करने वाले लोगों और गार्ड से कि मैं अपने साथ क्या लेकर निकला था। आपको पता होना चाहिए कि मैं अपनी करीब तीन-चार हजार की निजी किताबें और पत्रिकाएं वहां छोड़ आया हूं। मेरी मेज की दराज और आलमारी जिसने खोली होगी उससे पूछ लें। मेरे जाने के बाद वहां किसने चीजों की क्या उलटफेर की, उसके बारे में मैं क्या बता सकता हूं। आपको यह तो मेरे आसपास बैठनेवाले लोगों और अपने दूसरे वहां के कर्मचारियों से यह जानकारी लेनी चाहिए।
आपने जिन नए लोगों की भर्ती की है, वे भी आपकी तरह ही प्रचंड प्रतिभा से भरे लगते हैं। जब मैं सारे लेखकों के मोबाइल नंबर लेखों के साथ ही प्रकाशित करता रहा हूं फिर भी वे उनसे संपर्क नहीं कर पा रहे हैं, तो महोदय सोचिए थोड़ा कि आपसे वे लेखकों के संपर्क नंबर मांगकर क्या आपको ही मूर्ख नहीं बना रहे हैं? साथ ही यह भी कि अगर लेखकों से उनके अपने संपर्क ही नहीं हैं तो आप उन्हें वह काम सौंपकर जो लेखकों के सहयोग से होता है, खुद को ही मूर्ख नहीं बना रहे हैं? खैर, यह आपकी समस्या है।
एक चीज आपको यह भी ध्यान दिलाना पड़ेगा कि दैनिक अखबारों में छपने वाले लेख अत्यंत सामयिक होते हैं, उन्हें तत्काल प्रकाशित किया जाता है, उनका बैंक नहीं बनाया जाता। घटनाएं तुरंत पुरानी पड़ जाती हैं, इसलिए दैनिकों के लिए पहले से लिखाकर रखे गए लेखों का संदर्भ बासी हो जाता है, इसलिए वे अनुपयोगी हो जाते हैं। खैर मुझे इन सब चीजों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। मैंने काम किया है और मुझे पारिश्रमिक चाहिए। अगर अतिशीघ्र आपने जनवरी महीने का मेरा वेतन मेरे खाते में जमा नहीं करवाया तो मैं कानूनी कार्रवाई के लिए बाध्य होऊंगा।
हरे प्रकाश उपाध्याय
फीचर एडिटर
हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट, लखनऊ
पूर्व फीचर एडिटर
हिंदी दैनिक जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ






