नईदुनिया के बारे में एक खबर तो ये है की डील हो चुकी है… 175 करोड़ में डील होने की खबर है… आलोक मेहता के अलावा चीफ सेल्स एंड मार्केटिंग ऑफिसर अर्पण चटर्जी और वाइस प्रेसिडेंट, सेल्स देबू मिश्रा से इस्तीफ़ा लिए जाने की सूचना भी डील के करीबी दे रहे हैं… अब बात नईदुनिया को बाप के चलाने और बेटे के डुबोने की… मैंने नईदुनिया के साथ जबलपुर में कुछ वक़्त बिताया है और इसलिए कह सकता हूं कि विनय छजलानी जी जैसा बॉस मिलना मुश्किल है लेकिन गलती ये हो गई कि हिंदी अख़बार जैसी अनप्रोफेशनल इन्डस्ट्री को आईटी इन्डस्ट्री की तरह चलाने की कोशिश की.. लोगों पर खुल कर भरोसा किया और उन्हीं लोगों ने उन्हें डुबो दिया…
बात सिर्फ भरोसे की नहीं थी, आज के ज़माने में सरवाईव करने के लिए ज़रूरी प्रोफेशनलिज्म और वर्क कल्चर दूर-दूर तक नहीं था… प्रोडक्ट बिलकुल थक चुका था.. सेहत की तरह कुछ अच्छे सप्लीमेंट थे भी तो उन्हें कभी ब्रांड ही नहीं बनाया गया… एडीटोरियल, मार्केटिंग, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन और सर्कुलेशन में कोई तालमेल ही नहीं था… जबलपुर में तो सर्कुलेशन स्कीम में जो बेड शीट बांटी गई थी वो रुमाल बन गई… ब्रांड को ज़बरदस्त नुकसान हुआ… इसके बाद एकदम ख़राब स्थिति से जबलपुर संस्करण को संभाल कर 14 लाख रुपये महीने की बिलिंग को 35 लाख तक ले जाने वाले मनीष मिश्रा जैसे व्यक्ति को भी नईदुनिया ने कभी संभालने की कोशिश नहीं की… मनीष मिश्रा, आनंद पाण्डेय, आलोक वाणी जैसे सभी प्रोफेशनल लोग चले गए और एचआर सोता रहा…
मुझे एक घटना याद है जब मनीष मिश्रा ने ज्वाइन करने के बाद इन्दौर की एक मीटिंग में कहा कि पीपुल्स समाचार लांच हो चुका है और पत्रिका लांच होने वाला है तो आप मुझे स्कीम दे दो लेकिन वो स्कीम मिली पत्रिका के लांच होने के चार महीने बाद… अब चार महीने में तो पत्रिका ने सूपड़ा साफ़ कर लिया… इतना ही नहीं, अपने एडिटोरियल को सबसे महान बताने वाले नईदुनिया के लोगों ने बिना किसी पूर्व सूचना के जबलपुर में सिटी संस्करण का नाम बदलकर एमपी-20 कर दिया और इसके लिए एक प्वाइंटर छापने की ज़हमत भी नहीं उठाई… जब पूरी दुनिया में मीडिया कन्ज़म्शन का पैटर्न बदल रहा है… बड़ी-बड़ी कम्पनियां लोगों के फीड बेक पर अपने प्रोडक्ट में बदलाव ला रही है और बिना लोगों की भागीदारी के या पाठकों को बताये बिना नाम बदल दिया गया…

विनय छजलानी
कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन के लोग अंग्रेजी में आईआरएस का प्रेसेंटेशन बनाकर भेजते थे.. अब इतना क्लिष्ट और टेक्नीकल प्रेसेंटेशन किस क्लाईंट और एजेंसी के समझ में आता है.. इतना ही नहीं, ये प्रेसेंटेशन किसे दिखाया गया, इसकी रिपोर्ट सीधे विनीत सेठिया जी को होती थी… दरअसल इन्दौर को छोड़कर बाकी यूनिट से सौतेले बेटे जैसा ही बिहैव किया गया… कुल मिलाकर घटिया प्रोडक्ट, ख़राब मार्केटिंग, अनप्रोफेशनल रवैया और थके हुए लोगों ने एक बेहतरीन ब्रांड की हत्या कर दी…
नई दुनिया में काम कर चुके एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. उन्होंने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. अगर आप भी नई दुनिया के इस अंजाम पर रोना चाहें तो स्वागत है. आप कहेंगे तो हम कतई नहीं बताएंगे कि ये किसके आंसू हैं. आप [email protected] को कंधा बनाएं.
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