चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता के परिपालन में पूरी दम लगाने का दावा किया है लेकिन यह दम सिर्फ भ्रष्टाचार को ऊपरी तौर पर टटोलने का प्रयास ही प्रतीत होती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आचार संहिता के परिपालन ने इस बार के चुनाव में अलग तरह का माहौल बना दिया है, जिससे आम आदमी को काफी राहत मिली है लेकिन अंदरखाने के असली भ्रष्ट आचरण में गिरावट पर इसका असर नगण्य ही दिखाई पडता है।
इस विचार की पुष्टि के लिये मीडिया से जुडा एक उदाहरण पेश है। आगरा से प्रकाशित प्रमुख अखबारों ने विज्ञापनों के बदले करोडों के वारे-न्यारे करने के लिये अपने लोग मैदान में उतार दिये हैं। एक विधान सभा क्षेत्र से बीस लाख की उगाही का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रकार एक जिले से करीब एक करोड़ का लक्ष्य है। विज्ञापन के नाम पर छोटे-बडे लोगों को अघोषित रूप से ब्लैकमेल किया जाना आम बात हो चुकी है, लेकिन मीडिया में हावी होते जा रहे बाजारवाद और भ्रष्टाचार का निकृष्टतम सबूत इससे बड़ा क्या हो सकता है कि इस विधान सभा चुनाव में ब्लैकमेलिंग की परिपाटी से आगे बढ़ कर कीमतों में भी भारी ब्लैकमेलिंग की जा रही है। यह बेशर्म कालाबाजारी दोतरफा धोखा देने का काम कर रही है। एक तरफ विज्ञापनदाता से व्यावसायिक दरों से भी अधिक कीमतें वसूली जा रही हैं तो दूसरी तरफ डीएवीपी दरों का बिल बना कर चुनाव आयोग की आंखों में धूल झोंकने का काम किया जा रहा है।
आगरा जिला का कोई प्रत्याशी अमर उजाला अखबार में अपना प्रचार छपवाना चाहेगा तो उसे कम से कम साढे पांच लाख का पैकेज मिलेगा। 20 लाख रुपये की अधिकतम सीमा शायद इसलिये रखी गयी है कि अगर प्रत्याशी इससे भी अधिक विज्ञापन देगा तो डीएवीपी रेट के हिसाब से भी प्रत्याशी के निर्धारित खर्चे का ग्राफ बिगड़ जायेगा। इसी तरह हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण ने मामूली फेरबदल करते हुए अपने पैकेज बनाये हैं। इन दोनों अखबारों ने दूध का धुला बनने की कोशिश करते हुए सबसे पहले अपने चुनावी विज्ञापन की असली रेटों को अखबार में प्रकाशित भी कर दिया है। लेकिन ‘खुली लूट’ की कहावत को चरितार्थ करते हुए प्रकाशित की गयी असली कीमतों से कई गुना अधिक मूल्य वसूला जा रहा है। हिन्दुस्तान में छपा डीएवीपी रेट मात्र 11.00 रुपया प्रति स्क्वायर सेमी है, मगर यह अखबार वास्तव में इससे आठ गुना कीमत वसूल रहा है। कम से कम साढे़ तीन लाख के पैकेज पर यह रेट घट कर मात्र छह गुना यानि करीब साठ रुपया वसूला जायेगा।
किसी तरह की कानूनी पकड़ से बचने के लिये अखबार कंपनियों ने पूरी सावधानी बरती है। ब्लैक रेट का कोई रेटकार्ड नहीं छापा गया है। और मामूली ऐजेंटों को इसकी जिम्मेदारी नहीं दी गयी है। प्रबंधन के भरोसेमंद ऐजेंट या कर्मचारी ही इस काम में लगाये गये हैं। अधिकांश तौर पर मैनेजर स्वयं प्रत्याशियों से संपर्क कर रहे हैं। एक अखबार के तो जीएम द्वारा प्रत्याशियों से संपर्क करने की बात पता चली है। पैकेज की पूरी रकम का अग्रिम भुगतान ही लिया जा रहा है। मीडिया के क्षेत्र में बाजारवाद और भ्रष्टाचार कितना भी बढ़ गया हो लेकिन अभी तक उसे लोकतंत्र का चौथा पाया कहा जाता है। कारण शायद यही है कि मीडिया कंपनियां सीधे-सीधे कोई गलत काम नहीं करती हैं। अब तक के विज्ञापन कारोबार को कई बार सिर्फ अघोषित ब्लैकमेलिंग की परिधि लाया जा सकता था, लेकिन यह पहली बार है, जबकि छोटे से लेकर बडे़ तक तमाम अखबार और चैनल इस खुली लूट में शामिल दिखाई पड़ रहे हैं।
आने वाले दिनों में मीडिया को इस चरित्र की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। मीडिया का यह रूप देखकर नेता भी असमंजस में हैं। विज्ञापन कारोबार का यह दौर नेताओं के सामने मीडिया की कलई खोल रहा है। कल यही नेता जब धांधली करेंगे तो मीडिया किस नैतिकता के सहारे उनकी बांहें मरोडने का साहस करेगा। सांविधानिक दायित्व पर बैठे लोगों के लिये भी यह बड़ी चिंता का विषय है। वे नेताओं को एक एक पाई का हिसाब लिखने के लिये रजिस्टर सुपुर्द कर रहे हैं। क्या उन पर मीडिया द्वारा विज्ञापन के नाम पर की जा रही ‘लूट’ को रोकने का कोई उपाय है?
मुकेश मणिकांचन
सिरसागंज






