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बीबीसी का पत्रकार बना नेपाली फिल्‍म का हीरो

किसी बड़े फ़िल्म उत्सव में शामिल होने वाली 'हाईवे' पहली नेपाली फ़िल्म है, जिसमें बीबीसी नेपाली सेवा के रबींद्र मिश्रा मुख्य किरदार निभा रहे हैं. रबींद्र के लिए फ़िल्मों में काम करना किसी चुनौती से कम नहीं था लेकिन पुतलों के प्रति आसक्त एक डॉक्टर की भूमिका निभाना और भी ज्य़ादा कठिन था. बीबीसी नेपाली सेवा के रबींद्र मिश्रा कहते हैं, ''जब मुझे ये कहा गया कि इस किरदार को मैं निभाऊंगा, तब अभिनय के प्रति रुझान होने के बावजूद मेरे मन में थोड़ी शंका थी.''

किसी बड़े फ़िल्म उत्सव में शामिल होने वाली 'हाईवे' पहली नेपाली फ़िल्म है, जिसमें बीबीसी नेपाली सेवा के रबींद्र मिश्रा मुख्य किरदार निभा रहे हैं. रबींद्र के लिए फ़िल्मों में काम करना किसी चुनौती से कम नहीं था लेकिन पुतलों के प्रति आसक्त एक डॉक्टर की भूमिका निभाना और भी ज्य़ादा कठिन था. बीबीसी नेपाली सेवा के रबींद्र मिश्रा कहते हैं, ''जब मुझे ये कहा गया कि इस किरदार को मैं निभाऊंगा, तब अभिनय के प्रति रुझान होने के बावजूद मेरे मन में थोड़ी शंका थी.''

वो कहते हैं ''ये एक सामान्य किरदार नहीं था, ये काफी उलझा हुआ था और मैं ये सच बख़ूबी समझ रहा था क्योकि मुझसे पहले इसे नेपाली फ़िल्मों के जाने माने अभिनेता राजेश हमल से करने को कहा गया था, लेकिन 'हाई-वे' फ़िल्म के निर्देशक दीपक रौनियार और कास्टिंग निर्देशक आशा मगारती ने मुझे बार-बार ये विश्वास दिलाया कि मैं एक अच्छा विकल्प हूँ.''

भूमिका की तैयारी : फ़िल्म में एक मेहनती डॉक्टर का रोल निभा रहे रबींद्र कहते हैं कि रिहर्सल के दौरान उन्होंने इस तरह की सनक वाले लोगों के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की है. इस दौरान उन्हें पता चला कि अमरीका में इस तरह के सनकी व्यक्ति को दुकान की खिड़कियां तोड़कर पुतले चुराने के आरोप में जेल भेज दिया गया था. तो पत्नी के साथ ख़राब होने संबंधों के कारण एक पुतले के प्रति यौन आकर्षित डॉक्टर का किरदार निभाने के लिए उन्होंने किस तरह की तैयारी करनी पड़ी? ख़ासकर तब जब इससे पहले आपने सिर्फ स्कूल-कॉलेज में ड्रामा में भाग लिया हो और पिछले 20 सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं? रबींद्र ने इसके लिए एक हफ़्ते की कार्यशाला में भाग लिया था जिसमें उन्हें इस रोल से संबंधित कुछ मूल जानकारियां दी गई थी.

विक्षिप्त डॉक्टर की कहानी : फ़िल्म की कहानी पूर्वी नेपाल से राजधानी काठमांडू की ओर जाती एक बस-यात्रा पर केंद्रित है, जिसमें पांच अलग-अलग तरह के संबंधों को दिखाया गया है जो ना चाहते हुए भी एक-दूसरे में उलझ जाते हैं. बस में सवार यात्री जल्द से जल्द अपनी मंज़िल तक पहुंचना चाहते हैं लेकिन एक 'बंद' के कारण वो बीच में ही फंस जाते हैं. जैसे-जैसे फ़िल्म की कहानी आगे बढ़ती उसमें इन यात्रियों की 'बंद' से बच निकलने की कोशिश के बीच उनके मनोवैज्ञानिक और आध्यामिक जज़्बात को दर्शाया गया है. ये वो हालात थे जिनसे नेपाल के लोग पिछले 12 साल के गृहयुद्ध के दौरान जूझ रहे थे.

रबिंद्र कहते हैं, ''मैंने फ़िल्म के निर्देशक दीपक रौनियार से साफ़ कह दिया था अगर मैं उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता हूँ तो वे किसी भी वक्त मुझे फ़िल्म से बाहर कर सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.'' ''ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि मैंने किरदार के लिए खूब मेहनत की थी और निर्देशक की सलाह के साथ मुझमें इस किरदार को निभाने लायक आत्मविश्वास आ गया था जिससे मैं पूरी तरह अपने किरदार में खो गया था.'' ''हालांकि फ़िल्म की हर सीन को कई-कई बार फ़िल्माया गया था, इसके बावजूद मैं धीरे-धीरे अपने अभिनय में सहज होने लगा था.'' ''मेरे लिए ये व्यक्तिगत उपलब्धि है, लेकिन दीपक रौनियार के लिए दोगुनी.''

खुशी के आंसू : इतना भी काफ़ी नहीं है क्योंकि फ़िल्म को हॉलीवु़ड के बड़े कलाकारों डैनी ग्लोवर और जोसलिन बार्न्स का समर्थन मिला हुआ है. एक वक्तव्य जारी कर इन दोनों कलाकारों ने कहा है,''रबींद्र के किरदार का फ़िल्म में अपनी पत्नी से मोहभंग हो जाता है, और ये बड़ी ही खूबी से फ़िल्म में दिखाया गया है एक ऐसे समाज की पृष्टभूमि में जो पिछले 12 सालों से गृहयुद्ध जैसे हालात झेल रहा है. इस तरह की कहानी हर जगह पसंद की जाती है.''

ग्लोवर ने एक वेबसाइट के ज़रिए फ़िल्म को बनाने में आए खर्चे को वहन करने की भी अपील की है. एक ही महीने में ही इस मुहिम के ज़रिए 34 हज़ार डॉलर इकट्ठा कर लिए गए. ये पूरी कोशिश काठमांडू फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए एक वरदान जैसा है, जहां हर साल करीब 80 फ़िल्मों का निर्माण होता है. नेपाली फ़िल्म इंडस्ट्री ज्य़ादा पुरानी नहीं है, 1964 में यहां पहली नेपाली फ़िल्म बनी थी और किसी बड़े उत्सव में पहुंचने के लिए 50 सालों का वक्त लग गया. इसी वजह से 'हाई-वे' की इतनी चर्चा में है.

लेकिन कई लोगों का मानना है कि फ़िल्म काफी उंचे दर्जे की होगी तभी इसे बर्लिन फ़िल्म उत्सव में शामिल किया गया है जिसने फ़िल्म के निर्देशक दीपक रौनियार की आखों में खुशी के आंसू ला दिए. फ़िल्म पहले अंतरराष्ट्रीय बाजा़र में फिर सितंबर-अक्टूबर के महीने में नेपाल में रिलीज़ होगी. रबींद्र मानते हैं कि वो ख़ुशकिस्मत हैं कि उन्हें अपने सपनों को पूरा करने का मौका मिला. साभार : बीबीसी

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