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सुख-दुख...

लड़कियां पैदायशी फीचर वाली होती हैं!

शब्दों को साक्षी बनाकर सपनों की एक दुनिया बसाने की चाहत रखने वाली लड़कियां किसी शहर-किसी महानगर में पत्रिकाओं और अखबारों के एक दफ्तर से निकलकर हांफती हुई, दूसरे दफ्तरों का रूख करती हैं… तो कुछ घंटों और कुछ मीलों का वह सफर इतना बोझिल और अंदर से हाहाकार भरा होता है कि उसे व्यक्त करने के लिए शब्द चूकने लगते हैं। उसे वही समझ सकते हैं, जो आंखों की भाषा को पढ़ने की हिम्मत रखते हैं। मुझे तो फिलहाल सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता याद आ रही है-

शब्दों को साक्षी बनाकर सपनों की एक दुनिया बसाने की चाहत रखने वाली लड़कियां किसी शहर-किसी महानगर में पत्रिकाओं और अखबारों के एक दफ्तर से निकलकर हांफती हुई, दूसरे दफ्तरों का रूख करती हैं… तो कुछ घंटों और कुछ मीलों का वह सफर इतना बोझिल और अंदर से हाहाकार भरा होता है कि उसे व्यक्त करने के लिए शब्द चूकने लगते हैं। उसे वही समझ सकते हैं, जो आंखों की भाषा को पढ़ने की हिम्मत रखते हैं। मुझे तो फिलहाल सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता याद आ रही है-

भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं,
उसे तब तक घूरो
जब तक तुम्हारी आंखें
सुर्ख न हो जाएं,
और तुम कर भी क्या सकते हो
जब वह तुम्हारे सामने हो?

बात देश की राजधानी दिल्ली की करें तो, हर रोज बड़े-बड़े संस्थानों से नई-नई लड़कियों की फौज पत्रकारिता में चली आ रही है। उन्हें मीडिया का गलैमर खींच रहा है। कुछ लीक से हटकर करने की ख्वाहिशें हैं मन में। पिछले दो दशक से पत्रकारिता के बदलते माहौल को देख रही हूं। हालात जरुर बदल गए हैं लेकिन सोच नहीं बदली है। हमारे हाथ में कहने को मशाल है जिससे पाठकों को रोशन करने का दम भरते हैं। लेकिन हमारे अपने तले में कितना घटाटोप अंधेरा है कितना आतंक है कितना छल है, कितनी कितनी साजिशें, कौन किसस कहे! क्योंकि यहां इस दुनिया में छल के इतने चेहरे और प्रपंच की इतनी परते हैं, जिसका न तो कोई अंत है और नहीं शुरुआत की कोई खास तारीख।

तारीख तो याद नहीं, लेकिन कुछ साल पहले की बात है। जेएनयू में शोध कर रही एक लड़की मेरे पास फ्रीलांसिग करने के लिए आई। उसे मेरे तत्कालीन संपादक ने भेजा था। वह चाह रही थी कि मैं मनोरंजन बीट से संबंधित कोई असाइनमेंट दूं ताकि उसके लिखने का रास्ता खुले। मैं उसे कोई भी असाइनमेंट देने से पहले उसकी रुचि जानना चाहती थी। मैंने पूछा तो पता चला कि उसकी रुचि पोलिटिक्ल साइंस में है। वह शोध भी इसी विषय से कर रही है। स्टोरी भी इसी लाइन से जुड़ी करना चाहती थी। लेकिन उसे कहा गया कि किसी नए फ्रीलांसर को हार्ड स्टोरी नहीं करने देते हैं। पहले कला संस्कृति पर कुछ लिखो या सिनेमा- विनेमा कुछ… अब उस लड़की को पत्रकारिता करनी है तो किसी तरह घुसने के लिए कोई भी असाइनमेंट स्वीकार कर लेना है चाहे उसकी रुचि हो ना हो, उसकी समझ हो या ना हो। चाहे वह कला संस्कृति का क ख ग भी ना जानती हो। सिनेमा से चाहे कोसों दूर भागती हो.. उसे अपनी शुरुआत निहायत अरुचिकर विषय से करनी है। मैंने उसे समझाया कि वह संपादक से फिर से जाकर बात करें, उन्हें कनवींस करे कि वह शुरुआत कला संस्कृति से नहीं करना चाहती। जिसमें उसको ज्ञान है उसे वही काम दिया जाए। वह गई। उसने संपादक से कहा कि मैडम इंटरटेंमेंट का असाइनमेंट देने से मना कर रही है। कह रही हैं पोलिटिक्ल करो। मैं हैरान रह गई। उसने उल्टा मेरी शिकायत कर दी। मैं नहीं चाहती थी कि वह इस जाल में फंसे, जिसमें हिंदी पत्रकारिता की अनेक लड़कियां फंस कर रह गई हैं। जहां से चलती हैं, वहीं उनकी मंजिल खत्म हो जाती है। मैंने उसके बाद नई लड़कियों को इस तरह समझाना बंद ही कर दिया। वो आती हैं, सॉफ्ट स्टोरी या फीचर में उनको उलझा दिया जाता है और वे मस्त रहती हैं कि इंट्री मिल गई।

यह हिंदी पत्रकारिता की ट्रैजिक अवधारणा है कि लड़कियां फीचर रिपोर्टिंग बढि़या कर सकती हैं। वे पैदायशी फीचर वाली हैं। ये अहसास उनके भीतर भी साजिशन कूट-कूट कर भर दिया जाता है कि वे ही इसके लायक उचित पात्र हैं, वे ही न्याय कर सकती हैं, वे ही सांस्कृतिक हैं, जैसे जीवन में संस्कृति बचाने का ठेका औरतों के जिम्मे हैं वैसे ही पत्रकारिता में फीचर रिपोर्टिंग को बचाने का ठेका लड़कियों के पास है। वे इसी में खुश हैं, ना इससे आगे जाना चाहती हैं ना इस लुभावने जाल से बाहर आना चाहती हैं। उनके दिमाग की कंडीशनिंग ऐसी कर दी जाती है कि अपना भविष्य इसी दुनिया में तलाश लेती हैं। वह नहीं समझ पाती कि यह इस समय की सबसे बड़ी हिंसा हैं उन्हें चोटी पर पहुंचने के लिए रोकने का। मैं यहां कार्ल मार्क्स की बेहद पापुलर पक्तियां दोहराना चाहूंगी। मार्क्स कहते हैं- "इतिहास के किसी भी दौर में समाज की प्रगति की असलियत जाननी हो तो उस समाज में औरतों की स्थिति का पता लगाइए।"

हिंदी पत्रकारिता पर उनका यह कथन सौ प्रतिशत लागू होता है। हिंदी पत्रकारिता की हालत जाननी हो तो यहां काम कर रही हैं महिला पत्रकारों की सूची पर गौर करिए। उनके काम और योगदान पर नजर डालिए। सहज ही अंदाजा हो जाएगा। वरिष्ठ पत्रकार इरा झा ने एक बार तल्खी दिखाई तो कुछेक लोग तिलमिला उठे थे। इरा कहती हैं- हिंदी अखबारों में महिलाओं के लिए एक खास तरह की अलिखित आचार संहिता है। अखबार के पुरुष सहकर्मी ही नहीं बास तक इन महिलाओं से इन्हीं ढर्रो पर चलने की उम्मीद रखते हैं। अखबारों का यह सामाजिक ढांचा सिविल सर्विस, अध्यापन और अन्य सरकारी नौकरियां का मोह छोड़ कर पत्रकारिता के इस कठिन पेशे में उतर आई इन महिला कर्मचारियों को आजाद तरीके से जीने और अपने कैरियर में मकाम बनाने की जरा सी भी मोहलत नहीं देता। देश का कोई भी हिंदी अखबार इसका अपवाद नहीं है। इरा झा की बातों में दम हैं। लेकिन हमें सिक्के के दोनों पहलू की तरफ देखना चाहिए। पहले पत्रकारिता में आने वाली लड़कियों के बारे में कुछ बातें। पिछले दो दशक से पत्रकारिता को नजदीक से देखने के बाद समझ में आया कि मामला सिर्फ एकतरफा नहीं है। ना जाने कितनी लड़कियों को ट्रेनिंग देने के अनुभव के बाद इसी नतीजे पर पहुंची हूं कि खुद लड़कियां भी इस पेशे को गंभीरता से नहीं समझ पाती। आजकल तो बिल्कुल नहीं। आधी से ज्यादा लड़कियां घरेलू मामलों में उलझ कर रह जाती हैं। वे लांग टर्म प्लानिंग नहीं करती। अपनी पारिवारिक जिम्मेवारियों में इतना उलझ जाती हैं कि पत्रकारिता के परिदृश्य से ही गायब हो गई। टीवी का उदाहरण देकर बात करते हैं। कई महिला पत्रकारों की महत्वाकांक्षाएं उनकी मजबूरियों के आगे दम तोड़ जाती हैं। मेरे जानने वालो में 6 महिलाएं ऐसी हैं जो बीच में ही चमकदार कैरियर छोड़ कर पति के साथ विदेश चली गई या बच्चा पाल रही हैं। कुछ में पत्रकारिता को लेकर ना पैशन था ना कमिटमेंट, तो कुछ में दोनों था लेकिन चुनने का मौका आया तो घर परिवार चुनना पड़ा। नौकरी की असुरक्षा परिवार पर भारी पड़ती है। लड़कियां सुरक्षा के नाम पर ही तो अब तक सारे जुल्मों सितम झेलती आ रही हैं।

सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा बहुत बड़ा फैक्टर है। जिसे इगनोर नहीं किया जा सकता। पत्रकारिता सबसे ज्यादा असुरक्षित पेशा है जहां गर्दन पर हमेशा लाला या संपादक की तलवार लटकती रहती है। आपकी गर्दन कभी भी कट सकती है। किसी भी पल आप जिबह होने को तैयार रहिए। जिस पेशे में इतनी असुरक्षा हो वहां कम से कम लड़कियां लंबी पारी खेलने के बारे में सोच भी नहीं सकती। आप कुछ नामों पर गौर करिए.. जो कुछ महिलाएं अब तक इस पेशे में टिकी हुई हैं तो अपने परिवारों के दम पर। नौकरी जिनके लिए ब्रेड एंड बटर नहीं है। अपने दम पर टिकने का माद्दा बहुत कम हैं। परिवार का सपोर्ट बहुत बड़ा मसला है। जिन परिवारों ने नाइट डयूटी की इजाजत नहीं दी वहां महिलाओं ने डेस्क या फीचर की आरामदायक जगह ढूंढ ली। पत्रकारिता में फीचर ऐसी राह है जो कभी ऊंचे मुकाम तक नहीं ले जाती, अगर आप लगातार वहां टिके रहे। कुछ मामलों में पुरुषों को तो पहुंचते देखा गया है लेकिन औरतों के लिए ज्यादा से ज्यादा किसी महिला पत्रिका के संपादक की कुर्सी बच जाती है। उन्हें किसी अखबार या पत्रिका के संपादक की कुर्सी कभी नहीं मिल सकती। जहां कुछ महिलाएं फीचर से आगे निकल भी रही हैं उन्हें इस बात का अहसास कराया जा रहा है, कि कहां कमी हैं जो उन्हें अदृश्य शीशे की छत पार करने नहीं देगा। ऊंचे पदों पर जाने के लिए जो गुण (अवगुण) चाहिए, महिलाएं शायद इस खांचे में फिट नहीं बैठतीं। वरिष्ठ पत्रकार मनीषा भल्ला कहती हैं- लड़कियां किसी की अहम को सहलाती नहीं। इससे मेल इगो को चोट पहुंचती है। पुरुष चाहते हैं कि अगर लड़की को हम आगे बढ़ा रहे हैं तो यह हमारी सैटेलाइट बनकर रहे। हमारी पिछलग्गू बने। उसको आत्मनिर्भर कभी नहीं बनने देगा।

एक हद तक बात सही भी है। पुरुषों को महिलाओं की बासगिरी कभी नहीं भाती है। अपने-अपने घरों से आक्रांत पुरुष दफ्तरों में महिलाओं को मुठ्टी में कसने की दुर्दम्य आकांक्षा पाले रहते हैं। दफ्तर में स्त्री बास के होने से जो माहौल होगा, इसकी कल्पना से ही पुरुष खौफजदा रहते हैं। कुछ हद तक महिलाएं भी महिला बास को हजम नहीं कर पाती हैं। उन्हें पुरुषों की गुलामी की आदत जो सदियों से पड़ी है। एक पुरुष राज करे तो बहुत अच्छा, एक स्त्री राज करने लायक दिखे तो विरोध शुरु। ज्यादातर अखबारीय दफ्तरों में महिलाएं ही महिलाओं के पीछे पड़ी हैं और उनकी जड़ें खोद रही हैं। इस मामले में पुरुष बहुत मजे लेते हैं और उनका काम आसान होता है। पुरुषों के हाथ का औजार बनी ये औरतें समझ ही नहीं पाती कि वे कहां इस्तेमाल हो रही हैं और एक दिन वह भी निचोड़ कर पत्रकारिता के कूड़ेदान में फेंक दी जाएगी।

फुल टाइम पत्रकार बनना आसान नहीं है। इसके लिए आपको 24 घंटे आन रहना पड़ता है। लेकिन महिलाएं घर में आते ही मां बहू और बीबी में तब्दील हो जाती है। उसके दिमाग में ना अमर सिंह की गिरफ्तारी चलती है ना इंडियन क्रिक्रेट टीम की हार का गम होता है। न्यूज चैनल देखे या किचन की तैयारी करें। फोन पर प्रबंधन के आकाओं से सेटिंग करें या डिनर प्लेट सजाएं। एक पत्रकार पुरुष की सुबह फोन से होती है, सेटिंग गेटिंग से होती है एक महिला पत्रकार की सुबह बच्चे पति के टिफिन तैयार करने से होती है। आधी रात को धमाके की खबर सुनकर पुरुष पत्रकार घर से निकल जा सकता है और महिला पत्रकार को दफ्तर इस लायक नहीं समझता है और ना महिला इतनी हिम्मत जुटा पाएगी। उसे कई-कई दीवारों से टकराना पड़ेगा। यहां भी महिला की देह आड़े आ जाती है।

ज्यादातर मामने में देह दुश्मन हैं। स्त्री की देह उसके विकास में सबसे बड़ी बाधक है। वह ना बाहर सुरक्षित है ना घर में। देर रात निकलती है तो आजतक की पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की तरह मार दी जाती है। पुरुष जितना देह से मुक्त हैं उतना ही विचारों से। उसके लिए खुला आकाश और स्त्री के लिए पत्रकारिता का घेराबंद आकाश। यही उसकी सीमा है। उदारवादी पुरुष कहते हैं कि मीडिया में ऊंचे पदों पर ना जाने देने के लिए अदृश्य ग्लास सीलिंग है। जो आपको दिखाई नहीं देता। आप कभी उसको पार नहीं कर पाएंगें जब तक आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद मजबूत ना हो। पावर शेयर में आपकी पृष्ठभूमि का रोल ना हो। सत्ता को आपके पावर शेयरिंग पर भरोसा होना चाहिए। हमारे सामने एक ही उदाहरण है हिंदी में। दूसरे की संभावना दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रही है। गिनती की महिला पत्रकार हैं जो राजनीतिक पत्रकारिता कर रही हैं। यह माना जाता है कि एक संपादक बनने के लिए कुशल प्रबंधन के साथ-साथ सर्वज्ञाता होना बेहद जरुरी है। आप मालिकों के हित भी समझें, पाठकों का स्वाद भी और बाजार को साध सकें। एक संपादक को मालिक का कंधा होना चाहिए जिस पर वह अपनी बंदूक रख कर जब चाहे चला सके। क्या स्त्री ऐसा नहीं कर सकती। या पुरुष मालिक को एक स्त्री पर भरोसा नहीं। क्या समझ में महिलाएं पुरुषों से कमजोर हैं। आप पुरुषों से पूछे, ज्यादातर लोग सहमति जताएंगे।

कुछ कहेंगे कि लड़कियों की अपर स्टोरी (ऊपरी माला) खाली होता है। फिर भी लड़कियों को मौका देते हैं। इसके पीछे बहुत घिनौनी वजहें हैं। लड़कियां चाहे जिस मुगालते में रहें.. लेकिन सच तो यहां है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया रुपरंग का बाजार है। वहां सुंदरता देखकर नौकरी दे दी जाती है। चार सवाल आप चाहे लाइव प्रोग्राम में ना पूछ पाएं। बास माथा ठोंकता रहेगा लेकिन आपको चढ़ाता रहेगा क्योंकि जो नेता या खिलाड़ी पुरुष पत्रकारों को इंटरव्यू का टाइम नहीं देता उन्हें आसानी से लड़कियां कैच कर लेती हैं। प्रिंट मीडिया रुपरंग के प्रभाव से अबतक बचा है। यहां आप अच्छा लिख सकते हैं खबरों की समझ है तो आपको काम मिलेगा नहीं तो दूर से सलाम। लेकिन प्रिंट के अपने अलग संकट हैं। हिंदी पत्रकारिता का माहौल बेहद दमघोंटू है। आप खुशकिस्मत होंगे कि आपको हिंदी में कोई आधुनिक सोच वाला बास या माहौल मिल जाए। इसके भी संकट है। आपको बास के साथ जोड़ दिया जाएगा और आपकी समझ पर सवाल खड़ा हो जाएगा।

लोग मानकर चलेंगे कि महिला अपने बूते कभी तरक्की नहीं कर सकती। उसे गाडफादर की सख्त जरुरत होती है। उसकी प्रगति में किसी पुरुष को हाथ होगा। पत्रकारिता में सालों तक ये सब झेलने वाली इरा झा कहती हैं- "हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं का हंस कर बोलना निर्ल्लजता है। पुरुष का ऐसा व्यवहार खुशमिजाजी। महिला की मुस्कुराहट ओछापन, पुरुष मुस्कुराए तो मस्त बंदा। महिला साफ-साफ बात करे तो मुंहफट, पुरुष करे तो बेबाक। सही बात पर अड़ने वाली महिला झगड़ालू और पुरुष विद्रोही तेवर का कहलाता है। महिला का छुट्टी लेना उसका काम के प्रति सिंसियर ना होना और पुरुष का छुट्टी लेना उसकी जरुरत। इस दुनिया की सबसे निर्मम सच्चाई यह है कि आपके सान्निध्य को तरसने वाले और आपके साथ चंद मिनट चाय पीकर निहाल हो जाने वाले हमदर्द-से साथी ही महिला के जिम्मेदार पद पर पहुंच सकने की संभावना का इशारा मिलते ही उसके सबसे बड़े विरोधी तक साबित हो सकते हैं।"

मनीषा भल्ला अपने से जुड़ी एक घटना सुनाती है। बात उन दिनों की है जब वह चंडीगढ में एक दैनिक अखबार में काम करती थी। वहां कुछ दिनों के लिए वह फीचर पेज देख रही थीं। एक बार फीचर पेज की कवर स्टोरी कंडोम पर थी। पेज गया प्रूफ रीडर के पास। प्रूफ रीडर ने जहां जहां कंडोम लिखा था वहां वहां लाल कलम से लाइन खींच दी। फिर उसने मनीषा से पूछा कि बताइए ये क्या है। मनीषा ने खींच कर उसको एक थप्पड़ जोर से मारा। इस घटना को सुनाते हुए मनीषा कहती हैं कि दफ्तर में पुरुष आपको रोज हर एंगल से अहसास करवाते हैं कि आप औरत हैं। आपको देखने के स्टाइल से इम्ब्रेस कर देंगे। कई लोग तो एसे घूरेंगे कि लगेगा ये घूर नहीं रहे बल्कि आपकी छातियों का उभार नाप रहे हैं।

ज्यादातर महिला पत्रकारों से आप बात करें तो वे बताएंगी कि वे कहां मात खा गईं या खा रही हैं। वे देर शाम की पार्टी में नहीं जा सकती, खबर के बदले शराब-साकी नहीं कर सकती, टुच्ची हरकते नहीं कर सकतीं। ये सब करने लगे तो पुरुषों की दुकानदारी ही बंद हो जाए। हिंदी पत्रकार वैसे भी अगर किसी महिला पत्रकार को शराब या सिगरेट पीते देख लें तो ये मान लेंगे कि ये इजीली एवेलेबल है। अगर ना पिए तो बहिन जी टाइप मान कर उससे दूरी बना लेंगे और राय बना लेंगे कि ये टिकुली, सिंदूर और चूड़ी पर लिखने वाली पत्रकार हैं। ये कभी हार्ड स्टोरी नहीं कर पाएगी। ज्यादातर महिला पत्रकारों को दोयम दर्जे की नागरिकता प्राप्त है अपने दफ्तरो में। जबकि इन दिनों रात की पालियों में महिलाएं बिना किसी नाज नखरे के काम करने लगी हैं फिर भी उसे महत्वपूर्ण असाइनमेंट से वंचित रखने की मानसिकता दूर नहीं हुई है।

अंग्रेजी पत्रकारिता का माहौल एकदम अलग है। यहां वह दोजख नहीं है जो हिंदी पत्रकारिता में है। वहां नौकरियों के अवसर भी हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा भी। दप्तर का खुला माहौल भी है और संबंधों को देखने की आधुनिक दृष्टि भी। अगर अंग्रेजी और हिंदी पत्रिका या अखबार का दफ्तर साथ हो तो माहौल का अंतर साफ साफ दिखेगा.. आवाजाही करके देखिए तो पता चलेगा कि किसी जीवंत पब से निकल कर वीराने में आ गए हैं जहां भजन कीर्तन मंडली बैठी हुई है जिनमें कहीं पर निगाहे कहीं पर निशाना लगाने की प्रतियोगिता चल रही है।

दफ्तर में किसी महिला पत्रकार ने कोई गलती कर दी तो वह सावर्जनिक रुप से मजाक का मसला हो जाता है और कोई पुरुष गलती करें तो आपसी भाईचारा इतना कि मामला दबा दो, किसी तरह बास तक ना पहुंचे। एक घटना का जिक्र जरुरी है..। एक बार नई-नई आई महिला पत्रकार से एक पुरुष साथी ने पूछा कि हू इज क्वात्ररोची। लड़की ने कहा- क्वात्ररोची इज इटैलियन फूड वीद लौटस आफ स्पाइस। पूरा दफ्तर ठहाकों से गूंज उठा। आज भी उस लड़की को देख कर सबको क्वात्ररोची की याद आ जाती है। एक घटना ठीक इसके उल्टा। नया पुरुष साथी आया। उसको एक खबर की हेडिंग लगाने का काम दिया गया। बिजली संकट पर खबर थी। उसे कहां गया था कि कुछ क्रिएटिव हेडिंग लगाए। उसने लिखा-गरमी की कटौती से हाल बेहाल। इस हेडिंग पर रोएं या हंसे…क्या करें। लेकिन मजेदार बात ये हुई कि ये मामला वहीं दबा दिया गया, हल्के फुल्के ढंग से डांट लगा कर। उत्साह बढ़ाया गया कि तुम और अच्छा कर सकते थे। कोशिश करते रहो। आखिर ये दोस्ती चाय-पान वाली है जहां पूरे दफ्तर की गासिप की जाती है। जहां बास और लड़कियों की संगति को लेकर जुगाली की जाती है।

पुरुष सत्तात्मक मीडिया ना सिर्फ जेंडर वायस्ड है बल्कि भाषाई आधार पर भी समकालीन पत्रकारिता में महिलाओं का विभाजन देखिए। वे आती हैं हिंदी बेल्ट से। अंग्रेजी ज्ञान सीमित होता है। अगर अधिक होता तो वे कभी इस दकियानूसी संसार में आना पसंद ना करें। जिस संसार को प्रगतिशील महिला पत्रकार नहीं, पुत्रवधुएं (इरा झा के अनुसार) चाहिए। हिंदी बेल्ट से आने वाली कोई भी लड़की जब बुर्जुआ समाज की हदें पार कर जाती है तब जाकर पत्रकारिता को बतौर पेशा पूरे पैशन के साथ अपना पाती हैं। एसी महिलाओं के लिए कई बार कूपमंडूकों से भरा दफ्तर यातना शिविर में बदल जाता है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने ब्लाग कस्बा में एनडीटीवी की महिला पत्रकार सुनेत्रा और उनकी किताब के बारे में जो लिखा है मैं उसे यहां इस संदर्भ में उदधृत करती हूं। सुनेत्रा ने अपनी किताब ब्रेकिंग न्यूज में लिखा है, जब महिला संपादक होती है तो मर्द रिपोर्टरों पर क्या गुजरती है। सामंती और वर्गीय सोच कैसे दरकती है। बौल ब्रेकर्स… सुनेत्रा कहती हैं कि मर्द रिपोर्टर महिला संपादकों से जब खौफ खाते हैं तो इन लफ्जों में अपने भय को बयां करते हैं। मैं ये नहीं कहती कि सारी महिला पत्रकारों के साथ अन्याय हो रहा है। कुछेक एसी भी है जिन्हें पुरुष सत्ता ने ब्लैंक चेक दिया कि वे जैसे चाहे काम करें। उन्होंने किया भी लेकिन बाद में उनकी पारिवारिक मजबूरियां आड़े आ गईं। उनके साथ या पीछे चलता हुआ पुरुष साथी इस दौड़ में बहुत आगे निकल गया।

महिला पत्रकारों का करियर ब्रेक से भरा हुआ है। कई बार ब्रेक लेती हैं तो गैप इतना लंबा हो जाता है कि ब्रेक के बाद वैसा स्वागत नहीं होता जैसा वे डिर्जव करती है। जबकि सालों से बेरोजगार पुरुष पत्रकार हो सकता है धमाकेदार वापसी करे। महिलाओं का ब्रेक या बेरोजगारी उनकी समाप्ति की घोषणा मान ली जाती है। इसीलिए कई साथी आज अपनी महिला साथियों का बास बना हुआ है या ऊंचें पदों पर है। उसको वो सारी आजादी है कि घर से निश्चिंत होकर अपने लक्ष्य की तरफ बढे़। पीछे दिन-रात खटने वाली किसी महिला का ही हाथ होगा। उसको वे सारी कलाएं आती हैं जिसकी कमी तमाम महिला पत्रकारों में पाई जाती है। कई बार जूनियर पुरुष साथी भी उसके सिर पर बास बना कर लाद दिया जाता है। अब आपको काम करना है तो सहिए नहीं तो बाहर का रास्ता तो इस पेशे में हमेशा खुला है। जहां बात-बात पर बास आपको बाहर जाने का रास्ता वैसे दिखाता रहता है जैसे अंबेडकर की मूर्ति में ऊंगलियां सामने की तरफ हर वक्त कुछ दिखा रही होती हैं। इन दिनों महिलाओं को लगने लगा है कि वे जीवन में बिना पुरुष सहयोग के कुछ नहीं कर सकती। इसीलिए अपने अपने गाडफादर की तलाश में जुट जाती हैं। अब गाडफादर फादर तो रहता नहीं…गाड जरुर हो जाता है। अब गाड जैसे चाहे देवदासियों को नचवाए। कुछ नाच रही हैं। कुछ ठुमक रही हैं। कुछ की कापी आज भी उनका गाड लिखे जा रहा है। बिना सोचे कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती। एसी महिला पत्रकारों की जमात भी इन दिनों मलाई काट रही है। कुछ को होश आया तो वे संभल गईं। लेकिन दाग तो दामन से किसी डिटरजेंट से ना छूटे है। आपका समर्पण ही आपकी क्वालिटी मान ली जाती है। और देवता आप जैसों के लिए दरवाजे खोले बैठे हैं…आओ.. आओ.. हे महारानी.. हम पर राज करो। उनकी सैलरी उनका रुतबा सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता चला जा रहा है… वे जेनुइन महिला पत्रकारों के हकों को मार रही हैं। हो सकता है इसके पीछे उनकी सरवाइवल- समस्या हो या नूरजहां मार्ग से सत्ता सुख भोगने की अदम्य चाह।

और अंत में सबसे एक प्रार्थना…..

हिंदी की पहली महिला पत्रकार हेमंत कुमारी देवी ने इलाहाबाद से जब अपनी पत्रिका का पहला अंक निकाला था, तो संपादकीय में लिखा था– मेरी प्यारी बहनों. दरवाजा खोलकर देखो, कौन तुमसे मिलने आया है। ये तुम्हारी ही एक बहन है, नाम है सुगृहिणी। ये

गीताश्री

तुम्हारे पास आई है, क्योंकि तुम अभी भी दबी हुई हो, अबोध हो, बंधनों में जकड़ी हुई हो….। तब से आज तक क्या हेमंत कुमारी के इस बयान से बेहतर है हिंदी जगत में महिल पत्रकारों की दशा। इस मोड़ पर आकर क्या हमने और आपने कभी सोचा है कि अब सोचने की जरूरत आ गई है।

लेखिका गीताश्री वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों आउटलुक हिंदी मैग्जीन में बतौर फीचर एडिटर कार्यरत हैं.

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