भाईसाहब नमस्कार, श्री दयानंद पाण्डेय और श्री राजनाथ सिंह सूर्य के आपसी विवाद को हम अनावश्यक रूप से तूल दे रहे हैं. इसमें कोई शक नही कि टी. आर. प़ी. बढ़ रही है लेकिन मंच बदनाम हो रहा है. चूँकि मैं पत्रकारिता में बहुत कनिष्ठ हूं और सदैव कनिष्ठ ही बना रहना चाहता हूं, नही तो कभी कुछ नहीं सीख पाऊंगा लेकिन दोनों वरिष्ठों को अनुज की बिना मांगी सलाह है कि मतभेद हो जाते हैं, लेकिन इस तरह उनका सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण ठीक नहीं है. जिस समय कल्याण सिंह अटल जी के विरुद्ध जहर उगल रहे थे और कोई बड़ा नेता यहां तक क़ि राजनाथ जी के नामराशि राजनाथ सिंह भी कुछ बोलने से कतरा रहे थे उस समय मैंने श्री सूर्य का साहस देखा था.
अमर उजाला में छपे श्री सूर्य के लेख में कल्याण सिंह के कारगिल वाले बयान पर अच्छी खबर ली गई थी. उसी से मिलता जुलता मेरा एक संपादक के नाम पत्र भी प्रकाशित हुआ था दैनिक जागरण में. काफी अच्छी लगी थी श्री सूर्य क़ी बातें. श्री सूर्य राजनीति में अपने ही नाम राशि क़ी राजनीति का शिकार हुए क्योंकि उनके नाम राशि किसी ठाकुर नेता को पनपने नहीं देना चाहते थे. यही कारण है कि श्री सूर्य राजनैतिक वनवास झेल रहे हैं. श्री सूर्य संघ के कार्यकर्ता होने का ढोंग करते हैं, ऐसा भी मैं नहीं मानता अन्यथा वे विश्व संवाद केंद्र के हर कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी नहीं रखते. यहां एक चीज और स्पष्ट करना चाहूँगा कि न ही श्री सूर्य और न ही श्री पाण्डेय मुझसे व्यक्तिगत रूप से परिचित हैं लेकिन दोनों एक स्थापित नाम है और मील के एक पत्थर हैं जिनसे मुझ जैसा तुच्छ प्रशिक्षु हमेशा कुछ सीखना चाहेगा. चाहे वो श्री सूर्य के तेवर हों या श्री पाण्डेय की साहित्यिक उत्कृष्टता, दोनों बहुत कुछ सिखाते हैं. मेरा विनम्र निवेदन है दोनों अग्रजों से कि भूत में जो हुआ, वो पन्ने अपने -२ इतिहास से फाड़ दें और जो ऊचाइयां दोनों ने प्राप्त की है उसको और भी लोग प्राप्त करें, ऐसी प्रेरणा हम सभी अनुजों को दें.
आपका
क्रान्ति किशोर मिश्र
ब्यूरो प्रमुख
सुदर्शन न्यूज़ लखनऊ
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