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पच्चीस लाख करोड़ रुपये : भारत को लूटते भारतीय लुटेरे

सीबीआई डायरेक्टर का बयान मामूली नहीं है. अगर आदर्श की राजनीति होती, सिद्धांत की राजनीति होती, मूल्यों की बात होती, 1971 का माहौल होता, तो राजनीतिक भू-चाल आ जाता. बवंडर खड़ा होता. क्योंकि सीबीआइ डायरेक्टर का बयान सच की अधिकारिक पुष्टि है. यथा राजा, तथा प्रजा कहने के लिए यह मुल्क उनका ऋणी रहेगा. क्योंकि बड़े पदों पर बैठे लोगों ने अब सच बोलना भी छोड़ दिया है. यह बयान प्रामाणिक पुष्टि है कि भारत लूटा गया है. लूटनेवाले कोई गैर नहीं हैं, बल्कि भारतीय संतानें हैं. काया (शरीर) में भारतीय. पर मन से, स्वभाव से और आचरण से ये मोहम्मद गोरी, मीर जाफ़र, तैमूरलंग, नादिर शाह से भी बर्बर क्रूर और भारतद्रोही हैं. ऐसे भारतीयों से करोड़ों गुना बेहतर तो अंगरेज थे.

सीबीआई डायरेक्टर का बयान मामूली नहीं है. अगर आदर्श की राजनीति होती, सिद्धांत की राजनीति होती, मूल्यों की बात होती, 1971 का माहौल होता, तो राजनीतिक भू-चाल आ जाता. बवंडर खड़ा होता. क्योंकि सीबीआइ डायरेक्टर का बयान सच की अधिकारिक पुष्टि है. यथा राजा, तथा प्रजा कहने के लिए यह मुल्क उनका ऋणी रहेगा. क्योंकि बड़े पदों पर बैठे लोगों ने अब सच बोलना भी छोड़ दिया है. यह बयान प्रामाणिक पुष्टि है कि भारत लूटा गया है. लूटनेवाले कोई गैर नहीं हैं, बल्कि भारतीय संतानें हैं. काया (शरीर) में भारतीय. पर मन से, स्वभाव से और आचरण से ये मोहम्मद गोरी, मीर जाफ़र, तैमूरलंग, नादिर शाह से भी बर्बर क्रूर और भारतद्रोही हैं. ऐसे भारतीयों से करोड़ों गुना बेहतर तो अंगरेज थे.

गुजरे सप्ताह, सीबीआई के डायरेक्टर एपी सिंह का एक अत्यंत महत्वपूर्ण बयान आया. उनके अनुसार लगभग 500 बिलियन डॉलर (25 लाख करोड़ रुपये) भारतीय पूंजी विदेशी बैंको में जमा है. यह ब्लैकमनी (कालाधन) है. गैरकानूनी ढंग से बाहर ले जायी गयी पूंजी है. इसी संदर्भ में सीबीआई के डायरेक्टर ने एक सूक्ति भी दोहरायी. हजारों वर्ष पुरानी. बिलकुल सटीक और साफ़ संदेश देने वाली. एपी सिंह ने कहा, यथा राजा, तथा प्रजा. यानी देश में जैसे शासक होते हैं, वैसी ही प्रजा हो जाती है. इस बयान का अर्थ साफ़ है कि यह 25 लाख करोड़ भारतीय पूंजी विदेश कौन ले गया है? भारत का शासक वर्ग ही न! पहले इंटरपोल ग्लोबल प्रोग्राम के उद्घाटन अवसर पर श्री सिंह ने ये बातें कहीं. याद रखिए अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति का यह बयान है. यह राजनीतिक बयान नहीं है. श्री सिंह की सूक्ति सुन कर महाभारत का पुराना प्रसंग याद आया. महाजनों येन गता सो पंथा: बड़े लोग जिस रास्ते जाते हैं, छोटे लोग उसी रास्ते पर चलते हैं.

इस सूक्ति से यह समझ में आता है कि आज बेईमानी, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, चोरी, अनैतिकता जैसे मुद्दे समाज में क्यों निर्णायक नहीं हैं? क्यों आज ईमानदारों को अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ रही है? नीति पर चलनेवाले, सच बोलनेवाले, साधन और साध्य के फ़ार्मूले के तहत जीनेवाले या मन, वचन, कर्म पर एका रखनेवाले लोग आज छुप-छुप कर क्यों जी रहे हैं? क्योंकि अनैतिक होती भीड़ के आगे वे अल्पसंख्यक हो गये हैं. ईमानदार को कोई ईमानदारी से जीने नहीं देना चाहता. क्यों? क्योंकि ऊपर बैठे शासक वर्ग के लोग (राजनीतिज्ञ दलों के लोग, सरकार-विपक्ष के लोग, उद्यमी, अपराधी, दलाल, नौकरशाही, प्रभुत्व संपन्न समाज का संचालन करनेवाला तबका) अनीति की राह पर चल रहे हैं. यह 500 बिलियन डॉलर पूंजी, जो विदेशों में जमा है, यह किसकी है? इसी शासक वर्ग की न!

अब यह वर्ग राष्ट्रवाद (भारतीयता) की बात कैसे करेगा? इसलिए आज देश की राजनीति में भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं है. क्योंकि जिस वर्ग को, ऐसे सवालों को मुद्दा बनाना है, वही इसमें डूबा है. नीचे की जनता अपने नेताओं की रहनुमाई तो करती नहीं. बड़े नेता या शासक वर्ग, कमीशनखोरी, घूसखोरी या दलाली के जिस रास्ते पर मुल्क को पिछले 30-40 वर्षो में ले गये हैं, अब नीचे की जनता भी उसी रास्ते पर है. इसलिए पंचायत में चुना गया आदमी या नगरपालिका में चुना गया आदमी भी वही करना चाहता है, जो एक सांसद, विधायक, मंत्री, अफ़सर या शासक वर्ग के लोगों को करते देख रहा है. यानी लूटो. खूब लूटो और भारत की संपदा को बाहर रखो.

यह महाजनो येन गतः सो पंथा: वाली स्थिति है. रहनुमा लुटेरों के दिखाये रास्ते पर छोटे नेता भी दौड़ रहे हैं. सीबीआइ के डायरेक्टर का बयान मामूली नहीं है. अगर आदर्श की राजनीति होती, सिद्धांत की राजनीति होती, मूल्यों की बात होती, 1971 का माहौल होता, तो राजनीतिक भू-चाल आ जाता. बवंडर खड़ा होता. क्योंकि सीबीआइ डायरेक्टर का बयान सच की अधिकारिक पुष्टि है. यथा राजा, तथा प्रजा कहने के लिए यह मुल्क उनका ऋणी रहेगा. क्योंकि बड़े पदों पर बैठे लोगों ने अब सच बोलना भी छोड़ दिया है. यह बयान प्रामाणिक पुष्टि है कि भारत लूटा गया है. लूटनेवाले कोई गैर नहीं हैं, बल्कि भारतीय संतानें हैं. काया (शरीर) में भारतीय. पर मन से, स्वभाव से और आचरण से ये मोहम्मद गोरी, मीर जाफ़र, तैमूरलंग, नादिर शाह से भी बर्बर क्रूर और भारतद्रोही हैं. ऐसे भारतीयों से करोड़ों गुना बेहतर तो अंगरेज थे.

पहले सरकारें मानती ही नहीं थीं कि भारतीय पूंजी विदेशों में जमा है. दस वर्षो पहले जाने-माने मोटिवेटर (प्रेरक) शिव खेड़ा अपने भाषणों में बताते थे कि कैसे भारतीय पूंजी स्विस बैकों में रखी है? साथ में वह इंदौर से छपने वाले द फ्री प्रेस जर्नल में छपी एक बड़ी खबर को वितरित करते थे. उस खबर में स्विटजरलैंड के भारतीय दूतावास के दूसरे महत्वपूर्ण अधिकारी का बयान था कि भारतीय पूंजी-धन, स्विस बैंकों में जमा है. इसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह जब बागी होकर सत्ता पाने की लड़ाई लड़ रहे थे, तब वह स्विस बैंकों में जमा भारतीय नेताओं के धन की बात करते थे. पर, प्रधानमंत्री की कुरसी पाते ही वह भी इसे भूल गये. उनके कार्यकाल के मुख्य सर्तकता आयुक्त भूरे लाल (अत्यंत ईमानदार आइएएस) ने अधिकारिक बयान दिया कि भारतीय लोगों के अवैध धन स्विस बैंकों में जमा हैं. इसके बाद एनडीए की सरकार बनी. यशवंत सिन्हा वित्तमंत्री बने, तो कुछ दिनों के लिए उनके सलाहकार बने मोहन गुरुपद स्वामी.

पद पर आते ही उन्होंने एक टीवी चैनल (स्टार) पर कहा, भारतीयों का बड़ा कालाधन स्विस बैंकों में जमा है. 2009 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और खासतौर से लालकृष्ण आडवाणी ने विदेशों में जमा भारतीय कालाधन को बड़ा सवाल बनाया. कांग्रेस ने मजबूर होकर कहा, जांच करायेंगे. उसके ठीक कुछ दिनों पहले (यूपीए के पहले कार्यकाल में) लिचेनस्टीन द्वीप में भारतीयों के जमा कालेधन का प्रसंग सामने आ चुका था. हुआ यह था कि जर्मनी ने कुछ जर्मनवासियों के जमा कालेधन की जांच के लिए एक जासूसी समूह को जांच काम सौंपा. उन लोगों ने इस द्वीप के बैंकों में जमा अवैध धन रखनेवालों की पूरी सूची निकाल ली. उसमें भारतीयों की भी एक लंबी सूची थी. जर्मन सरकार ने भारत सरकार को लिखा कि आपको अवैध कालाधन जमा करनेवाले भारतीयों की सूची चाहिए? बहुत दिनों तक यह पत्र अनुत्तरित रहा. यह खबर लीक हुई, तब केंद्र सरकार पर दबाव पड़ा.

पर आज तक पता नहीं चला कि उस पर क्या कार्रवाई हुई? इसी बीच बाबा रामदेव ने इस मुद्दे को गांव-गांव तक पहुंचाया. उनके साथ इस मुद्दे पर अध्ययन करने वाली जानकार टीम है. इस टीम में एक आइआइएम के प्रोफ़ेसर वैधनाथन हैं. चार्टर एकांउटेंट गुरुमूर्ति हैं. ऐसे कई लोग हैं. उन्होंने सरल और सहज भाषा में एक पुस्तिका छपवाई कि यह धन अगर भारत वापस आ जाये, तो भारत दुनिया का सबसे संपन्न देश कैसे हो जायेगा? फ़िर से सोने की चिड़िया बन जायेगा. इसी बीच यह मामला सुप्रीम कोर्ट गया. अदालत के दबाव से रुक-रुक कर विदेशी बैंकों में जमा भारतीय कालेधन की जांच चल रही है. इस कानूनी लड़ाई में राम जेठमलानी लगे हैं.

सरकार के पास कुछेक लोगों के नाम आ गये हैं, जिन्होंने विदेशों में धन रखा है. पर सरकार का स्टैंड है कि इसको सार्वजनिक नहीं किया जायेगा. इस बीच एनडीए ने इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की.पर यह सच है कि आज लोकजीवन में भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं है. क्योंकि कोई राजनीतिक दल ईमानदारी से इसे मुद्दा बनाना ही नहीं चाहता. अब जैसा राजा या शासक है, वैसे ही जनता (प्रजा) है. राजा (शासकों) का लोभ, छल, प्रपंच और भोग का दर्शन जनता में भी पसर गया है. जनता भी उसी राह दौड़ रही है. एमएलए, एमपी की राह पर मुखिया या सरपंच चल रहे हैं, तो कहां संभावना है कि देश सच्चाई और ईमानदारी की राह चलेगा? अभी सुप्रीम कोर्ट ने राजा के द्वारा दिये गये 122 लाइसेंसों (2जी) को रद्द कर दिया. 9000 करोड़ के बदले ये लाइसेंस दिये गये थे. 3जी में कम लाइसेंस दिये गये. पर सरकार को 69000 करोड़ मिले. 1785 में बिलियन कापर नाम के अंगरेज ने एक किताब लिखी द टास्क.

भारत से जुड़ी निर्माण की बातों का उल्लेख इस पुस्तक में है. उसमें एक पंक्ति है, थीव्स ऐट होम मस्ट हैंग (घर के चोरों को फ़ांसी मिलनी चाहिए). एक अंगरेज, भारत आकर यह सोचता था कि लुटेरों को सीधे फ़ांसी दो. आजाद भारत में पंडित जी (पंडित जवाहर लाल नेहरू) ने यह सपना देखा था कि भ्रष्टाचारियों को चौराहे के लैंप पोस्ट पर लटका दिया जाये. पर आजाद भारत के 63 वर्ष बाद भी, सीबीआइ डायरेक्टर से सच आ जाने के बाद भी, भारत लूटनेवालों का सवाल मुद्दा नहीं बन रहा. एक ही उम्मीद हैं, दुनिया के बागी पत्रकार जूलियन असांजे. असांजे ने कहा है कि अगर भारत ने भारतीय लुटेरों के नाम नहीं बताये, तो वे जल्दी सूची जारी करेंगे. उनकी सूची बतायेगी कि किन भारतीयों का धन स्विस बैंकों में जमा है? असांजे किसी भी भारतीय से बढ़ कर हैं. वह भारत लूटनेवालों के चेहरों से नकाब हटा कर भारत की बड़ी सेवा करेंगे.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.

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