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सुख-दुख...

मैं मानता हूं कि आलोक मेहता एक निहायत गलत फैसला थे

: छिप कर पत्थर मारने वालों को प्रोत्साहित न करे भड़ास : चाय से ज्यादा गरम हैं केतलियां : 'भड़ास' पर ऐसा बहुत कुछ पढ़ा है, जिसमें लिखने वालों की पहली शर्त यह थी कि उनका नाम नहीं लिया जाए। मेरी पहली शर्त यह है कि मेरा नाम लिया जाए। नईदुनिया के ऐसे भी शुभचिंतक क्या हुए जो अपना नाम तक देने में घबराते हैं? तो पहली शर्त यही है कि नाम दिया जाए। मेरा नाम दीपक असीम है और मैं तीन बरसों से नईदुनिया में हूं। पहले प्रभात किरण में होता था। यहीं से विनय जी मुझे नईदुनिया लाए। मैं 'पर्दा-बेपर्दा' नाम का नियमित कॉलम लिखता हूं। तो जनाब ये तो हुआ संक्षिप्त परिचय।

: छिप कर पत्थर मारने वालों को प्रोत्साहित न करे भड़ास : चाय से ज्यादा गरम हैं केतलियां : 'भड़ास' पर ऐसा बहुत कुछ पढ़ा है, जिसमें लिखने वालों की पहली शर्त यह थी कि उनका नाम नहीं लिया जाए। मेरी पहली शर्त यह है कि मेरा नाम लिया जाए। नईदुनिया के ऐसे भी शुभचिंतक क्या हुए जो अपना नाम तक देने में घबराते हैं? तो पहली शर्त यही है कि नाम दिया जाए। मेरा नाम दीपक असीम है और मैं तीन बरसों से नईदुनिया में हूं। पहले प्रभात किरण में होता था। यहीं से विनय जी मुझे नईदुनिया लाए। मैं 'पर्दा-बेपर्दा' नाम का नियमित कॉलम लिखता हूं। तो जनाब ये तो हुआ संक्षिप्त परिचय।

अब मैं भड़ास पर ही पढ़ी गई कुछ बातों पर अपनी राय लिखना चाहता हूं। हेडिंग था 'पिता ने साठ साल चलाया, बेटे ने पांच वर्ष में निपटाया'। मेरा जवाब यह है कि तथ्य केवल तथ्य होते हैं, उनकी व्याख्या सबकी अपनी-अपनी होती है। एक आदमी अपने बड़े भाई को अस्पताल ले जाए और कहे कि मैंने पचास साल अपने भाई को स्वस्थ रखा और आपने पांच दिन में ही मार डाला। मगर यह भी तो देखना पड़ेगा कि अस्पताल लाने की नौबत ही क्यों आई थी। तथ्य यह है कि नईदुनिया बीमार चल रहा था और विनय जी ने उसके उपचार की कोशिश की। भड़ास पर ही लिखे गए लेखों के मुताबिक पत्रिका ने पांच बरस पहले नईदुनिया की कीमत पंद्रह करोड़ लगाई थी और पांच बरस बाद भड़ास पर लिखे गए लेखों के ही मुताबिक अब एक अन्य अखबार ने इसकी कीमत कई सौ करोड़ लगाई है। क्या पांच साल में नईदुनिया की साख में बढ़ोतरी नहीं हुई? इस तथ्य को इस ढंग से भी पेश किया जा सकता है कि साठ साल मेहनत के बाद नईदुनिया की कीमत केवल पंद्रह करोड़ आँकी गई थी औऱ विनय जी की पांच साल की कोशिशों के बाद अब आँकी जा रही है सैकड़ों करोड़?

आंकड़ेबाज इसे कितनी वृद्धि कहेंगे? अब बकाया ऐतराज़ इस लेख में लिखी गई घृणित बातों पर हैं। जयदीप की कार्यशैली और फैसलों पर दो राय हो सकती है। मगर ये कहना कि जयदीप में चारित्रिक दोष हैं, एकदम गलत है। जहां तक विवाह की बात है, लोग ऐसे ही तो एक-दूसरे से मिलते हैं। लव मैरेज कर लेना तो इतना बड़ा गुनाह नहीं कि जिसकी बिना पर आदमी को चरित्रहीन ठहरा दिया जाए। इसमें लिखा गया है कि एक टेलिफोन आपरेटर को जयदीप ने अपना सलाहकार…। जिन सज्जन की बात की गई है, उनका नाम सुबोध होलकर है। जब मैं प्रभातकिरण में काम करता था, तब मैंने उनकी लिखी एक रपट नईदुनिया में पढ़ी थी। उनकी रपट पढ़ कर मैं अभिभूत हो गया। मैंने अभय जी को फोन किया (तब अभय जी ही अखबार संभालते थे) और कहा कि अभय जी जिस आदमी को आपके यहां संपादकीय टोली में होना चाहिए वो टेलिफोन ऑपरेटर है और जिन्हें टेलिफोन ऑपरेटर होना होना चाहिए, वे संपादकीय टोली में हैं। अभय जी ने भी इस नाचीज़ की बात को सम्मान दिया था।

विनय जी के अखबार संभालने के बाद इन्हें संपादकीय विभाग में लिया गया मगर पचास से ऊपर के सुबोध होलकर अब स्वास्थ्य संबंधित परेशानियों में ऐसे घिर गए हैं कि नियमित रूप से लिख नहीं पा रहे। वरना वे बहुत अच्छे लेखक हैं। वे संयोग से मराठीभाषी हैं, पर ये कहना कि वे जयदीप के करीबी मराठीभाषी होने के कारण हैं, फूहड़ बात है। सुबोध होलकर को जानने वाले बताएंगे कि ये आदमी भाषावाद, जात-धरम से ऊपर की सोच रखता है। जयदीप के करीब वे अपनी काबलियत से हैं। एक दूसरे सज्जन का भी ज़िक्र है, जिन्हें मैं नहीं जानता।

कुछ बातें तो इतनी घृणित हैं कि उनको पढ़ कर उबकाई आती है। जनरेशन गैप मुमकिन है। मतभिन्नता भी वयस्क बेटे और पिता में होती है। मगर ये कहना कि विनय जी पिता को अपमानित करने वालों से खुश होते हैं, बेहूदा बात है। उसी तरह से ये भी बकवास है कि अभय जी जानबूझ कर ऐसी मांग रखते हैं, जो विनय जी के लिए संभव नहीं होती। यह भी बकवास है कि मनीष शर्मा और जयदीप कर्णिक चाटुकारिता के कारण विनय जी के करीबी बने। मनीष शर्मा को संस्था ने जब जो लक्ष्य दिया, उसे उन्होंने पूरा किया। बल्कि लक्ष्य से ज्यादा किया। ऐसे लोग यदि नहीं सराहे जाएंगे तो क्या होगा? जयदीप कर्णिक की ईमानदारी और पारदर्शिता से यदि कोई प्रभावित नहीं होता, तो वो आँख नहीं रखता। वे भी परफार्मर हैं औऱ वेबदुनिया में उन्होंने जो किया उसे देखते हुए ही विनय जी ने उन्हें संपादक बनाया।

मैं मानता हूं कि आलोक मेहता एक निहायत गलत फैसला थे। इस फैसले की खबर लगते ही मैंने इसका विरोध किया था। मैं हमेशा अपने फीडबैक में विनय जी को लिखता रहा कि आलोक मेहता एक प्रतिभाहीन शख्स हैं। ऐसे लोग जहां भी जाते हैं, वहां बंटाधार के सिवा कुछ नहीं करते। आलोक मेहता की एकमात्र प्रतिभा है, सत्ता का साथ इस ढंग से देना कि वे तटस्थ भी लगें। मुझे नहीं पता कि इस समय उनका स्टेटस क्या है और इससे मेरी नौकरी पर क्या असर पड़ेगा। मगर मैं ऐलानिया कहता हूं कि वे सेटिंगबाज हैं, चाटुकार हैं, प्रतिभाहीन हैं, उन्हें चार लाइनें इस तरह लिखना नहीं आता जो पठनीय हों। आइये अब कुछ और बातें भी करें।

नईदुनिया को लेकर इतना हंगामा क्यों? चाय से ज्यादा गरम केतलियां हैं। इस अखबार में काम करने वाले जितने परेशान नहीं हैं, उतने दूसरे परेशान हैं। इस अखबार में काम करने वालों को भरोसा है कि जो भी होगा ठीक होगा। विनय जी कभी ऐसा निर्णय नहीं लेंगे जो कर्मचारियों के लिए गलत और नुकसानदेह हो। अखबार में काम करने वाले निश्चिंत हैं, मगर दूसरे चिंता में घुले चले जा रहे हैं। वे आरोप लगा रहे हैं, गंदी बाते गढ़ रहे हैं और सच कहा जाए तो अपनी पुरानी भड़ास निकाल रहे हैं। ये लोग इतने कायर हैं कि अपना नाम भी नहीं लिखते। जो लोग इतने भी जिम्मेदार नहीं हैं, उनकी राय क्या अहमियत रखती है। इस लेख का जवाब भी भड़ास के संपादक को तभी छापना चाहिए जब कोई अलल-एलान अपने नाम से लिखे। छिप के पत्थर मारने वालों को प्रोत्साहित करना ठीक नहीं। नाम गुप्त रख के कोई अगर खबर दे दे तो बात ठीक है। मगर गुप्त नामों से ऐसे लंबे-लंबे लेख नहीं लिखे जाते हैं।

दीपक असीम

पत्रकार

नई दुनिया

[email protected]


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