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नामवर सिंह ने ‘प्रेरणा’ एवं ‘आपका तिस्‍ता हिमालय’ का लोकार्पण किया

हरियाणा साहित्य अकादमी तथा अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के संयुक्त तत्वावधान में नई दिल्ली स्थित अणुव्रत सभागार में आयोजित लघु उपन्यास विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर समकालीन आलोचना के शिखर पुरुष तथा महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. नामवर सिंह ने भोपाल से अरुण तिवारी के संपादन में प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘‘प्रेरणा‘‘ के लघुउपन्यास अंक, हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘‘हरिगंधा‘‘ तथा पूर्वोत्तर की लोक संस्कृति पर केन्द्रित डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह के संपादन में सिलीगुडी़ से छपने वाली मासिक पत्रिका ‘‘आपका तिस्ता हिमालय‘‘ का लोकार्पण किया।

हरियाणा साहित्य अकादमी तथा अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के संयुक्त तत्वावधान में नई दिल्ली स्थित अणुव्रत सभागार में आयोजित लघु उपन्यास विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर समकालीन आलोचना के शिखर पुरुष तथा महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा. नामवर सिंह ने भोपाल से अरुण तिवारी के संपादन में प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘‘प्रेरणा‘‘ के लघुउपन्यास अंक, हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘‘हरिगंधा‘‘ तथा पूर्वोत्तर की लोक संस्कृति पर केन्द्रित डा. राजेन्द्र प्रसाद सिंह के संपादन में सिलीगुडी़ से छपने वाली मासिक पत्रिका ‘‘आपका तिस्ता हिमालय‘‘ का लोकार्पण किया।

इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रख्यात आलोचक व चिंतक डॉ. नामवर सिंह ने लेखकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आप लोगों का काम लिखना है। आप निश्चिंत होकर लिखते रहें, आपकी रचना लम्बी कहानी है या लघु उपन्यास इसका फैसला आलोचकों को करने दें। रचनाकार को अपनी उर्जा लेखन में खर्च करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह रहस्य तो रचनाकार ही बता सकता है कि कभी-कभी वह कम से कम शब्दों में असरदार बात कह जाता है, जबकि कभी-कभी उसी बात को प्रभावी ढंग से कहने के लिए उसे लम्बी चौड़ी भूमिका की जरूरत पड़ती है। लम्बी कहानी बनाम लघु उपन्यास के मसले पर सिंह ने कहा कि जिस तरह पद्य विधा में मुक्तक, गजल, खंण्ड काव्य तथा प्रबंध काव्य को साफ-साफ परिभाषित किया गया है। इस तरह का कोई वस्तुनिष्ट वर्गीकरण या सीमांकन गद्य साहित्य में नहीं है।

उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ किस तरह लोग मूल विधा आख्यान, आख्यायिका, गल्फ तथा कथा शब्दों को भूलते जा रहे हैं तथा ‘शार्ट स्टोरी‘ के लिए कहानी शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह जानना भी बहुत आवश्‍यक है कि आजादी के बाद हिंदी कहानी कितनी आगे बढ़ी है। उन्होंने माना कि दलित तथा महिला लेखन ने कहानी को बहुत हद तक प्रभावित किया है अब तो पत्रों तथा डायरी के द्वारा भी कहानियां लिखी जा रही हैं। अब कहानी का परिदृश्‍य काफी कुछ बदल चुका है। हमें यह भी देखना है कि कहानी अपने समय की विद्रूपताओं तथा विसंगतियों से किस हद तक मुठभेड़ कर रही है। अंत में उन्होंने संतोष प्रकट करते हुए कहा कि अणुव्रत सभागार में आयोजित आज कि यह संगोष्ठी अपने स्वरूप में अहिंसात्मक रही क्योंकि वैचारिक घात-प्रतिघात से आज यहाँ कोई मूर्छित नहीं हुआ।

संगोष्ठी का संचालन करते हुए रचनाकार शैलेन्द्र चौहान ने कहा कि वर्तमान उपभोक्तावादी युग में साहित्य आम पाठकों से दूर होते जा रहा है। व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य का स्थान सीमित होते जा रहा है। ऐसे प्रतिकूल माहौल में ‘‘प्रेरणा‘‘ तथा ‘‘आपका तिस्ता हिमालय ‘‘जैसी सार्थक लघु पत्रिकाओं के माध्यम से साहित्य को जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है। इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार तथा ‘लोकायत‘ के संपादक बलराम ने अमेरिकी लेखिका हेलेन हैंफ के द्वारा इंग्लैण्ड स्थित मार्क एण्ड कं. के मालिक फैंक ड्वेल को लिखे 81 पत्रों के माध्यम से सृजित एक लघुउपन्यास का रागात्मक वर्णन किया। बलराम ने ‘‘प्रेरणा‘‘ के वर्तमान अकं में प्रकाशित राजेन्द्र लहरिया के ‘एक डायरी : ला दिनांक‘ तथा डॉ.श्याम सखा श्याम के ‘कोई फायदा नहीं‘ नामक लघु उपन्यासों के कथ्य एवं शिल्प की प्रशंसा की। बनास के सम्पादक तथा युवा आलोचक पल्लव ने लघु उपन्यासों के शिल्प और प्रविधि की विस्तृत चर्चा करते हुए बताया कि प्रकाशकीय दबावों ने इस सम्बन्ध में बहुधा बेजा हस्तक्षेप किया है। उन्होंने इस सम्बन्ध में एक लड़की, दौड़ और गौमूत्र का उदाहरण भी दिया।

उन्होंने बनारस के परिवेश से जुडे दो लघु उपन्यासों बहती गंगा तथा रेहन पर रग्घू का विशेष उल्लेख भी किया. उन्होंने इस अवसर पर कहा कि जब वे चितौड़ में स्कूल के छात्र थे तभी से वे अपने शिक्षक के यहां से ‘‘प्रेरणा‘‘ पत्रिका लेकर पढ़ा करते थे। उन्होंने यह स्वीकार किया कि मेरे जैसे अनेक विद्यार्थियों को ऐसी पत्रिकाओं से दिशा एवं दृष्टि मिलती है। नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय विभाग से जुड़े महेश दर्पण ने लघु उपन्यास की परिभाषा, स्वरूप निर्धारण तथा सीमांकन को लेकर अपना मन्तव्य प्रकट किया। प्रकृति तथा आदिवासी की प्रशंसा करते हुए उन्होंनें कहा कि ये धरती के सच्चे वारिस हैं। कथाकार राजेन्द्र लहरिया ने लघु उपन्यास में कथ्य एवं शिल्प के सनातन द्वंद्व की चर्चा करते हुए उनके समानुपातिक प्रयोग की सलाह दी। ‘इंडिया न्यूज‘ से जुड़े अशोक मिश्र ने कहा कि लघु पत्रिकाओं को आपसी गुटबाजी से बचते हुए सार्थक, सोदेश्‍य परन्तु प्रासंगिक साहित्य के सृजन में लगे रहना चाहिए।

इस अवसर पर ‘‘प्रेरणा‘‘ के संपादक अरुण तिवारी ने कहा कि ‘‘प्रेरणा‘‘ का प्रकाशन मेरे लिए जुनून एवं मिशन है। मैं प्रतिकुलताओं का सामना करते हुए भी इसका प्रकाशन जारी रखने के लिए प्रतिबद्व हूँ। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक श्री श्याम सखा श्याम ने वक्ताओं को पुष्पगुच्छ के साथ शॉल देकर स्वागत किया। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को अपने हास्य-व्यंगपूर्ण टिप्पणियों से खूब हंसाते हुए सबके प्रति आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर संगोष्ठी में उपस्थित जिन रचनाकारों ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई उनमें राम कुमार कृषक, उद्भ्रांत, प्रदीप पन्त, कमल किशोर गोयनका, हरे राम समीप, विजय मोहन शर्मा, सुरेन्द्र कुमार श्लेष, राज कुमार गौतम, डॉ. श्रीमती कमल कुमार, डॉ. करुणा शर्मा, डॉ. जसविन्द्र कौर विंद्रा , डॉ. रूपा सिहं, राजेश शर्मा, रवि प्रताप शुक्ल, रामनारायण स्वामी, राजेश जैन, विजय वर्धन दादा, महेन्द्र शर्मा, संदीप हरियाणवी, सुधीर कुमार सिहं, उर्मी अरुण, अनिकेष, अनु, विजेन्द्र तथा राजीव रजंन के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। अंत में अखिल भारतीय अणुव्रत संस्था के प्रबंध न्यासी घनश्याम बोथरा ने संगोष्ठी में उपस्थित लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आज मैं स्वंय को सौभाग्यशाली मान रहा हूँ कि इतने लब्धप्रतिष्ठ व मूर्धन्य साहित्यकारों के बीच बैठ कर साहित्यिक विमर्श कर रहा हूं, यह क्षण मेरे जीवन में न केवल यादगार बल्कि ऐतिहासिक भी रहेगा।

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