रवीन्द्र का जाना एक वज्रपात है. कुछ देर पहले अजय उपाध्याय से पता लगा कि रवीन्द्र नहीं रहे. अजय भइया भी खबर पर विश्वास नहीं कर रहे थे. फिर अतुल से पूछा कि सही पता करो और अतुल सिन्हा ने बताया कि सर्वनाश हो चुका है. रवीन्द्र एक अच्छे साथी थे. पत्रकारिता में प्रयोग करने के शौक़ीन. उनसे मेरी मुलाक़ात दैनिक जागरण के मीडिया संस्थान में हुई थी. हम दोनों वहां पढ़ाते थे. रवीन्द्र की उम्र मुझसे कम थी इसलिए मुझे वे बड़ा भाई मानते थे. यह भी सच है कि ब्राडकास्ट पत्रकारिता के बारे में रवीन्द्र मुझसे ज्यादा जानते थे. लेकिन यह बात कभी ज़ाहिर नहीं होने देते थे या कोशिश करते थे कि सभी छात्र यही जानते रहें कि मैं ज्यादा जानता हूँ. बहुत लिहाज़ था रवीन्द्र में.
बाद में एक टीवी चैनल के हेड बने. वहां भी मुझे बुलाते रहे, फिर दूसरे चैनल में गए. रवीन्द्र इंदौर घराने के पत्रकार थे. बहुत ही अच्छे इंसान थे लेकिन पत्रकारिता में होने वाली सियासत से भी अनजान नहीं थे, बल्कि उसको खूब मजे लेकर खेलते थे. कभी किसी की धौंस नहीं मानी लेकिन किसी से खामखाह का पंगा भी नहीं लिया. मैं इस इंसान को बहुत याद करूंगा जीवन भर. मेरा एक अच्छा दोस्त, जो मेरी कमियाँ छुपाता था, चला गया.
लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार तथा जनसंदेश टाइम्स के रोविंग एडिटर हैं.





