मुंबई : मुंबई महानगरपालिका चुनाव में कांग्रेस-राकांपा को मिली करारी हार के बाद पार्टी में आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है. टिकट बंटवारे में कांग्रेस के सांसद व विधायकों की खूब चली थी, लेकिन अब हार का ठीकरा मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह पर फोडऩे की कोशिश हो रही है.
मुंबई की 6 लोकसभा सीटों में से 5 पर कांग्रेस के सांसद हैं. मनपा चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी ने यह तय किया था कि सांसदों व विधायकों के क्षेत्र में टिकट बंटवारा उनकी राय से होगा. यानी सांसद व विधायक जिसे चाहेंगे, पार्टी उसे ही उम्मीदवार बनाएगी. अब चुनाव परिणाम आने के बाद पता चल रहा है कि पार्टी को यह नीति बहुत भारी पड़ी है. सांसदों व विधायकों ने जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर अपने-अपने चहेतों को टिकट दिलाया. जहां कहीं उनके मन मुताबिक टिकट नहीं दिया गया तो दूसरे गुट के उम्मीदवारों को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
भारी पड़े बागी : टिकट न मिलने से नाराज पार्टी नेताओं की नाराजगी दूर करने और उन्हें मैदान से हटाने की भरसक कोशिश हुई, पर इसमें पार्टी को ज्यादा सफलता नहीं मिली. करीब 40 सीटों पर कांग्रेस के बागी उम्मीदवार पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों का खेल खराब करने के लिए उतरे हुए थे. चुनाव परिणामों को देखने से पता चलता है कि बगावत की वजह से पार्टी को भारी नुकसान हुआ है. उदाहरण के लिए वार्ड क्रमांक 1 से कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद चौबे को पार्टी के दो बागियों की वजह से हार का सामना करना पड़ा. टिकट न मिलने से नाराज पार्टी के दो बागी नेताओं ने बतौर निर्दलीय उम्मीदवार जितना वोट हासिल किया, उससे कम मतों के अंतर से चौबे को हार का सामना करना पड़ा.
चांदीवली से कांग्रेस विधायक राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नसीम खान ने अपने विधानसभा क्षेत्र के वार्ड से कांग्रेस के नगरसेवक रहे अन्ना मलाई की पत्नी की टिकट कटवा दिया. अन्ना मलाई ने टिकट न मिलने पर कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ अपनी पत्नी को निर्दल उम्मीदवार के रुप में खड़ा कर दिया और चुनाव भी जीत गए. इसी तरह करीब 10 सीटों पर कांग्रेस के बागियों ने निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत भी दर्ज की.
मैं नहीं तो कोई और सही : इस बार आरक्षण के कारण अपने 55 सीटिंग नगरसेवकों का टिकट कट गया था. इससे नाराज इन नगरसेवकों ने खुलकर बगावत करने की बजाय भीतरघात का काम किया और अपनी जगह उतरे अन्य कांग्रेस उम्मीदवार को स्वीकार नहीं कर पाए. अंदरखाने उन्होंने अपने पार्टी उम्मीदवार को हराने के लिए काम किया.
घाटे का सौदा साबित हुआ राकांपा से गठबंधन : काफी खींचतान के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ हुआ कांग्रेस का गठबंधन फायदा पहुंचाने की बजाय पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुआ. समझौते में कांग्रेस ने राकांपा को 58 सीटें दीं. पर, इन सीटों पर पिछले 5 सालों से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे कांग्रेस के स्थानीय नेता इससे नाराज हो गए और राकांपा उम्मीदवार को हराने का काम किया. दूसरी ओर 58 सीटों के अलावा कांग्रेस के लिए छोड़ी गई सीटों पर भी राकांपा के बागी उतर गए. मुंबई राकांपा चुनाव बीतने के बाद भी अभी तक अपने पार्टी के बागियों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं कर सकी.
मतदान के पहले मुंबई राकांपा के एक पदाधिकारी ने इस संवाददाता से कहा था कि राकांपा के बागी कांग्रेस उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचाएंगे. दोनों दलों के बीच हुए गठबंधन से कांग्रेस तो नुकसान में रही ही, राकांपा को भी कोई खास लाभ नहीं हुआ. मुंबई से राकांपा के एकमात्र सांसद संजय पाटिल ने तो कांग्रेस उम्मीदवार के सामने बतौर निर्दल उतरे राकांपा के बागी उम्मीदवार के मंच पर जाकर उसके लिए वोट मांगे. मुंबई राकांपा ने तो अभी तक अपने बागी नेताओं के खिलाफ कोई कारवाई भी नहीं की.
मुंबई से वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह कौशिक की रिपोर्ट.






