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विनय छजलानी ने जो पैसा अंबानी से लिया वह गया कहां?

: नईदुनिया की शोक कथा में कई किरदार : प्रिय यशवंतजी, नईदुनिया के बिकने की आशंका वाली खबर पहले दिन जब आपने ब्रेक की थी तो सच जानते हुए भी मन मानने को तैयार नहीं था. बार-बार मन में यही सवाल उठ रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है? दरअसल नईदुनिया में कभी काम कर चुके, मौजूदा दौर में काम कर रहे पत्रकार और उसके पाठक सदमे में हैं क्योंकि नईदुनिया केवल एक अखबार नहीं रहा है बल्कि यह एक संस्कार की तरह पुष्पित और पल्लवित हुआ. हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में नईदुनिया ने वह मुकाम हासिल किया जो देश के नंबर-1 अखबार दैनिक जागरण और नंबर-2 अखबार दैनिक भास्कर कभी सपने में भी नहीं सोच सकते. इस अखबार ने देश को सर्वाधिक संपादक और योग्य पत्रकार दिए हैं.

: नईदुनिया की शोक कथा में कई किरदार : प्रिय यशवंतजी, नईदुनिया के बिकने की आशंका वाली खबर पहले दिन जब आपने ब्रेक की थी तो सच जानते हुए भी मन मानने को तैयार नहीं था. बार-बार मन में यही सवाल उठ रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है? दरअसल नईदुनिया में कभी काम कर चुके, मौजूदा दौर में काम कर रहे पत्रकार और उसके पाठक सदमे में हैं क्योंकि नईदुनिया केवल एक अखबार नहीं रहा है बल्कि यह एक संस्कार की तरह पुष्पित और पल्लवित हुआ. हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में नईदुनिया ने वह मुकाम हासिल किया जो देश के नंबर-1 अखबार दैनिक जागरण और नंबर-2 अखबार दैनिक भास्कर कभी सपने में भी नहीं सोच सकते. इस अखबार ने देश को सर्वाधिक संपादक और योग्य पत्रकार दिए हैं.

नईदुनिया का बिक जाना एक स्वर्णिम इतिहास के धूलधुसरित हो जाने की शोक कथा है. बिक जाने के कागजात पर अभी हस्ताक्षर नहीं हुए हैं लेकिन सौदा हो चुका है. आज नहीं तो कल हस्ताक्षर भी हो जाएंगे. लेकिन नईदुनिया के पाठकों, उसके प्रशंसकों के मन में यह सवाल तो कौंधता ही रहेगा कि ऐसा कैसे हो गया? सबसे बड़ा सवाल इस वक्त लोगों के जेहन में यह है कि क्या इसके मौजूदा कर्ताधर्ता विनय छजलानी इतने कंगाल हो गए कि नईदुनिया को बचा नहीं पाए?

विनय छजलानी कभी इस सवाल का जवाब नहीं देंगे क्योंकि उस आदमी का भावनात्मक लगाव कभी नईदुनिया के साथ रहा ही नहीं. नईदुनिया भले ही कंगाल हो गया, कर्ज में डूब गया लेकिन हकीकत यही है कि विनय छजलानी नाम का उसका अंतिम मालिक मालामाल हो गया. विनय के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी एक जेब झाड़ दे तो अंबानी के 250 करोड़ का कर्जा एक झटके में चुकाया जा सकता है लेकिन विनय छजलानी ने जो कर्जा लिया था, उसके पीछे चुकाने की नीयत थी ही कहां?

मैं जितने करीब से अभय छजलानी को जानता हूं, उतने ही करीब से विनय छजलानी को भी जानता रहा हूं. इसलिए मैंने यह जरूरी समझा कि नईदुनिया के धूलधुसरित हो जाने के पीछे का सच लोगों को बताया जाए. लोगों को पता लगे कि चापलूसों की फौज किसी भी सलतनत का सर्वनाश कर सकती है. पहले थोड़ा इतिहास जान लीजिए…

इंदौर में नईदुनिया की शुरुआत बाबूलाभचंद छजलानी, बसंतीलाल सेठिया और नरेंद्र तिवारी ने आजादी के ठीक पहले की थी. ये तीनों ही इस दुनिया में अब नहीं हैं. बाबूलाभचंद छजलानी के तीन पुत्रों में सबसे बड़े हैं अभय छजलानी और उन्होंने जवानी आने से पहले ही नईदुनिया का कामकाज संभाल लिया. दूसरे भाई विमल छजलानी क्या करते हैं यह केवल उन्हें ही पता है. जाहिर तौर पर नईदुनिया से कोई नाता रिस्ता कभी उनका रहा नहीं. दिवाली के मौके पर या चुनाव के वक्त कभी कभार वे अखबार के दफ्तर में दिखाई दे जाते थे. तीसरे भाई श्रीचंद छजलानी विदेश में ही रहे और वहीं उनका निधन भी हुआ. इधर बसंतीलाल सेठिया की ओर से उनके वरिष्ठ पुत्र महेंद्र सेठिया ने अभय छजलानी के सहायक की तरह दायित्व निभाया. दूसरे पुत्र प्रेम सेठिया अपनी छोटी-मोटी फैक्टरी चलाते रहे. तीसरे पार्टनर नरेंद्र तिवारी के बड़े बेटे राजेंद्र तिवारी अखबार में आए. छोटे बेटे सुरेंद्र तिवारी ने डॉक्टरी की पढ़ाई की और अखबार से कोई रिस्ता रखा नहीं.

लाभचंद छजलानी बहुत कुशाग्र बुद्धि के थे इसलिए उन्होंने अच्छे पत्रकारों का बहुत सम्मान किया और राहुल बारपुते जैसे विद्वान के हाथ में नईदुनिया की कमान सौंप दी. राजेंद्र माथुर को हिंदी पत्रकारिता में लाने का श्रेय राहुल बारपुते को जाता है. उन्हीं दिनों अभय छजलानी नए मालिक और बेहतरीन पत्रकार के रूप में उभर रहे थे. अभयजी और राजेंद्र माथुर के बीच बहुत ज्यादा पटरी नहीं बैठी तो राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स चले गए. अभयजी ने अपनी पूरी योग्यता का इस्तेमाल किया और नईदुनिया की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाया.

अभय छजलानी के एक मात्र पुत्र हैं विनय छजलानी. कॉलेज की पढ़ाई के बाद विशेष योग्याता हासिल करने के लिए वे अमेरिका चले गए थे. उनके लौटते ही 1987 में नईदुनिया का भोपाल संस्करण शुरु हुआ. विनय को उस संस्करण की कमान दी गई लेकिन उनका मन अखबार में लगा नहीं तो परिवार के ही एक और व्यक्ति अजय छजलानी को भोपाल भेजा गया. इस बीच राजेंद्र तिवारी से छजलानी और सेठिया परिवार की खटपट शुरु हो गई. 1991 में बंटबारा हुआ और नईदुनिया का भोपाल संस्करण राजेंद्र तथा सुरेंद्र तिवारी को मिल गया. भोपाल में नईदुनिया का नाम हो गया ‘दैनिक नईदुनिया’. छजलानी और सेठिया परिवार इंदौर से नईदुनिया का प्रकाशन करता रहा. बंटबारे के कुछ ही दिनों बाद राज्य की नईदुनिया नाम से भोपाल में एक अखबार छजलानी और सेठिया परिवार ने शुरु किया. इस झगड़े में न ‘राज्य की नईदुनिया’ चली और न ही ‘दैनिक नईदुनिया’.

इधर विनय छजलानी का मन अखबार से उचाट हो चुका था. वे सॉफ्टवेयर के धंधे में उतर चुके थे और ‘सूवी’ नाम से एक कंपनी शुरू कर ली थी. अमेरिका आना जाना लगा रहता था. वर्ष 2000 के आसपास उन्होंने हिंदी का पहला वेब पोर्टल ‘वेबदुनिया’ शुरु किया. यह पोर्टल चल निकला. अभय छजलानी उम्मीद कर रहे थे कि बेटा विनय नईदुनिया के विस्तार की ओर ध्यान देगा लेकिन विनय ने पलट कर देखा तक नहीं. यहां तक कि वे नईदुनिया के दफ्तर तक नहीं आते थे. कुछ दिनों के लिए वेबदुनिया का दफ्तर नईदुनिया परिसर में आया जरूर लेकिन जल्दी ही चला भी गया. किसी को पता नहीं चला कि ऐसा क्यों हुआ. लोगों ने कहा कि बाप-बेटे में खछटपट चल रही है. खटपट की कहानी बिल्कुल पारिवारिक है और उसे सार्वजनिक किया जाना उचित नहीं है.

अब लोग यह मानकर चल रहे थे कि विनय छजलानी नईदुनिया नहीं संभालेंगे लेकिन अचानक 2004 में विनय छजलानी ने नईदुनिया में रुचि लेनी शुरु कर दी. वेबदुनिया का उनका मुलाजिम मनीष शर्मा नईदुनिया आ पहुंचा. अभय छजलानी के पीए जयदीप कर्णिक ने भितरघात किया और विनय छजलानी से जा मिला. 2007 की शुरुआत होते-होते नईदुनिया पर भौतिक रूप से विनय छजलानी का कब्जा हो चुका था.

यही वो वक्त था जब कैलाश खेर की बुलंद आवाज में नईदुनिया ने एक फोन ट्यून तैयार करवाया…

न कोई शक न कोई डर
जीतेंगे हम बाजी हर,
पहुंचेंगे शिखर तक
नईदुनिया में नईदुनिया से….

तब पहली बार लगा था कि नईदुनिया बाजारू समर में पूरी ताकत के साथ कूदा है. प्रधान संपादक की कुर्सी पर आलोक मेहता दिल्ली में सवार हो चुके थे. वे अपने साथ बड़े-बड़े उन लेखकों को ले आए थे जिन्हें कहीं और ठिकाना नहीं मिल रहा था. लाखों में तनख्वाह थी. इधर दे दनादन नईदुनिया के संस्करण खुलने शुरु हुए और कुछ ही दिनों बाद नईदुनिया में बड़ा सा एक विज्ञापन छपा था-11 राज्य 14 संस्करण। सभी आश्चर्यचकित थे कि जो नईदुनिया साठ सालों तक इंदौर-भोपाल की कोख में सिमटी रही, वह अचानक राष्ट्रीय फलक पर कुलांचे भरने के लिए इतनी बेताब क्यों है? लोग विनय छजलानी का गुणगान कर रहे थे और यह मानकर चल रहे थे कि विनय ने अपनी टेंट का पैसा लगाया है नईदुनिया में. लोग कह रहे थे-‘विनय, नईदुनिया का नया इतिहास लिख रहे हैं. साम्राज्य विस्तार का जो सपना पिता अभय छजलानी ने नहीं देखा उसे बेटा विनय न केवल देख रहा है बल्कि पूरा भी कर रहा है.

विनय छजलानी पूरे ऊफान पर थे और बड़ी चालाकी से नईदुनिया की नई पटकथा लिख रहे थे. ऐसी पटकथा जो बहुत खौफनाक साबित होने वाली थी. वे नईदुनिया के सीईओ बन चुके थे. बुजूर्ग पिता अभय छजलानी को हाशिए पर डाल चुके थे. परिवार के ही एक और शातिर सज्जन अजय छजलानी को बाहर का रास्ता दिखा चुके थे. दूसरे पार्टनर महेंद्र सेठिया की कुर्सी को ठिकाने लगा चुके थे. महेंद्र सेठिया के बेटे विनय सेठिया पिछलग्गू की भूमिका में थे. अखबार का विस्तार जारी था. इसी के साथ विस्तार मिल रहा था अभय छजलानी और विनय छजलानी के बीच के निजी रिस्तों की खटास को भी. विनय ने हालात ऐसे पैदा कर दिए कि अभय छजलानी और महेंद्र सेठिया से एकांत में गुफ्तगू करने में भी नईदुनिया के कर्मचारी डरने लगे. जिसने भी अभयजी से बात की, वह विनय की नजर में अवज्ञाकारी हो गया. महेंद्र सेठिया की स्थिति उस बिलखते बच्चे की तरह थी जिसे चुप कराने भी कोई नहीं आ रहा था.

विनय के आसपास चापलूसों की बड़ी फौज इकट्ठी हो चुकी थी लेकिन चापलूसों में सरताज की संज्ञा तो केवल मनीष शर्मा नाम के व्यक्ति को ही दी जा सकती है. मनीष फिलहाल नईदुनिया मीडिया लिमिटेड के उपाध्यक्ष हैं. पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने के बाद मनीष ने कुछ छुटपुट अखबारों में काम किया और फिर विनय छजलानी के पोर्टल वेबदुनिया में आ गए. उन्होंने नईदुनिया में गुरुमंत्र  नाम से एक कॉलम भी चालू किया. फिर कुछ शिकायतें आर्इं कि गुरुमंत्र में लिखी जा रही कहानियां तो दरअसल ओशो की किताबों से उड़ाई जा रही हैं. खैर, चापलूसी में महारथी मनीष खुद को विनय छजलानी का उत्तराधिकारी समझने लगे. कई बार संपादकीय बैठकों में उन्होंने कहा कि वे विनय छजलानी की प्रतिमूर्ति हैं. बैठकों में यहां तक कहा कि अभय छजलानी को एक खबर के लिए भी मुझसे पूछना पड़ता है. दरअसल विनय छजलानी हर उस व्यक्ति का आदर कर रहे थे जो उनके पिता का अनादर करे.

मनीष ने हर उस व्यक्ति को निपटाया जिसमें थोड़ी सी भी बेहतर संभावनाएं मौजूद थीं. मनीष की नजर नईदुनिया के संपादक पद पर थी लेकिन जयदीप कर्णिक नाम का व्यक्ति उनसे बीस साबित हुआ. विनय छजलानी ने उन्हें स्थानीय संपादक बना दिया. इसके पहले संपादक पद पर ओमप्रकाश लाए गए थे लेकिन वे अभयजी को बाबूजी कहने लगे थे इसलिए उनकी कुर्सी शहीद हो गई थी.

जयदीप की कहानी भी लगे हाथ जान लीजिए. वे अच्छे वक्ता हैं. इस विधा में शायद विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं. उनके पिता इंदौर के प्रतिष्ठित पहलवान रहे हैं और उनका बड़ा सम्मान है इंदौर में. जयदीप इंदौर के एक उद्योगपति के यहां सहायक हुआ करते थे. उद्योगपति से अभयजी का दोस्ताना था. अभयजी को जयदीप अच्छे लगे इसलिए उन्हें उद्योगपति से मांग कर ले आए. उन्हें क्या पता था कि यह व्यक्ति दगाबाज निकलेगा.

बहरहाल जयदीप की पत्रकारिता का कैरियर केवल इतना सा है कि फीचर पेज पर निर्मला भुराड़िया के सहायक की भूमिका में वे रहे. लेकिन उनमें विनय छजलानी को साध लेने की अद्भुत क्षमता थी इसलिए संपादक की कुर्सी पर विराजमान होने में कोई परेशानी नहीं हुई. जयदीप के बड़े-बड़े पोस्टर इंदौर शहर में जगमगाने लगे जिसमें वे पाठकों से कह रहे थे कि खबर केवल वही है जो उन्हें पसंद है. लेकिन ये पाठक भी बड़ी अजीब होते हैं. भुलावे में कहां आते हैं? नईदुनिया का स्तर तेजी से गिरने लगा, सिटी की खबरें निम्नस्तरीय होने लगी क्योंकि कई अच्छे लोग छोड़कर जा चुके थे. सिटी चीफ दिलीप ठाकुर की अक्षमता और कारगुजारियों के किस्से हर किसी को पता थे लेकिन विनय छजलानी ने उसे बनाए रखा क्योंकि उसे मनीष शर्मा और जयदीप कर्णिक का वरदहस्त प्राप्त रहा. दूसरे संस्करणों में भी अयोग्य लोगों की भरमार हो गई क्योंकि चापलूसी बड़ी योग्यता मानी जाने लगी. नतीजा यह हुआ कि सर्कुलेशन धराशायी होने लगा. लेकिन नईदुनिया का विस्तार जारी था. देश के विभिन्न राज्यों से संडे नईदुनिया निकल रहा था.

आलोक मेहता के साथ ही अभय छजलानी को पद्मश्री मिल गया था. लोग कह रहे थे कि दो-एक साल में विनयजी को भी मिल जाएगा. लेकिन अचानक विनय छजलानी की नईदुनिया का साम्राज्य वैसा ही दिखने लगा जैसा गोर्बाचेव की परेस्त्रोइका के बाद सोवियत संघ दिखने लगा था. नीरा राडिया के साथ विनय छजलानी का नाम आया, कहा जाने लगा कि अंबानी के कर्ज तले दब गई है नईदुनिया. कई साल पहले यह खबर भी आई थी कि जहां आज बाबूलाभचंद छजलानी मार्ग पर नईदुनिया का दफ्तर है वहां रिलायंस फ्रेश खुलेगा. कहा जाने लगा कि मुकेश अंबानी नईदुनिया को टेकओवर कर लेंगे लेकिन जानने वाले जानते हैं कि विनय छजलानी इतने कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. वे जानते हैं कि नईदुनिया गोबर भी हो जाए तो कुछ मिट्टी साथ लेकर ही उठेगी. इसीलिए नईदुनिया अंबानी को सौंपने के बजाय इसे बेचना उन्होंने ज्यादा श्रेष्यकर समझा है.

अब सवाल यह उठता है कि विनय छजलानी ने जो पैसा अंबानी से लिया (ब्याज सहित यह आंकड़ा करीब 250 करोड़ है), वह गया कहां? क्या केवल नईदुनिया में खर्च हो गया? नहीं, ऐसा हुआ नहीं. जानकारों की मानें तो मुकेश अंबानी ने विनय छजलानी को 16 संस्करणों के लिए पैसे दिए लेकिन विनय ने इतने संस्करण खोले नहीं. विनय छजलानी के टेकओवर से पहले इंदौर संस्करण के अलावा ग्वालियर संस्करण था. भोपाल से नवदुनिया और जबलपुर, रायपुर तथा दिल्ली से नईदुनिया का प्रकाशन विनय ने शुरु किया. संडे नईदुनिया के हवाहवाई संस्करणों को गिनाकर अंबानी की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की गई. धूल झोंकने का यह तरीका भी आलोक मेहता, मनीष शर्मा और जयदीप कर्णिक जैसे लोगें के दिमाग की उपज थी. विनय को बड़े सपने दिखाए गए कि अखबार चल निकलेगा और पैसों का बगीचा बन जाएगा. इसी सपने का शिकार होकर उन्होंने सेठिया परिवार के साथ ही अपने पिता को भी कुछ पैसा देकर नईदुनिया से अलग कर दिया. लेकिन जब सपना टूटने लगा तो विनय ने चालाकी दिखाई और अंबानी से मिले पैसों को जमीन खरीदने में लगाना शुरु किया. आज इंदौर जैसे शहर में जमीनों का बड़ा कारोबार है उनका. मध्यप्रदेश के कई दूसरे शहरों में भी वे जमीन से जुड़े हुए हैं. उनकी सलतनत अरबों-खरबों में है. वेबदुनिया, सूवी और दूसरी कंपनियों के कारोबार से पैसा खूब फलफूल रहा है, केवल नईदुनिया के लिए उनके पास पैसा नहीं है.

जब अंबानी को समझ आया कि मामला गड़बड़ है तो रकम चुकाने का दबाव आया. विनय ने हाथ खड़े कर दिए और नईदुनिया को बेचने के लिए बाजार में निकल पड़े. उन्हें इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि जिस संस्थान को वे बेच रहे हैं, वह केवल एक अखबार नहीं बल्कि पत्रकारिता का प्रशिक्षण संस्थान कहलाता रहा है. उन्हें इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि लाखों पाठकों की भावनाएं आज भी नईदुनिया से जुड़ी हुई हैं. विनय छजलानी को पैसा चाहिए….प्रतिष्ठा के लिए उनके पास कोई जगह नहीं है.
अभयजी को देखता हूं तो मुझे उस राजा की कहानी याद आती है जिसका मुकुट उसके बेटे ने छीन लिया और अपने पैरों तले कुचल दिया. राजा के हिस्से में मुकुट का एक नग भी नहीं आया क्योंकि बेटे ने धूलधुसरित मुकुट को भी बेच दिया.

छजलानी परिवार के एक और चश्मों चिराग अजय छजलानी के बगैर कहानी अधूरी रहेगी. विनय छजलानी ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखाया अन्यथा ये तो खुद ही नईदुनिया पर कब्जे का सपना पाले हुए थे. कांख में दबा एक बैग, मुंह से बाहर निकलने को आतुर पान की पीक के साथ उनकी मुस्कुराहट और आंखों का कातिलाना अंदाज उन लोगों को आज भी याद है जिनका उन्होंने शिकार किया. वे प्रबंधन का काम देखते थे और किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति को वहां टिकने देने से उन्हें भारी परहेज था. वे खुद को प्रबंधन का स्वंयभू एरिया कमांडर मानते थे. मुझे याद आ रहा है ग्वालियर संस्करण के शुभारंभ का वक्त. अजय छजलानी वहां प्रबंधन के कर्ताधर्ता थे. उन्होंने अपनी फौज से पूछा कि दूसरे अखबारों की कीमत क्या है यहां? लोगों ने बताया- दो रुपए. अजय ने कहा-हमारे अखबार की कीमत होगी तीन रुपए! हम एक ब्रांड लेकर आए हंै ग्वालियर! कर्मचारी सन्न रह गए! कोई भी अखबार अपना सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए शुरुआती कीमत कम रखता है लेकिन अजय ने कीमत रखी तीन रुपए क्योंकि वे ग्वालियर संस्करण को डुबोना चाहते थे. नीयत यह थी कि इस असफल संस्करण को महेंद्र सेठिया को बाद में सौंप देंगे और इंदौर संस्करण पर खुद कब्जा कर लेंगे. उन दिनों विनय छजलानी अखबार से दूर थे इसलिए अजय को पूरी उम्मीद थी कि सलतनत की बागडोर   अभयजी के बाद उन्हीं के हाथ में आएगी. लेकिन वक्त ने अजय के साथ भी दगा किया. अब वे एक स्कूल चलाते हैं. और भी कई पात्र हैं जिन्होंंने नईदुनिया के गले में पत्थर बांधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. कथा बहुत लंबी है.

नईदुनिया की यह शोक कथा दरअसल हिंदी पत्रकारिता की भी शोक कथा के रूप में पढ़ी और सुनाई जाएगी क्योंकि नईदुनिया के अलावा हिंदी का और कोई दूसरा अखबार नहीं है जिसे ‘स्कूल आॅफ जर्नलिज्म’ कहा गया हो. हिंदी का और कोई ऐसा अखबार नहीं  जिसने देश को उतने सफल पत्रकार और संपादक दिए हों जितना नईदुनिया ने दिया है. हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुष राहुल बारपुते और राजेंद्र माथुर इसी अखबार की उपज थे. यही वह अखबार है जिसमें कभी एक गलती भी छप जाती थी तो हंगामा मच जाता था. यह वही अखबार है जिसमें किसी संगठन का एक आह्वान ‘आज इंदौर बंद रहेगा’ शीर्षक से छप गया था और इंदौर उस दिन बंद हो गया था. नईदुनिया उस अखबार का नाम है जिसके नाम से पत्रकारिता की दुनिया में इंदौर का नाम जाना जाता रहा है. इसकी दहलीज से निकलने वाले पत्रकार अब भी फख्र से कहते रहे हैं कि वे ‘ओल्ड एनडीज’ हैं.

चलते-चलते….

भड़ास4मीडिया पर किसी ने लिखा है कि विनय छजलानी जैसा बॉस मिलना मुश्किल है. वाकई मिलना मुश्किल है. ऐसा बॉस आपको कहां मिलेगा जो चापलूसों की फौज के बलबूते एक प्रतिष्ठित संस्थान को नेस्तनाबूद कर दे? ऐसा बॉस कहां मिलेगा जो अपने जीएम और स्थानीय संपादक के मेल का जवाब तक नहीं दे! ऐसा बॉस कहां मिलेगा जो महीनों तक दफ्तर में झांकने तक नहीं आए और उसका चापलूस उपाध्यक्ष अपनी मनमर्जी चलाता रहे. ऐसा बॉस कहां मिलेगा जो नईदुनिया को बेचने की डील भी कर रहा हो और उसी दौरान अपने आभूषण व्यापार की प्रदर्शनी लगाकर लोगों से कहता फिरे कि ये ‘हार’ खरीद लो, बहुत ही नायाब है. नईदुनिया को डुबाने का कलंक इतिहास के पन्नों पर विनय छजलानी के नाम दर्ज हो चुका है.

यह कहानी नईदुनिया में काम कर चुके एक वरिष्ठ मीडियाकर्मी ने भड़ास4मीडिया के पास भेजी है. उन्होंने नाम न छापने का अनुरोध किया है इसलिए उनके अनुरोध का पूरा सम्मान किया जा रहा है. इन रिपोर्ट्स के प्रकाशन का मकसद नईदुनिया के अंदरखाने हुई उन गतिविधियों की पड़ताल करना है जिसके कारण एक अच्छा-खासा अखबार बिकने को मजबूर हो गया. अगर किन्हीं सज्ज्न को इन रिपोर्ट्स पर आपत्ति हो, किसी तथ्य पर दिक्कत हो तो वे अपनी बात नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए कह सकते हैं या फिर [email protected] के माध्यम से भड़ास4मीडिया तक पहुंचा सकते हैं.  अगर आपके पास भी इस ग्रुप से जुड़ी कोई जानकारी, खबर या संस्मरण है तो [email protected] पर मेल कर दें. अगर आप चाहेंगे तो आपकी गोपनीयता की हम हर हाल में रक्षा करेंगे. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


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