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विशेश्‍वर कुमार ने सवा लाख मतदाताओं को अयोग्‍य घोषित किया!

: चुनाव का मौसम है, समीक्षा में कुछ भी लिख मारो : आज कल प्रदेश में चुनावों और चुनाव समीक्षाओं का मौसम है. सभी जगह एक ही जैसी फगुनाई बयार चल रही है. सभी अखबार और चैनल लगातार राजनीतिक समीक्षा में व्यस्त हैं. इन अखबारों और चैनलों के बहुत सारे पत्रकार भी राजनीतिक समीक्षा लिखने में व्यस्त हैं. इसी क्रम में फेसबुकिया एक्टिविस्ट भी राजनीतिक भविष्यवाणी में व्यस्त हैं. उनकी व्यावहारिक राजनीतिक समझ का उनकी "समझदानी" की सामर्थ्य से आपसी सम्बन्ध का रिश्ता बहुत कमजोर है. इधर हाल में अख़बारों में भी समीक्षाएं "लाइव" के टैग के साथ लिखी जा रही हैं. घर बैठकर या अखबार के आफिस की डेस्क में लिखी जाने वाली इन समीक्षाओं में पाठकों और मतदाताओं को बरगलाने या फिर मत प्रभावित करने का काम चाहे-अनचाहे किया जा रहा है. चुनाव आयोग की तमाम बंदिशों के बाद भी ये खेल जारी है.

: चुनाव का मौसम है, समीक्षा में कुछ भी लिख मारो : आज कल प्रदेश में चुनावों और चुनाव समीक्षाओं का मौसम है. सभी जगह एक ही जैसी फगुनाई बयार चल रही है. सभी अखबार और चैनल लगातार राजनीतिक समीक्षा में व्यस्त हैं. इन अखबारों और चैनलों के बहुत सारे पत्रकार भी राजनीतिक समीक्षा लिखने में व्यस्त हैं. इसी क्रम में फेसबुकिया एक्टिविस्ट भी राजनीतिक भविष्यवाणी में व्यस्त हैं. उनकी व्यावहारिक राजनीतिक समझ का उनकी "समझदानी" की सामर्थ्य से आपसी सम्बन्ध का रिश्ता बहुत कमजोर है. इधर हाल में अख़बारों में भी समीक्षाएं "लाइव" के टैग के साथ लिखी जा रही हैं. घर बैठकर या अखबार के आफिस की डेस्क में लिखी जाने वाली इन समीक्षाओं में पाठकों और मतदाताओं को बरगलाने या फिर मत प्रभावित करने का काम चाहे-अनचाहे किया जा रहा है. चुनाव आयोग की तमाम बंदिशों के बाद भी ये खेल जारी है.

इसी क्रम में कल एक समीक्षा कानपुर के स्थानीय सम्पादक विश्वेशर कुमार जी के द्वारा लिखी गयी है. जो संभवतः "लाइव" नहीं है. कारण इसमें कई ऎसी गडबडियां हैं जिन्हें कम-से-कम उन जैसा लिक्खाड़ करे, ये समझ से परे है. ऐसा लगा कि शायद काम की व्यस्तता ज्यादा होने के कारण "वो" ऐसा कर गये होंगे. चुनाव है, काम ज्यादा है और इस हालत में ऎसी गलतियां हो ही जाती हैं. "चेलों" की लिखी गयी खबर भी कभी-कभी अपने नाम से ही छापने या फिर उसे सुधार कर अपने नाम से छापने की इच्छा संपादकों में रहती ही है. कभी-कभी चेलों की दी गयी सूचना पर अंध-विश्वास करना भी पड़ता है.

पर इस समीक्षा लेखन में आफत तो तब है जब समीक्षा राजस्थान के दौरे में उत्तर प्रदेश के किसी गांव की लिखी जा रही हो. अब क्या किया जाये हिन्दुस्तान ठहरा राष्ट्रीय अखबार. पूरे देश में छपता और बिकता है. इसी तरह संपादकों को भी पूरे देश में स्थानांतरित भी किया जाता रहता है. जिससे उनकी भाषा बदल जाती है. कल हिन्दुस्तान में प्रकाशित जिस "इटावा लाइव" समीक्षा की बात मैं कर रहा हूँ, उसमें लेखक ने लेख को "लाइव" जैसा बना रहने के लिए एक ग्रामीण के मुख से एक वाक्य का प्रयोग करवाया है "बिजली नू खंभा भैंस बांधन के काम आवै है". पूरे इटावा में इस हिन्दी की भाषा प्रयोग नहीं किया जाता. या तो ये "ग्रामीण" राजस्थानी था या फिर सम्पादक जी ने राजस्थान से लाकर इसे सुना और तब इस समीक्षा को लिखा है. या फिर राजस्थान जाकर इसे लिखा है. या फिर कभी राजस्थान में गए होंगे ओ इनकी भाषा इस "नू" और "आवै" से प्रभावित हो गयी होगी. ऐसा भी हो सकता है कि जिस रिपोर्टर ने उन्हें ये खबर लिख भेजी हो वो किसी राजस्थानी राजनीतिक दल का सक्रिय सदस्य हो.. खैर अब ये सब तो वो ही जानें.

इसके अतिरिक्त एक और बड़ी गडबड़ी इस समीक्षा में ये है, वो ये की बहुत अधिक व्यस्तता में सम्पादक जी की लिखी इस "इटावा लाइव" में इटावा जिले की मतदाता संख्या ही बदल गयी है. खुद उनके अखबार में ही ये संख्या पूर्व में दस लाख उनतालीस हजार (10,39,000) छप चुकी है. इस समीक्षा में ये संख्या घटकर नौ लाख बारह हज़ार छह सौ अठानबे (9,12,698) बतायी गयी है. तो, इस तरह उन्होंने सवा लाख मतदाताओं को मत डालने से ही अयोग्य घोषित कर दिया है….ऎसी ही और भी लाइव हैं… जैसे उनकी "चरखारी लाइव". जिसमें ढेरों ऎसी ही गडबडियां पाई जा सकती हैं. पर समय कहाँ है किसी को.. न पढ़ने की… ना समझने की… और चुनाव आयोग वो तो "फूस का पुतला" साबित हो रहा है इन अखबारों और नेताओं के लिए.. आदर्श आचार संहिता का अनुपालन और निर्वहन चिंदी-चिंदी उडाया जा रहा है… चुनाव समीक्षाओं की आड़ में चलने वाले "खेल" को नहीं जांचा जा सका है.

लेखक अरविंद त्रिपाठी कानपुर में पत्रकार हैं तथा चौथी दुनिया से जुड़े हुए हैं

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