: काजी साहब को शहर का अंदेशा… : ओशो एक कहानी सुनाते हैं – बुद्ध अपने शिष्य आनंद के साथ कहीं से जा रहे थे। शाम का समय था और चरने गई भैंसे लौट रही थीं। एक आदमी बड़ी मेहनत से उन भैंसो को गिन रहा था। आनंद ने कहा कि देखिए भगवन ये आदमी किस लगन से भैंसे गिन रहा है। बुद्ध ने कहा आनंद तुम्हें ये जानकर अचरज होगा कि ये कंगाल है। इसके पास कुछ नहीं है। ये बस परायी भैंसों को गिनता रहता है। इसी से इसका समय कटता है। नईदुनिया के भविष्य को लेकर कयासआऱाई करने वाले भी उसी भैंस गिनने वाले जैसे हैं।
तुम्हारा लेना एक नहीं, देना दो नहीं। क्यों इतनी मेहनत कर रहे हो? मगर करें क्या कि टाइम पास नहीं होता। करने के लिए कुछ नहीं है, तो चलो ये ही सही। न किसी ने इनसे पूछा और न किसी को इनकी राय की परवाह है। ये लोग फतवे दे रहे हैं, कैरेक्टर सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं। किसी ने इनसे ऐसा करने के लिए कहा भी नहीं। इसका कुछ पारिश्रमिक भी मिलने वाला नहीं है, पर भाई लोग हैं कि लगे हुए हैं। एक पुरानी कहावत यह भी है कि काजी जी क्यों दुबले हैं, तो जवाब मिला कि शहर के अंदेशे से। काजी जी को शहर की ऐसी चिंता है कि सूख कर कांटा हुए जा रहे हैं। जिन लोगों ने कभी पांच लाख रुपये एक साथ नहीं देखे वे करोड़ों के आंकड़े ऐसे फेंक रहे हैं, जैसे दिन रात करोड़ों-अरबों के वारे न्यारे ही करते हों। पान-गुटका उधार में या दूसरों के सिर खाकर करोड़ों की बातें करने का भी अपना एक आनंद है।
परिवर्तन संसार का नियम है। परिवर्तन के अलावा हर चीज़ परिवर्तनीय है। संस्कृतियां पैदा होती हैं, मर जाती हैं। सभ्यताएं श्रेष्ठता के शिखर चूमती हैं और फिर इतिहास बन जाती हैं। मीडिया संस्थान भी इसका अपवाद नहीं हैं। कामयाबी और नाकामी भी आती-जाती रहती हैं। तेज़ी-मंदी और छंटनी भी कारोबारी जगत का अंग है। इससे सुरक्षित रह कर कोई आदमी कैसे जीवन जी सकता है? सरकारी नौकरी में भी तबादले होते हैं, लोग सस्पेंड और बर्खास्त होते हैं। सब कुछ ठीक चलता रहे तो अटैक आ जाता है, लकवा मार जाता है, दिमाग़ की नस फट जाती है।
तो भाई इस फानी दुनिया में क्यों एक चीज़ को लेकर स्यापा कर रहे हो। उठो, जागो, मुंह पर पानी फेरो औऱ अपने काम से लगो। अगर हर बात तुम्हें पता भी चल जाए तो उससे होगा क्या? फिर इस मामले में तो बीस मुंह हैं और चालीस बाते हैं। मालिकों को खबर ही नहीं है और लोगों के पास पल-पल के अपडेट आ रहे हैं। अरे जो होगा सो हो जाएगा। अंत में एक कहावत औऱ है – नाई रे नाई कितने बाल…। नाई ने कहा जजमान अभी सामने आए जाते हैं।
नौ मार्च की घोषणा भी एक साहब ने कर दी है। नौ मार्च को भी हम देखेंगे। वैसे ज्योतिष कई बार दुनिया खत्म होने की भविष्यवाणी कर चुके हैं। दो हजार बारह के बारे में भी कई बातें हो रही हैं। इस हिसाब से वो लोग समझदार हैं, जो कयामत से पहले ही अपना माल बेच कर दाम खड़े कर रहे हैं। आपके पास भी कुछ बेचने लायक हो तो बेच-बाच कर नक्की हो जाओ। दूसरों की भैंसे गिनने से तो कुछ नहीं मिलने वाला।
लेखक दीपक असीम पत्रकार हैं. नई दुनिया अखबार में इनका स्तंभ प्रकाशित होता है.





