Ambrish Kumar : कल प्रियंका की एक रचना अजीत अंजुम को याद दिलाने के साथ सोनी शोरी की पोस्ट पर आजतक के अमिताभ की प्रतिक्रिया जो दी उस पर कुछ ज्यादा ही गरमागरम बहस हो गई. दिलीप मंडल पर जब किसी ने निजी टिप्पणी की तो वह हमने हटा दी और अजीत अंजुम को यह लगा कि उनका कमेन्ट भी हटा सकता हूँ, यह धारणा कैसे बनी मुझे नहीं पता. हम लोग चन्द्रदत्त तिवारी के विचार केंद्र से लेकर छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की बहसों के बीच से निकले हैं और बहस से कभी भागते नहीं पर बहस तर्क पर होनी चाहिए. अभी सुमंत ने कहा- कल की बहस बहुत ज्यादा निजी और व्यक्तिगत कुंठाओं का मंच बन गई थी… हिंदी पत्रकारिता में सबसे बड़ी कमी पॉलिसी की समझ की है। और शायद यही वह धरातल है जिस पर एक कदम आगे बढ़ा जा सकता है.. आज नहीं तो कल हिंदी के पाठकों की बढ़ती भूख इस बात के लिए पत्रकारों को बाध्य करेगी, तब तक शायद आज के पत्रकार कहीं बहुत पीछे छूट चुके होंगे।
Anant Kumar Jha : Ambrish धारणा तो बननी ही थी. पहले कुछ कमेन्ट आपने डिलीट किए फिर दिलीप मंडल ने. सभी की प्रतिक्रियाओं का स्वागत होना चाहिए था. आखिर हम बगैर सुने,देखे,पढ़े किसी के बारे में कोई राय कैसे कायम करेंगे?इस बहस में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल रहे लोगों में कमेन्ट डिलीट कर देने से निराशा ही हुई है.
Ambrish Kumar झा जी गाली गलौज फिर डीलीट होगी
Anant Kumar Jha : Ambrish क्या यह सो काल्ड सभ्य समाज हमें अभिव्यक्ति की आजादी भी नहीं दे सकता?क्या चर्चा के दौरान गाली को प्रतीकात्मक विरोधी शब्द के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता.वैसे भी दिलीप मंडल की गाली गाली कम ललकार ज्यादा लग रही थी.यह बात अलग है कि दिलीप मंडल कि क्षद्म नीतियों का मैं धुर विरोधी हूँ,और उनके पूंजीवादी मीडिया में हुई वापसी का आलोचक भी…
Ambrish Kumar कुछ देर पहले अनंत कुमार झा ने अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल उठाते हुए गाली देने की आजादी का मुद्दा उठाया क्योकि कल अजीत अंजुम, दिलीप मंडल, अमिताभ आदि के बीच बहस बहुत तल्ख़ हुई और कुछ कमेन्ट हटा दिए थे इसी पर झा जी ने सवाल उठाया. तब लगा कुछ बाते साफ़ कर दी जाए. हमने प्रभाष जोशी का बहुत ही आक्रामक लेखन देखा है जिसपर कई बार लोगों ने तरह तरह की धमकी भी दी. हम सब भी उसी राह पर चलने वाले है पर कभी गाली का एक शब्द भी नहीं कहा. फेसबुक पर पत्रकारिता के छात्र छात्राए भी है. अख़बार, पत्रिका और चैनल की वे बच्चियां भी है जो अपने वरिष्ठ पत्रकारों जिनमे अजीत अंजुम, अमिताभ और दिलीप मंडल जैसे पत्रकार शामिल है, से कुछ सीख समझ रही है. ऐसे में शब्दों की शालीनता को तोडना क्या बेहतर होगा. फेसबुक को क़ानूनी रूप में भी अख़बार जितनी ही आजादी है इससे ज्यादा नहीं और साइबर मामले में आपने सहयोगी पुलिस से प्रताड़ित हो चुके है उन्होंने वही भाषा इस्तेमाल की थी जो कई बार छप भी जाती है. इसलिए इसे भी ध्यान रखें. अब गलियों के ज्ञान पर आ जाए. हम लोग जब अस्सी के दशक में लखनऊ विश्विद्यालय के हबीबुल्लाह छात्रावास में रहते थे तो जब भी बिजली जाती थी सामने वाले महमूदाबाद छात्रावास वालों से गाली प्रतियोगिता शुरू हो जाती थी जिसमे हार तरफ पचास साठ छात्र हिस्सा लेते थे और गालियों पर नए नए शोध होते थे. एक सांस में सबसे ज्यादा गाली देने वाले छात्र की जीत होती थी. वह दौर कट्टा, बम और बंदूक की राजनीति का था और जाहिर है हम भी उससे अछूते नहीं थे वर्ना अभी भट्ट जी बता देंगे. यह परंपरा सभी छात्रावासों में थी और एनडी छात्रावास क गलियों के चलते नदवा कालेज में पीएसी तक लगनी पड़ी थी. अपने एक साथी अरुण त्रिपाठी जो बड़े पत्रकार है उनका कोई वाक्य बिना गाली के शुरू और ख़त्म नहीं होता था. एक बार मेफेयर टाकिज में उन्हें टिकट नहीं मिला तो आधे घंटे में वह आलिशान टाकिज ध्वस्त हो चुका था. यह इसलिए बताया जा रहा है झा जी ताकि यह बता रहे गालियों के ज्ञान में कोई कम नहीं है. और उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों से जो पत्रकार आए है सब सिद्धहस्त. सुमंत भी उसी परम्परा के है. इसलिए बंधुवर भाषा वाही बोले जो परिवार के साथ समाज के साथ बोली जा सके.
अंबरीश कुमार के फेसबुक वॉल से साभार.





