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नईदुनिया को खरीदकर जागरण कहीं आफत तो मोल नहीं ले रहा है?

यशवंतजी, आपको बधाई, इसलिए कि भड़ास ने एक नई बहस शुरू की है कि छजलानीजी द्वारा नईदुनिया को नहीं चला पाने की खास वजह क्या हैं? आप सबको यह बताना गैरजरूरी नहीं है कि छजलानीजी के कर्ता-धर्ता रहते हुए ही करीब 7 साल पहले वर्ष 2005 में अर्थ-तंगी के चलते राजस्थान पत्रिका ने नईदुनिया को खरीदने की कोशिश की थी। राजस्थान पत्रिका द्वारा इस समूह को खरीदे जाने का कारण इस अखबार का टाइटल था। राजस्थान पत्रिका का प्रबंधन चूंकि ठेठ राजस्थानी परिवेश का रहा है, इसलिए बिना कोई ठोस जानकारी लिए वह इतना बड़ा कदम उठाना उसने गवारा नहीं किया।

यशवंतजी, आपको बधाई, इसलिए कि भड़ास ने एक नई बहस शुरू की है कि छजलानीजी द्वारा नईदुनिया को नहीं चला पाने की खास वजह क्या हैं? आप सबको यह बताना गैरजरूरी नहीं है कि छजलानीजी के कर्ता-धर्ता रहते हुए ही करीब 7 साल पहले वर्ष 2005 में अर्थ-तंगी के चलते राजस्थान पत्रिका ने नईदुनिया को खरीदने की कोशिश की थी। राजस्थान पत्रिका द्वारा इस समूह को खरीदे जाने का कारण इस अखबार का टाइटल था। राजस्थान पत्रिका का प्रबंधन चूंकि ठेठ राजस्थानी परिवेश का रहा है, इसलिए बिना कोई ठोस जानकारी लिए वह इतना बड़ा कदम उठाना उसने गवारा नहीं किया।

इसके लिए राजस्थान पत्रिका की एक पूरी टीम इंदौर स्थित नईदुनिया कार्यालय में डेरा डाले रही थी और अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंच गई कि इसे खरीदा जाना उसके लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। मालूम हुआ है कि जिस समय राजस्थान पत्रिका की टीम इंदौर स्थित नईदुनिया कार्यालय में थी, उसी दरम्यान उसे (पत्रिका को) मालूम हुआ कि नईदुनिया के कर्मियों को उनके हक का वेतन नहीं मिल पाता है। बताते हैं कि इस बारे में विवाद होने पर ही राजस्थान पत्रिका ने नईदुनिया को खरीदने की मंशा पर काबू करना उचित समझा। और इस डील से इनकार कर दिया।

बताते हैं कि अभय छजलानी-महेंद्र सेठिया एंड कंपनी को अखबार चलाए जाने के लिए चूंकि धन की जरूरत थी, इसलिए जब राजस्थान पत्रिका ने किनारा किया तो अभय छजलानी को उनके बेटे ने प्रस्ताव दिया कि इस अखबार को मेरे हवाले कर आप अपना अपना हिस्सा ले लें। अंततः इस पर सहमति बन गई। विनय छजलानी जो भले ही आईटी क्षेत्र के दिग्गज हों, व्यापार करने के दस्तूर नहीं जानते थे। उन्होंने ऐसे ऐसे लोगों को उनके द्वारा मांगे गए वेतन पर नियुक्त कर लिया, जो कि दूसरे संस्थानों के लिए बोझ बन गए थे और जिनसे वह संस्था भी पीछा छुड़ाना चाह रही थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं अनिल धूपर। बताते हैं उन्‍हें सवा लाख रुपए माह पर सीईओ बनाकर यहां लाया गया। उस समय नईदुनिया में कार्यरत कुछ लोगों का मानना था कि अनिल धूपर अब कोई तीर नहीं मार सकेंगे, क्योंकि जब तक उनमें रस मौजूद था, तब तक भास्कर ने उसे छोड़ना ठीक नहीं समझा था, अब जबकि वे गुठली रह गए हैं, नईदुनिया उसे ले आई है। और हुआ भी ठीक वैसा ही। केवल छह माह में ही अनिल धूपर नईदुनिया को छोड़ गए।

इसी तरह एक और अनोखा फैसला नईदुनिया प्रबंधन ने लिया। वह यह कि जब इंदौर से जागरण की शुरुआत हुई तो नईदुनिया में बतौर कम्प्यूटर ऑपरेटर भर्ती होने वाले अखिलेश त्रिपाठी ने वहां तकनीकी प्रबंधक कार्यभार ग्रहण कर लिया, लेकिन जैसे ही उसे यह आभास हुआ कि जागरण अधिक नहीं चल सकेगा, उसने नईदुनिया के अपने रहनुमाओं के जरिये फिर से बतौर प्रमुख यहां छलांग लगा ली। ऐसे एक नहीं अनेक फैसले नईदुनिया के नए प्रबंधन ने लिए, जिससे उसका यह हश्र हुआ। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जागरण ने नईदुनिया को खरीदकर आफत मोल ली है, क्योंकि भले ही यहां पर सीटीसी लागू हो लेकिन ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि यहां पर अखिलेश त्रिपाठी जितने ना जाने कितने हैं, जो किसी भी अखबार के लिए सिरदर्द ही साबित होंगे।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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