नईदुनिया समूह ने ऐसे समय यह निर्णय लिया है जिसे सुनकर यह बात किसी के भी गले नहीं उतर रही है। लगातार चार साल से घाटे में चल रहे अखबार को बेचने या बंद करने का फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया, जबकि कोई भी अखबार मालिक लगातार इतने बड़े घाटे को बर्दाश्त नहीं कर सकता है और अभय या विनय छजलानी ने चार साल तक आंखें मूदें रखीं। और अब जाकर आनन-फानन में अखबार का सौदा दैनिक जागरण कानपुर से किया जा रहा है।
चर्चा तो यह भी है कि छजलानी जी मजीठिया वेतनमान के साथ ही कर्मचारियों की सभी जिम्मेदारियों से बचने के लिए ये सुनियोजित खेल खेल रहे हैं। ना तो इनकी 900 करो़ड़ की कोई देनदारियां ही हैं और ना ही अखबार को कोई घाटा हुआ। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2011 की दीपावली के बाद ही नईदुनिया अखबार के नंबर वन होने की खबरें तथा बड़े-बड़े होर्डिंग्स के माध्यम से यह ढिंढोरा पीटा गया था कि नईदुनिया समूह ने विज्ञापन तथा प्रसार के क्षेत्र में नंबर वन की जगह हासिल कर ली है। चार महीने बाद ही नईदुनिया के अचानक घाटे में आ जाने का कारण समझ से परे है। यह भी पता चला है कि अब विनय छजलानी आईटी के क्षेत्र में हाथ आजमाने के मूड में हैं, क्योंकि इन्दौर में इनकी प्राइम लोकेशन पर कई जमीनें हैं।
वैसे भोपाल में नईदुनिया के संस्करण नवदुनिया की लुटिया डुबोने वालों में गिरीश उपाध्याय, उमेश त्रिवेदी, नगीन बारकिया, पंकज शुक्ला जैसे लोगों का अहम रोल रहा है। इनकी कारगुजारियों के चलते ही यह अखबार भोपाल में नहीं बढ़ पाया। उमेश त्रिवेदी ने जहां इस अखबार की आ़ढ में अरविन्दों के नाम पर इन्दौर और भोपाल में अपनी बड़ी दुकानें जमा लीं, वहीं गिरीश उपाध्याय ने भी नई कार के साथ ही अपनी संपत्तियां इन्दौर तथा भोपाल में बनाई हैं। अजय बोकिल को ये लोग अपना मोहरा बनाकर इस्तेमाल करते रहे। चार साल से इस अखबार में न्यूज एडीटर के पद पर बैठे नगीन बारकिया ने भी अखबार के बजाए अपना हित साधने का काम किया। जबकि मैनेजमेंट में बैठे सुनील भण्डारी और एचआर में बैठे आनंद तिवारी ने भी हाथ साफ करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.





