राजनेताओं में प्रचार पाने की जैसे होड़ सी लगी है. कम से कम मेरठ में तो कमोबेश यही आलम है. मेरठ में कुछ स्टार प्रचारक ऐसे भी है, जो प्रचार पाने के लिए अपने भाषणों में कुछ ऐसा बोलने से गुरेज नहीं करते फिर वो चाहे कितना ही नकारात्मक ही क्यों ना हो. अभी तक मेरठ के याकूब कुरैशी अपने निगेटिव बयानों को लेकर चर्चाओं में रहते थे. चाहे वो डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के सर पर इक्यावन करोड़ के इनाम को लेकर हो या फिर सिखों के ऊपर टिपण्णी करने को लेकर या फिर सिपाही को बीच चौक में थप्पड़ मारने का मामला हो, याकूब किसी ना किसी विवादस्पद मुद्दे या बयान को लेकर चर्चाओं में रहते हैं.
शायद इन्हीं विवादों के चलते याकूब की बसपा से छुट्टी हुई, लेकिन बसपा से निकले तो लोकदल में आ गए और अपनी विवादस्पद छवि के चलते लोकदल से टिकट के साथ-साथ लोकदल के स्टार प्रचारक भी बन गए, लेकिन स्टार प्रचारक बनने के बाद भी याकूब हमेशा निगेटिव प्रचार ही पाने की कोशिश में लगे रहते हैं. तभी तो अपनी गाड़ी चेक करने के दौरान एक मजिस्ट्रेट को ही भला बुरा कहने लगे. बसपा से मलूक नागर को भी स्टार प्रचारक बनाया गया है. उन्हें जिम्मा मिला है बसपा के समर्थन में गुज्जर वोटों को बसपा के खाते में लाने का, लेकिन मलूक गुज्जर वोट तो बसपा में लाये या ना लाये लेकिन उलटे-सीधे बयान देकर प्रसिद्धि पाने के चक्कर में जरुर हैं, तभी तो मंच से वो कांग्रेस सांसद अवतार भडाना की चिंता करने लगते हैं, तो कभी अन्य पार्टी के उम्मीदवारों को देख लेने की धमकी भी देते हैं. इतना ही नहीं बढ़-चढ़ के बोलने के चक्कर में चुनाव के बाद अन्य पार्टियों से समर्थन लेने की बात भी कहने लगे. यानी जो बात मायावती कहने से पहले दस बार सोचेंगी उस बात को बसपा के स्टार प्रचारक मलूक कहने में जरा भी नहीं हिचकिचा रहे हैं. मतलब पब्लिसिटी के लिए सब कुछ करेगा फिर वो चाहे निगेटिव ही क्यों ना हो.
ऐसे ही एक स्टार प्रचारक कांग्रेस के हैं अवतार भडाना. फरीदाबाद से सांसद हैं और जिम्मा मिला है कांग्रेस के प्रचार का, लेकिन ये भी प्रचार के लिए वही फार्मूला इस्तेमाल कर रहे हैं. कुछ दिन पहले जब मेरठ में याकूब की एक रैली में आये तो अपनी पार्टी के युवराज राहुल गाँधी को ही चुनौती दे डाली. कह दिया कि राहुल पूर्व में प्रचार करें और मैं पश्चिम में और देखें कौन कितनी सीट दिलवाता है. नतीजा ये हुआ कि भडाना को प्रचार के काम से ही हटा दिया गया. अब जब चुनाव प्रचार आखिरी चरण में है तो भडाना को फिर से प्रचार का मौका दिया गया है, लेकिन इस बार वे मेरठ में आते ही फिर से राहुल गाँधी से बराबरी करने लगे. दो दिन पूर्व राहुल ने कानपुर में रोड शो के दौरान आचार संहिता का उलंघन किया था और मुकदमा दर्ज हुआ था, तो भला भडाना पीछे कहां रहने वाले थे. उन्होंने भी मेरठ में राहुल की रैली के बाद बिना इजाजत के रोड शो कर डाला और अपने ऊपर मुकदमा करवा लिया यानी प्रचार पाने के लिए कुछ भी करेगा फिर वो चाहे निगेटिव पब्लिसिटी ही क्यों ना हो?
ऐसा नहीं है की निगेटिव पब्लिसिटी का भूत सिर्फ इन पर ही सवार है. इसके और भी उदहारण हैं जैसे कांग्रेस के दिग्गी राजा या फिर सलमान खुर्शीद और अब बेनी प्रसाद निगेटिव पब्लिसिटी पाने में अमर सिंह भी कभी पीछे नहीं रहे. अब देखना है और कौन-कौन से राजनेता प्रचार पाने के लिए निगेटिव पब्लिसिटी का सहारा लेते है.
लेखक सुधीर चौहान मेरठ में इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार हैं.





