उत्तर प्रदेश चुनाव में अगर कोई सबसे चर्चित चेहरा है तो वो हैं कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी. बिना उनके कोई मीडिया रिपोर्ट पूरी नहीं होती. बिना उनके ज़िक्र के किसी विपक्षी पार्टी का भाषण और प्रचार अधूरा रहता है. कांग्रेस का कोई भी नेता उनका गुणगान करने का कोई मौका नहीं चूकता है तो गैर कांग्रेसी नेता उनपर निशाना साधने का मौका नहीं गंवाते. भले ही उल-जलूल वाकया या सन्दर्भ क्यों न हो, राहुल गाँधी के साथ मीडिया ने नाम उछाल तो दिया. मिसाल के तौर पर मायवती जी बिना राहुल का नाम लिए अपना खाना नहीं पचा पाती. यही हाल अखिलेश यादव का है. भारतीय जनता पार्टी के शीर्षस्थ नेतागण भी इसी फन का मुज़ाहरा करते दिखाई दे जाते हैं. नितिन गडकरी जी को तो नागपुरी नौटंकी स्टाइल में कुछ भड़ास निकाल ही देते हैं. आज कल राजनाथ सिंह तथा सुषमा स्वराज को भी राहुल गाँधी का गुस्सैल युवक वाला चेहरा नाटक लगने लगा है.
ज़ाहिर है कि विपक्षी पार्टियां ये जान गयी हैं कि उत्तर प्रदेश का चुनावी नतीजा जो भी हो, सन २१०४ के लोक सभा चुनाव के मद्देनज़र राहुल गाँधी ही कांग्रेस की तरफ से भावी प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किये जायेंगे. लिहाज़ा अभी से ही उनकी किरकिरी शुरू क्यों न कर दी जाए.? इसी योजना के तहत हर कोई नेता उनकी हर हरकत पर कुछ न कुछ बयानबाज़ी ज़रूर करते दिखाई दे जाते हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी की फौज राहुल उनको अपना सेनापति मानकर उनके हर बयान, उनकी हर अदा पर तालियाँ बजती है और पूरे प्रदेश में उनको खुशबूदार हवा का नया झोंका के तौर पर पेश किया जाता है. मीडिया वालों में भी एक तबका ऐसा है, जिसमें राहुल गाँधी देश की संजीवनी के तौर पर देखे और लिखे जाते हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि राहुल गाँधी ने इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव में बड़ी मेहनत की है. इसमें कोई शक नहीं कि वोह बहुत ही उर्जावान और ईमानदार हैं. शायद अब तक प्रदेश के बड़े नेताओं ने भी उतने गाँव छान नहीं मारा जितना राहुल गाँधी ने खुद विगत एक साल में किया है. चाहे वो भट्टा परसौल हो या अलीगढ़ की महापंचायत या फिर कोई और इलाका. उनकी मंशा नेक है और नीयत भी. मगर उनकी मुश्किल ये है कई विगत २२ सालों में प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकार रही और प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं ने कभी अपने निजी स्वार्थ के लिए पार्टी की ज़मीर बेच डाली तो कभी अंतर्कलह और गुटबाज़ी ने काम तमाम कर दिया. ऐसे में जब पार्टी की नींव ही कमजोर हो तो भला राहुल भैया क्या करें? कांग्रेस पार्टी की इस वक़्त सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि उसे प्रदेश के सारे जिलों में एक हज़ार पुराने कार्यकर्ता तक नहीं मिल पा रहे.
कई बड़े कांग्रेसी नेता अक्सर कहते दिखाई दे जाते हैं कि राहुल युवा हैं और वो अब भी पूरे भारत को अपने नज़रिए से जानने में जुटे हुए हैं. बात कुछ अटपटी सी लगती है. चालीस साल के युवा को अगर उत्तर प्रदेश का पुनरावलोकन करना ही था तो कुछ पहले से क्यों नहीं कर लिया? पूरब में एक कहावत है कि हड़बड़ी विवाह तो कनपटी सिंदूर. या फिर लगता है कि उनके सलाहकारों ने उनको ये बात नहीं बताई कई पिछले २२ सालों की भरपाई एक साल की मेहनत में कभी नहीं हो सकती थी. इसलिए मिशन उत्तर प्रदेश शायद दो तीन साल पहले शुरू कर देते तो आज का चुनावी नज़ारा बिलकुल मुख्तलिफ होता. कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा अब भी पूरे प्रदेश में काफी लचर दिखाई देता है. फिर चंद महीने में चुनावी आंच पर पार्टी की जीत का गुड कैसे पकेगा?
संजीदगी से देखने पर ऐसे कई मुद्दे हैं जिसपर शायद कांग्रेस आला कमान ने राहुल बाबा को उत्तर प्रदेश की चुनावी आग में झोंकने के पूर्व या तो ज़मीनी हकीकत को ठीक से नहीं समझा या फिर समझने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. शायद आला कमान को ये लगा कि राहुल गाँधी का करिश्मा ही पार्टी के लिए राम बाण बन जायेगा और पार्टी की नैया पार हो जायेगी. या फिर मुगालता और मुखबिरी का बाज़ार गर्म हो गया होगा और ईमानदरी से बात कहने वालों की जगह एक बार फिर चम्पुयों, चम्मचों और चाटुकारों की फौज बाज़ी मार गयी होगी. या फिर पार्टी ने इतिहास से कोई सबक नहीं सीखी होगी. गौरतलब है कि सन २००७ के चुनाव में लगता था कि उत्तर प्रदेश राहुल गाँधी की आंधी में बह जाएगा और कांग्रेस सत्ता में वापस लौट आएगी. मगर कई नेता और सलाहकार शायद ये भूल जाते हैं कि औचक और चौचक के खेल में जनता कुछ पल के लिए भौंचक भले ही हो जाए मगर आखिर में वो अपना फैसला अपने विवेक से ही लेती है. खैर, अंजाम यही हुआ. उस चुनाव में राहुल गाँधी ने १०८ सीटों पर चुनाव प्राचार किया. उनको देखने और सुनने के लिया हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी, मगर उन १०८ सीटों में से कांग्रेस सिर्फ २ सीट पर ही जीत पाई.
दूसरा पहलू है उत्तर प्रदेश के सिपहसालारों की टीम जिसके बलबूते पर राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश में पार्टी को अपने पांव पर खड़ा करना चाहते हैं. इसमें प्रमोद तिवारी, रीता बहुगुणा जोशी, सलमान खुर्शीद, पीएल पुनिया, बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर परवेज़ हाशमी का नाम शुमार होता है. और राजा दिग्विजय सिंह तो वैसे भी सबसे ऊपर हैं. प्रमोद तिवारी की खासियत ये है कि वो सत्तारूढ़ दल के मुख्यमंत्री के हिसाब से अपने आप को सांचे में ढाल लेते हैं. अपनी सीट जीत ली पर पूरे प्रदेश में पार्टी के बीच गुटबाजी को बढ़ावा देने के लिए वो कुख्यात हैं. प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी मेयर के चुनाव जीतने के बाद से अबतक कोई चुनाव जीत ही नहीं पाईं. देखना है इस बार उनकी तकदीर साथ देती है या नहीं. केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद अपनी पत्नी को चुनाव जीतवाने के चक्कर में अल्पसंख्यक समुदाय का कार्ड खेलते-खेलते चुनाव आयोग से भी पंगा ले लेते हैं. बेनी प्रसाद वर्मा फिर क्यों पीछे रहें? उन्होंने भी अपना कमाल दिखा ही दिया. कभी मायावती के चहेते रहे मुख्य सचिव पीएल पुनिया आज कांग्रेस के चहेते बने हैं. इसके बाद आते हैं दिल्ली प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का अल्पसंख्यक चेहरा परवेज़ हाशमी, जिनको लगता है कि पूरा उत्तर प्रदेश चांदनी चौक का ही पिछवाड़ा है. अब ऐसे में पार्टी को जनाधार बनाने और वोट दिलाने वाली कवायद कहाँ तक कामयाब होगी ये तो वक़्त ही बताएगा.
तीसरा पहलू है कांग्रेस पार्टी का अटपटा और असंतुलित चुनावी घोषणा और नेताओं के बयान जिससे जन मानस को विश्वास नहीं होता कि आखिर ये पार्टी कहना क्या चाहती है. मिसाल के तौर पर पहले राहुल गाँधी ने देश के विकास का नारा दिया कि वो प्रदेश के विकास के लिए वोट मांगते हैं. फिर अचानक आ गया जातिवाद का तड़का और उसमे कूद पड़े, सिम पित्रोदा भी जिनको बढ़ई के बेटे के तौर पर पेश किया गया. चार दिन के बाद वो भी सीन से गायब हो गए और उनकी जगह चले आये फिल्म स्टार संजय दत्त जो पहले मुलायम सिंह के लिए भीड़ जुटाया करते थे. उसके बाद शुरू हुआ अल्पसंख्यकों के आरक्षण का राग, जिसमे सलमान खुर्शीद से लेकर बेनी प्रसाद वर्मा तक ताल ठोंकने लगे और चुनाव आयोग से भी दो-दो हाथ करने की ठान ली. पार्टी की जो किरकिरी हुई वो तो दीगर बात है, अब देखना है कि आगे भी कहीं यही मुद्रा भस्मासुर की तरह ना बन जाये. जिन मतदाताओं को ललचाने की कोशिश हो रही है कहीं वो ही ना आँखें फेर ले और मियां मुलायम के अंगने में फिर से तशरीफ़ फरमा हो जाये.
उसके बाद का तुर्रा था कांग्रेस पार्टी का 'विजन डाकुमेंट २०-२०' जिसमें अभी से आठ साल के बाद प्रदेश के कायापलट की तस्वीर और नक्श का मुज़ाहरा था. पार्टी के घोषणा पत्र में वैसे भी कुछ ख़ास नहीं था. पुराने वायदों और कवायतों का पुलिंदा रहा वो. जाहिर है, इरादे कितने भी बुलंद हों मगर जब ज़मीन ही उबड़-खाबड़ और पथरीली हो तो फिर क्या.? न ही नौ मन तेल होगा और ना ही राधा नाचेगी. इसके बाद बारी आती है "कांग्रेस वार रूम" की, जिसको सबसे अहम जगह माना जाता है. मगर उत्तर प्रदेश के मद्देनजर इस जगह की जम कर मज़म्मत कर रहे हैं खुद कांग्रेस के ही नेता लोग. चाहे वो श्रीप्रकाश जायसवाल हों या राज बब्बर. सब की यही शिकायत है कि वार रूम वालों ने उनकी नीद हरम कर दी है. वहां पर सही सूचना, सामंजस्य और समन्वय का नितांत अभाव है. कहीं के नेताओं को कहीं भेज दिया जाता है. अंजाम ये है कि कहीं नेता कई घंटे लेट पहुँचते हैं और कहीं पहुँच ही नहीं पाते. फिर ऐसे में जनता उनके लिया क्या दिन भर इंतज़ार करती रहेगी?
दरअसल कांग्रेस पार्टी की ऐसी फजीहत का सबसे बड़ा कारण है पुराने और युवा वर्ग के नेताओं के बीच सोच समन्वय का अभाव. उत्तर प्रदेश की ज़मीनी हकीकत, जातीय समीकरण और ज्वलंत मुद्दों और मसलों पर पार्टी में एक सोच और एकता का अभाव दिखता है. नयी पीढ़ी के नेता लोग और राहुल गाँधी के सलाहकारों की टीम में प्रदेश राजनीति की बारीकियों और स्थानीय मुद्दों और बातों का ज्यादा इल्म नहीं है. विदेशों से शिक्षा प्राप्त कर बाद वातानुकूलित कमरों में लैपटॉप पर दिखे नक्शों और आंकड़ों के बलबूते पर चुनाव में जीत हासिल करना बड़ा आसान दिखता है. मुश्किल यह है कि भारत जैसे देश में जब बाज़ार और कारपोरेट पद्धति से जब चुनाव प्रबंधन किया जाने लगता है तो जीत की संभावना अक्सर कठिन को जाती है और गुड़ का गोबर हो जाता है.
मायावती इस बात को भली भांति जानती हैं और इसीलिए वो आज भी मुख्यमंत्री के पद पर काबिज़ है. राहुल गाँधी के लिए भी ये चुनाव बहुत बड़ी अग्नि परीक्षा होगी क्योंकि इसी चुनाव का परिणाम ये तय करेगा कि अगले लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा. ऐसी सूरत-ए-हाल में कांग्रेस आला कमान को इस बात का अंदेशा हमेशा रहेगा कि:-
ये नहीं थी बात कि मेरा कद घट गया
थी चादरें छोटी और मैं सिमट गया.
लेखक अजय एन झा वरिष्ठ पत्रकार और समालोचक हैं. ये हिंदुस्तान टाइम्स, आजतक, डीडी न्यूज, बीबीसी, एनडीटीवी एवं लोकसभा टीवी के साथ वरिष्ठ पदों पर काम किया है. अजय से संपर्क के जरिए किया जा सकता है.





