यशवंतजी, आपको बधाई. भड़ास ने सबसे पहले इस खबर को उजागर किया था कि नईदुनिया का सौदा जागरण ग्रुप से होने वाला है. आपने पहली खबर भड़ास पर ''नई दुनिया और आलोक मेहता को लेकर दो बकवास'' शीर्षक से वह खबर प्रकाशित की थी. इसके लिए आपको बधाई और जानकारी देने के लिए धन्यवाद भी. कल रात मैंने ये खबर भेजी थी. फिर से संशोधित कॉपी भेज रहा हूं. इसे ही उपयोग करें. एक ख़ास बात ये है कि नईदुनिया के इंदौर संस्करण मे भड़ास4मीडिया वेबसाइट को ब्लाक कर दिया गया है. अपने पाठकों तक नई दुनिया में साइट ब्लाक किए जाने की खबर भी पहुंचा दें क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले किस तरह अपने घरों में आवाज दबाने की कोशिश करते हैं, यह सबको पता चल जाए. – एक पत्रकार
ये हैं नईदुनिया को डुबोने वाले
यह शायद हिंदी मीडिया कि सबसे बड़ी खबर है कि देश के एक बड़े मीडिया ग्रुप नईदुनिया को जागरण ग्रुप ने खरीद लिया, हिंदी मीडिया में ये सबसे बड़ा टेकओवर माना जा रहा है! लेकिन, आश्चर्य की बात ये है कि, ऐसा क्या हो गया था कि महज तीन साल में भट्टा बैठ गया. ख़ास बात ये कि ग्रुप की ये हालत किसी और ने नहीं, नईदुनिया के कर्ता धर्ता अभय छजलानी के बेटे विनय छजलानी ने ही की है. ५ साल पहले जब नईदुनिया की कमान विनय छजलानी ने संभाली थी, तब किसी को लगा नहीं था कि अनुभवहीन प्रबंधन क्षमता का इतना घातक नतीजा हो सकता है.
दरअसल नईदुनिया के डूबने की शुरुआत उसके देहली संस्करण के निकलने के साथ ही हो गयी थी. आलोक मेहता एंड पार्टी ने नईदुनिया को जिस तरह चूना लगाया, वो किसी से छुपा नहीं है. इस पार्टी ने नईदुनिया को अपने मौज मस्ती के लिए इस्तेमाल किया. ३ साल में पार्टी के कई लोगों ने विदेश यात्रा की. इस बीच किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि पत्रिका समूह ने यहाँ अपने पैर जमा लिए और नईदुनिया तीसरे नंबर पर आ गया. रायपुर, ग्वालियर और जबलपुर संस्करण की तरफ किसी का कंट्रोल नहीं रहा, यही कारण है कि वहां के संपादकों ने अपना साम्राज्य जमा लिया. रायपुर के संपादक ने संपत्ति बना ली तो ग्वालियर के संपादक ने राजनीतिक पकड़ बना ली.
इंदौर जैसे संस्करण की कमान जयदीप कार्निक जैसे नोसिखए को थमा दी गयी, जो नईदुनिया को डुबोने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मदार माने जा रहे हैं. नईदुनिया का इंदौर संस्करण ही मुख्य संस्करण है, जो सभी ७ संस्करणों को भेजा जाता है. जयदीप कार्निक ने अपनी मर्जी का अखबार निकाला, किसी के सलाह के बिना. नईदुनिया का इंदौर संस्करण पूरी तरह स्मृति पत्र बन गया था, जिसमें जगजीत सिंह, देवानंद, मारिओ मिरांडो के मृत्यु पर ५ दिन तक शोक मनाया गया. इंदौर संस्करण मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के सभी संस्करणों को पेज भेजता है इसलिए वहां भी यही सब छपता रहा. यही कारण रहा कि सारे संस्करण एक साथ गिरते चले गए. नईदुनिया का यह मुख्य संस्करण कुछ हाथों मे सिमटकर रह गया था.
जयदीप ने अपने जैसे ही कुछ लोगों की टीम बना रखी थी जो वेबदुनिया में उसके साथ थे. इसके अलावा एक टेलीफोन आपरेटर, एक प्रूफ रीडर को अपना सलाहकार बनाकर नईदुनिया के सम्पादकीय में रख लिया था. ये ही उसके लोग थे, जिनके पास काम था जयदीप के लिए जासूसी करना. इसके अलावा नईदुनिया को पूरी तरह मराठी समाज का अखबार बना दिया गया था, जो नईदुनिया के बर्बादी के बड़े कारणों मे से एक है. अखब़ार के मेट्रो सप्लीमेंट को तो पूरी तरह मराठी समाज का अखबार बना दिया गया था. नईदुनिया में मराठी लोगों का एक अलग गुट बन गया था जो सिर्फ जयदीप के प्रति लॉयल थे. इंदौर शहर में इस बात को लेकर काफी विरोध भी था, लेकिन विनय छजलानी ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया.
नईदुनिया को अभय छजलानी ने ६० साल तक चलाया, लेकिन उनके बेटे ने कमान अपने हाथ में आते ही पहला काम ये किया कि अपने पिता को किनारे कर दिया, यहाँ तक कि इंदौर मे अभय छजलानी से स्टाफ का बात करना भी अपराध माना जाता था. विनय छजलानी के गुर्गे इस बात का ध्यान रखते थे कि अभय छजलानी की मर्जी की कोई न्यूज़ ना छप जाये. जयदीप से पहले दो संपादको ओमप्रकाश और राजेश पांडे को सिर्फ इसलिए चलता कर दिया गया था कि वो अभय छजलानी से सलाह लेते थे. फिर जयदीप को वेबदुनिया से ख़ासतौर पर अपना आदमी बना कर लाया गया, जिसने ६५ साल के इस ग्रुप पर ताले लगवा दिए. अभी ये कहानी पूरी नहीं हुए है, नईदुनिया की बर्बादी के कुछ और किस्से अगली बार…
(उपरोक्त विचार इंदौर के एक पत्रकार के हैं. उन्होंने अपना नाम प्रकाशित न करने का अनुरोध किया है. कई तथ्यों से असहमति के बावजूद पत्र को इसलिए प्रकाशित किया गया है ताकि बहस की शुरुआत हो. अगर आप भी छजलानीज द्वारा नईदुनिया के न चला पाने की कोई खास वजह जानते हैं तो भड़ास तक [email protected] के जरिए पहुंचाएं. आप चाहेंगे तो आपका नाम गोपनीय रखा जाएगा. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)
संबंधित खबरें…





