मित्र दुर्गानाथ स्वर्णकार से कल शाम जब रवींद्र शाह के निधन की सूचना मिली तो पहले तो यकीन करना मुश्किल था. फिर जैसे-तैसे दिमाग स्थिर हुआ पर दिल तो बच्चा है जी, अबतक यही सवाल कर रहा है – अच्छे लोग आमतौर पर दीर्घायु क्यों नहीं होते? विवेकानंद और गुरुदत्त जैसे अल्पायु महानतम लोगों से रवींद्र जी की तुलना करने की मेरी कोई मंशा नहीं है… क्योंकि निजी तौर पर मैं रवींद्र जी को ही जानता हूं… इसलिए सिर्फ उनकी बात करता हूं।
उनके विवेक से मिला आनंद, उनके साथ शाकुंतलम (प्रगति मैदान) में देखी हुई फिल्में, मंडी हाउस में देखे हुए नाटकों की याद… इससे पहले कि ये सब स्मृतियां धुंधली पड़तीं… फिल्म आनंद- का क्लाइमेक्स असल जिंदगी में रूलाने आ गया है- जहांपनाह… हम सब रंगमंच की कठपुतलियां हैं, सबकी डोर ऊपर वाले के हाथ में बंधी है… कौन कब ऊपर उठेगा… कोई नहीं जानता…!!!
कोई जान भी नहीं सकता, जिन्दगी की यही पहेली सुलझाने यादें अपने सफर पर निकलीं, तो ठाणे-ईगतपुरी कब पार हुआ पता नहीं, मुंबई-आगरा हाई वे की जरूरत भी नहीं पड़ी, एक पल में आ गया नोएडा का अट्टा मार्केट। यादें रजनीगंधा चौक से होती हुई सीधे पहुंच गईं नोएडा सेक्टर 22, स्पाइस के पास, मदर डेरी के पीछे एक छोटे से मकान का तीसरा माला… जिसका नंबर अभी याद नहीं, पर वहीं रहते थे रवींद्र जी, सहारा सेक्टर 11 में नहीं होंगे तो घर पर… और घर पर नहीं तो दफ्तर में… उनकी स्मृति के साथ उनका पीले कलर का एक वेस्पा स्कूटर भी बिना बुलाए ही साथ चला आता है… उदय प्रकाश की कहानी “पालगोमरा का स्कूटर” पढ़कर एक थ्रिल मिला था, रवींद्र शाह का ये स्कूटर भी इस मायने में कभी कम नहीं रहा।
“अबे साले” उनका ये संबोधन उन तमाम लोगों के लिए था जिन्हें वे प्यार करते थे। मैं भी उन्हीं लोगों में शामिल था। 2002 में उनके सहारा ज्वाइन करने से लेकर मेरे दिल्ली छोड़ने तक शायद ही कोई पखवाड़ा ऐसा रहा हो जब मेरी उनसे मुलाकात ना हुई हो… उनसे भी सहारा छूटा, मुझसे भी… पर उनसे मिलना नहीं छूटा…। अभी कुछ महीने पहले रवींद्र जी मुंबई आए थे, लेकिन तब उनकी दिल्ली की फ्लाइट पकड़ने से पहले मेरी उनसे मुलाकात नहीं हो पाई थी… और मैंने खुद को ये दिलासा दिया था कि अगली बार आएंगे तो मिल लूंगा। लेकिन मुझे क्या पता था कि वो अब फिर कभी नहीं आएंगे…!!!
लेखक पंकज कौरव पत्रकार हैं तथा जूम टीवी में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं.






